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    Home»विशेष»इरान पर अमेरिकी हमले का भारत पर नहीं होगा कोई असर
    विशेष

    इरान पर अमेरिकी हमले का भारत पर नहीं होगा कोई असर

    shivam kumarBy shivam kumarJune 23, 2025No Comments7 Mins Read
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    विशेष
    पर चीन तक पहुंचेगी इस कार्रवाई की आग, पूरी दुनिया जलेगी
    मध्य पूर्व के हालात दुनिया की कूटनीति को नया रास्ता दिखायेंगे

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    इरान और इसराइल के बीच जारी संघर्ष न केवल मध्य पूर्व को, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। इस टकराव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों, व्यापारिक मार्गों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक महसूस किया जा रहा है। 13 जून को इसराइल ने ‘आॅपरेशन राइजिÞंग लायन’ के तहत इरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किये। इसराइल का दावा है कि यह कार्रवाई इरान की परमाणु हथियार प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा को रोकने के लिए जरूरी थी। जवाबी कार्रवाई में इरान ने तेल अवीव पर मिसाइल हमले किये। अब अमेरिका ने पहली बार इरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमला किया है और इसके साथ ही युद्ध की आग अचानक भड़क गयी है। यह संघर्ष केवल दो देशों की आपसी रंजिश नहीं है। इसके रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक परिणाम पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं। भारत के लिए यह स्थिति और भी जटिल है। एक ओर वह इसराइल के साथ रक्षा साझेदारी को मजबूती दे रहा है, वहीं दूसरी ओर इरान के साथ उसके गहरे रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं। इस बीच रूस और चीन भी क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं। वे मध्यस्थता की पेशकश तो कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में उनका ध्यान इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने पर केंद्रित है। इन परिस्थितियों में कई अहम सवाल उठते हैं। क्या इसराइल अपने सैन्य अभियानों के जरिये संघर्ष को और बढ़ा रहा है। भारत कैसे इसराइल और इरान के साथ रिश्तों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है और आज के समय में इसके क्या असर हो सकते हैं। इन तमाम सवालों के बीच अमेरिका द्वारा इरान पर किये गये हमले का भारत में क्या होगा असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    इरान-इसराइल संघर्ष में अमेरिका के कूदने के बाद स्थिति और गंभीर हो गयी है। इसराइल और इरान के बीच सैन्य संघर्ष बढ़ने के साथ ही इरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी है। यह इरान के उत्तर में और ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के दक्षिण में स्थित है। यह सऊदी अरब, इरान, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात से तेल निर्यात का मुख्य रास्ता है। कतर से आने वाली कई तरलीकृत प्राकृतिक गैस शिपमेंट भी इसी रास्ते से गुजरती है। अगर इरान इस रास्ते को बंद कर देता है, तो इसका असर चीन पर भी पड़ेगा।
    होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के तेल का पांचवां हिस्सा और एलएनजी का बड़ा हिस्सा गुजरता है। भारत अपने तेल का लगभग 40% और गैस का लगभग आधा हिस्सा इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से आयात करता है। इसराइल के इरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद होर्मुज जलसंधि के बंद होने की आशंका बढ़ गई है। इरान के कट्टरपंथियों ने इसे बंद करने की धमकी दी है। इरानी मीडिया ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमत 400 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है।

    भारत के लिए क्यों चिंता की बात
    जब पिछले हफ्ते इसराइल ने इरान पर हमला किया, तो एक ध्रुवीकृत वैश्विक माहौल में भारत के लिए किसी एक पक्ष का समर्थन करना आसान नहीं था। हालांकि करीब एक महीने पहले जब भारत ने पाकिस्तान के कुछ इलाकों में सैन्य कार्रवाई की थी, तब इसराइल ने भारत का खुल कर समर्थन किया था। यह इसराइल के लिए एक सहज निर्णय था, क्योंकि पाकिस्तान अब तक इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देता है। वहीं दूसरी ओर भारत और ईरान के बीच लंबे समय से मजबूत और सभ्यतागत स्तर के संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव गहरे हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बिना अपने दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुंचाये इस संघर्ष में किसके साथ खुलकर खड़ा हो सकता है।

    यह बात जगजाहिर है कि भारत के मध्य एशिया में कई अहम हित जुड़े हुए हैं। भारत के लिए तेल का आयात, खाड़ी देशों के साथ व्यापारिक संबंध और सबसे बड़ी बात- वहां रह रहे 90 लाख से ज्यादा भारतीय बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर युद्ध बढ़ता है, तो इस पूरे क्षेत्र को इससे अलग नहीं किया जा सकता है। इरान के परमाणु ठिकानों को जो निशाना बनाया जा रहा है, अगर कहीं जरा सी भी चूक हुई और रेडिएशन हवा में फैल गया, तो उसका असर बहुत भयावह हो सकता है। वैसे भारत के लिए इसराइल और इरान दोनों के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं और भारत नहीं चाहेगा कि तनाव और बढ़े, क्योंकि उसका असर सभी पर पड़ेगा। इन तमाम पहलुओं को देखते हुए हर देश—चाहे भारत हो या कोई और—सीजफायर को ही सबसे उचित विकल्प मानेगा, लेकिन फिलहाल इस निर्णय का दारोमदार अमेरिका पर है।

    चीन को कितना नुकसान
    केप्लर का विश्लेषण होर्मुज जलसंधि के पूरी तरह से बंद होने की संभावना को बहुत कम मानता है, क्योंकि इरान के लिए ऐसा करना नुकसानदायक होगा। चीन, इरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक है। वह अपने समुद्री तेल का 47% मध्य पूर्व की खाड़ी से आयात करता है। अगर यह रास्ता बंद हो जाता है, तो चीन पर सीधा असर पड़ेगा। इसके अलावा इरान भी अपने तेल निर्यात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है। खरग द्वीप से उसका 96% तेल निर्यात होता है। इसलिए खुद ही इस रास्ते को बंद करना चीन के साथ इरान के लिए भी नुकसानदायक होगा।

    दूसरे देशों से खराब हो सकते हैं रिश्ते
    इरान ने पिछले दो सालों में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ अपने रिश्ते सुधारने की कोशिश की है। ये दोनों देश भी अपने तेल निर्यात के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य रास्ते पर निर्भर हैं। उन्होंने इसराइल के हमलों की निंदा भी की है। ऐसे में इरान अगर जलसंधि को बंद करता है, तो इन देशों के साथ उसके रिश्ते खराब हो सकते हैं।

    भारत पर कितना असर
    भारत की तेल आयात करने की रणनीति पिछले दो सालों में काफी बदल गयी है। रूसी तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है। यह स्वेज नहर, केप आॅफ गुड होप या प्रशांत महासागर के रास्ते आता है। भारतीय रिफाइनरियों ने तेल रिफाइन करने और भुगतान करने के तरीके में बदलाव किया है। अब वे अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को रिफाइन कर सकती हैं। अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से तेल खरीदना महंगा है, लेकिन ये भी भारत के लिए विकल्प हैं। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य रास्ता बंद होने से भारत पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    ये भी हैं भारत के पास विकल्प
    अगर युद्ध और गहरा होता है या होर्मुज में कोई दिक्कत आती है, तो भारत रूस से ज्यादा तेल खरीदेगा। इससे भारत को तेल की उपलब्धता और कीमत, दोनों में राहत मिलेगी। भारत अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला और ब्राजील से भी ज्यादा तेल खरीद सकता है, लेकिन इसमें माल ढुलाई का खर्च ज्यादा आयेगा। इसके अलावा भारत अपनी रणनीतिक तेल भंडार का भी इस्तेमाल कर सकता है। इससे 9-10 दिनों तक तेल की जरूरत पूरी की जा सकती है।

    कुल मिला कर इसराइल-इरान संघर्ष में अमेरिका के कूदने का भारत पर कोई खास असर पड़ने की संभावना फिलहाल नहीं दिखती है। वैश्विक कूटनीति में भारत आज जिस नेतृत्व की मुद्रा में खड़ा है, वहां इसके असर की परीक्षा जरूर होगी, लेकिन फिलहाल तो भारत ‘विन-विन’ की स्थिति में है।

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