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    Home»विशेष»नीतीश यानी बिहार का विकास मंत्र, सौंप चले कमल को
    विशेष

    नीतीश यानी बिहार का विकास मंत्र, सौंप चले कमल को

    shivam kumarBy shivam kumarMarch 6, 2026Updated:March 6, 2026No Comments11 Mins Read
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    विशेष
    26 साल से लगातार भाजपा का इंतजार मूर्त रूप लेने को तैयार
    बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बना कर भाजपा पूरा करेगी संकल्प

    बिहार की राजनीति में एक युगांतकारी मोड़ सामने आया है। करीब 21 वर्षों से राज्य की सत्ता की धुरी रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब सक्रिय कार्यपालिका की भूमिका से हटकर संसद के उच्च सदन राज्यसभा में जाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने अपना विदाई संदेश भी दे दिया है और सत्ता की कमान भाजपा के हाथों में सौंप दी है। बिहार में नीतीश युग की समाप्ति के बाद पहली बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनायेगी और इसके साथ ही उसका एक संकल्प पूरा हो जायेगा। नीतीश कुमार ने पांच मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन का पर्चा दाखिल कर दिया है और अब नये मुख्यमंत्री के रूप में कई नामों को लेकर चर्चा है। वहीं 89 सीट के साथ भाजपा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए पूरी संभावना है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री भाजपा से होगा। नीतीश कुमार का यह कदम न केवल उनके लंबे राजनीतिक सफर का नया अध्याय माना जा रहा है, बल्कि बिहार की सत्ता संरचना में भी बड़े बदलाव का संकेत देता है। नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री 2000 में बने थे। उस समय उनका कार्यकाल महज सात दिनों का ही था। साल 2000 बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 67 सीटें मिली थीं और नीतीश की अगुवाई वाली समता पार्टी को 34 सीटें मिली थीं। आरजेडी की राबड़ी देवी सरकार गिर चुकी थी। बहुत जोड़तोड़ के बावजूद भी आरजेडी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पा रही थी। बहुमत के लिए 163 विधायकों की जरूरत थी, लेकिन आरजेडी 159 पर अटकी हुई थी। दूसरी तरफ एनडीए यानी समता पार्टी और भाजपा। भाजपा के पास 67 तो समता पार्टी के पास महज 34 ही विधायक थे। इसके बाद भी अटल बिहार वाजपेयी की अगुवाई वाली भाजपा ने नीतीश को अपना नेता चुना था और वह पहली बार बिहार के सीएम बने थे। उसके बाद उनकी असली पारी 2005 में शुरू हुई जब उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। उसके बाद से वह रुके नहीं। उन्होंने लगातार बिहार के विकास के लिए लगातार काम किया। उन्होंने कानून-व्यवस्था, आधारभूत ढांचे, सामाजिक न्याय और विकास के एजेंडे के साथ बिहार की राजनीति को नयी दिशा दी। उनके नेतृत्व में राज्य में कई व्यापक बदलाव आये, लेकिन सत्ता में उनकी निरंतर मौजूदगी ने उन्हें बिहार की राजनीति का केंद्रीय चेहरा बना दिया। राज्यसभा जाने के फैसले को राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि उच्च सदन में नीतीश कुमार न केवल बिहार, बल्कि संघीय ढांचे, सामाजिक न्याय और विकास से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। इस घटनाक्रम को भाजपा के नजरिये से देखा जाये, तो यह भगवा पार्टी की चिरलंबित आकांक्षा का पूरा होना है। पूर्वी भारत में बिहार और पश्चिम बंगाल ही ऐसे राज्य थे, जहां भाजपा का मुख्यमंत्री अब तक नहीं बना था। अब इस सूची में केवल पश्चिम बंगाल ही रह जायेगा। ऐसे में भाजपा के लिए यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण मोड़ है। क्या है बिहार के इस पूरे घटनाक्रम का मतलब और भाजपा ने कैसे हासिल किया यह लक्ष्य, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    होली के दिन ही बिहार में बड़े राजनीतिक उलटफेर के संकेत मिलने लगे थे। चर्चाओं का बाजार गर्म हो चुका था कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाने वाले हैं। लेकिन आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। लेकिन जैसे ही नीतीश कुमार ने मंगलवार 5 तारीख को एक पोस्ट डाला, बिहार की राजनीति में हड़कंप मच गया। राज्य में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नीतीश कुमार ने आखिरकार बिहार की राजनीति को एक तरह से अलविदा कह दिया है। उन्होंने राज्यसभा जाने की इच्छा जताते हुए विधानसभा जाकर नामांकन भर दिया है। इसके साथ ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री को लेकर मंथन शुरू हो गया है। इस बीच लोगों का सवाल है कि आखिर नीतीश कुमार ने यह फैसला क्यों किया। प्रदेश के सबसे सफल मुख्यमंत्री साबित हुए नीतीश कुमार कब तक कुर्सी पर बने रहेंगे। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार के कार्यकाल का आखिरी दिन कब होगा।

    10 अप्रैल को छोड़ेंगे मुख्यमंत्री का पद
    बताया जा रहा है बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर 10 अप्रैल, 2026 नीतीश कुमार के कार्यकाल का अंतिम दिन होगा। दरअसल मौजूदा राज्यसभा सदस्य हरिवंश का कार्यकाल नौ अप्रैल को खत्म हो रहा है। तब तक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने रहेंगे। इसका मतलब हुआ कि अभी एक महीने तक तो वह मुख्यमंत्री बने ही रहेंगे। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जदयू कोटे से दो बार से राज्यसभा सदस्य थे, लेकिन इस बार उनकी जगह खुद नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं।

    नीतीश ने खुद किया पोस्ट
    चार मार्च को होली के त्योहार के बीच से ही बिहार की राजनीति में जंगल की आग की तरह यह खबर फैल गयी थी कि नीतीश कुमार राज्यसभा जायेंगे। पांच मार्च को सुबह से भी अटकलें लगायी जा रही थीं। लेकिन सुबह 10.54 मिनट पर खुद ही एक्स पर ट्वीट कर उन्होंने राज्यसभा जाने की इच्छा जता दी। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि उनकी इच्छा थी कि बिहार विधान मंडल और संसद के दोनों सदस्यों का सदस्य बनूं। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाहता हूं। इसके कुछ देर बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उन्होंने विधानसभा जाकर राज्यसभा चुनाव में नामांकन कर दिया। नीतीश ने लिखा, संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूं। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूं। बिहार में बननेवाली नयी सरकार को मेरा मार्गदर्शन और समर्थन मिलता रहेगा।

    नीतीश ने मान ली भाजपा की बात
    दिल्ली की बात नीतीश कुमार ने तो मान ली, लेकिन भाजपा को बहुत चैन नहीं देना चाहेंगे। क्योंकि वह जानते हैं कि भाजपा को अगर वह अधिक चैन दे देंगे, तो जदयू कमजोर पड़ती चली जायेगी। नीतीश के नेतृत्व में बिहार के लोग सुरक्षित महसूस करते रहे हैं वरना, जिस कुर्मी जाति से वह आते हैं, उसकी आबादी तो महज 2.87 प्रतिशत ही है। भाजपा ने कुशवाहा जाति का नेता तलाश ही लिया है। सम्राट चौधरी तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की भी अपनी राजनीति है। सम्राट चौधरी की तरक्की में नीतीश कुमार कहीं से भी बाधा नहीं बनेंगे। बेटे निशांत के बारे में नीतीश कुमार की समझ स्पष्ट है। वे पार्टी में तुरंत स्वीकार्य हो जायेंगे, लेकिन जनता में बिना पसीना बहाए नहीं। उन्हें अभी बहुत कुछ सीखना होगा।

    दो दशक से लंबा कार्यकाल
    बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार के नाम कई रिकॉर्ड हैं। वह सबसे लंबे समय तक सीएम रहने वाले इकलौते शख्स हैं। कहा जाता था कि बिहार में कुछ भी बदल सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे। उन्होंने 3 मार्च 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन अपने पहले कार्यकाल में वह महज 7 दिन ही कुर्सी पर रह पाये। बहुमत का जुगाड़ न हो पाने के बाद 7 दिनों के भीतर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लालू प्रसाद यादव ने फिर से राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया। नीतीश कुमार एक या दो बार नहीं, पूरे 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। इस दौरान 20 साल से ज्यादा समय तक उन्होंने बिहार में मुख्यमंत्री के तौर पर काम किया।

    भाजपा ने ऐसे पूरा किया अपना संकल्प
    बिहार की राजनीति में भाजपा और जदयू का गठबंधन दशकों पुराना है, लेकिन समय के साथ इस गठबंधन की शक्ति का संतुलन अब पूरी तरह बदलता दिख रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला कर दिया है। इसके साथ ही कभी छोटे भाई की भूमिका में रहने वाली भाजपा आज बिहार में एनडीए की सीनियर पार्टनर बनने जा रही है।
    यह कहानी शुरू होती है 1990 के दशक के अंत में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ नीतीश कुमार ने एक गठबंधन तैयार किया। उस समय नीतीश कुमार की समता पार्टी का आधार बड़ा माना जाता था। आज से 26 साल पहले 2000 में झारखंड अलग होने से पहले का आखिरी चुनाव था। इस समय नीतीश कुमार की साख बिहार में निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित हो चुकी थी। नीतीश कुमार पहली बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। साल 2000 में नीतीश समता पार्टी में शामिल थे। आरजेडी की राबड़ी देवी सरकार गिर चुकी थी। बहुत जोड़तोड़ के बावजूद भी आरजेडी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पा रही थी। बहुमत के लिए 163 विधायकों की जरूरत थी लेकिन आरजेडी 159 पर अटकी हुई थी। दूसरी तरह एनडीए में शामिल समता पार्टी और बीजेपी थी। बीजेपी के पास 67 तो समता पार्टी के पास महज 34 ही विधायक थे। इसके बावजूद तत्कालीन राज्यपाल विनोंद्र चंद्र पांडेय ने एनडीए को सरकार बनाने का निमंत्रण दे डाला। 3 मार्च, 2000 को नीतीश कुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री पद के लिए शपथ ले ली। लेकिन अपने पहले कार्यकाल में वह महज 7 दिन ही कुर्सी पर रह पाये। बहुमत का जुगाड़ न हो पाने के बाद 7 दिनों के भीतर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लालू प्रसाद यादव ने फिर से राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया।

    2005 से नीतीश का सिक्का चलता गया
    वहीं अक्टूबर 2005 में जब नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी, तो जदयू ने 88 सीटें जीतीं और भाजपा ने 55 सीटें। नीतीश कुमार की पार्टी स्पष्ट रूप से सीनियर पार्टनर थी। 2010 के विधानसभा में नीतीश कुमार की लोकप्रियता का चरम था। जदयू ने 115 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 91 सीटों पर रही। सीट शेयरिंग में भी जदयू को ज्यादा सीटें मिली थीं। लेकिन जैसे ही 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की एंट्री होती है, तो नीतीश कुमार असहज हो गये। 2013 में भाजपा के द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया। उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन का गठन किया।
    2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले दम पर शानदार प्रदर्शन किया, जबकि जदयू मात्र दो सीटों पर सिमट गयी। यह पहला संकेत था कि बिहार में भाजपा का जनाधार अब स्वतंत्र रूप से बढ़ चुका है। 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार राजद के साथ गये। हालांकि वह चुनाव जीत गये, लेकिन भाजपा ने अकेले लड़कर भी 24.4% वोट शेयर हासिल किया, जो किसी भी अकेली पार्टी से ज्यादा था।

    भाजपा के सीनियर पार्टनर बनने का सफर
    2017 में नीतीश कुमार वापस एनडीए में आये, लेकिन अब भाजपा की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ चुकी थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू और भाजपा गठबंधन ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा को 74 सीटें मिलीं और जेडीयू को सिर्फ 43। यह पहला अवसर था, जब एनडीए के भीतर भाजपा, जदयू से काफी आगे निकल गयी। हालांकि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन संख्या बल के मामले में भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ गयी। इस चुनाव में चिराग पासवान ने जदयू की अधिकांश सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में जदयू और भाजपा को बराबर की सीटें मिलीं। दोनों के 12-12 सांसद चुनाव जीते। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं, जदयू 85 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। 2025 के चुनाव में एनडीए में रहते हुए जदयू पहली बार बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा। दोनों ही दलों ने 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।

    भाजपा के विकास के फैक्टर
    बिहार में भाजपा का कोर वोट बैंक लगातार स्थिर रहा, जबकि जदयू का वोट शेयर गठबंधन बदलने और एंटी-इंकंबेंसी के कारण प्रभावित हुआ। 2020 और 2025 के चुनावों में भाजपा का स्ट्राइक रेट जदयू की तुलना में काफी बेहतर रहा। 2014 के बाद से भाजपा ने बिहार के ग्रामीण इलाकों और अति पिछड़ा वर्ग (इबीसी) में अपनी स्वतंत्र पैठ मजबूत की, जो पहले कभी केवल नीतीश कुमार की ताकत मानी जाती थी।
    अब, जबकि बिहार में पहली बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार है, यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की जाति केंद्रित राजनीति पर इसका कितना और क्या असर पड़ता है। भाजपा को पता है कि दूसरे राज्यों की तरह बिहार की सत्ता आसान नहीं होगी, क्योंकि यहां राजनीति की अलग धारा बहती है। इसलिए आनेवाले दिन भाजपा के लिए और बिहार के लिए भी बेहद अहम होनेवाले हैं।

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