विशेष
साबित हो गया कि पूरी तरह खोखला हो चुका है पार्टी का सांगठनिक ढांचा
ना ही आलाकमान ही सीरियस है, जिसका नतीजा विधायक बेलगाम
इस कमजोर ढांचे से चुनाव जीतना तो दूर, खड़ी भी नहीं हो सकती है पार्टी
देश की संसद के ऊपरी सदन, यानी राज्यसभा की 37 सीटों के लिए चुनाव संपन्न हो गया और इसके नतीजे अप्रत्याशित रहे। भाजपा और एनडीए के उसके सहयोगी दलों ने 26 सीटें जीत कर सियासी रूप से अपनी श्रेष्ठता तो सिद्ध की ही, साथ ही विपक्ष, खास कर कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरियों को एक बार फिर बेपर्दा कर दिया। कांग्रेस के विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को खुलेआम चुनौती दी और क्रॉस वोटिंग कर भाजपा को लाभ पहुंचाया। कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरी का आलम यह है कि इन बागी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई करने से भी वह डर रही है। उसकी वजह भी है कि ज्यादातर कांग्रेस पार्टी के विधायक अपने दम पर राजनीति करते हैं। वह अपने क्षेत्र में अपनी छवि के कारण ही जीतते हैं। फिलहाल ओड़िशा में कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले तीन विधायकों को पार्टी से निकाल दिया है। पार्टी ने तीनों विधायकों को विधानसभा से अयोग्य घोषित करने के लिए स्पीकर को लेटर भी लिखा है। तीनों विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप राय के पक्ष में वोट दिया था। क्रॉस वोटिंग की वजह से कांग्रेस और बीजेडी के संयुक्त उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा। वहीं हरियाणा में कांग्रेस पांच विधायकों को नोटिस देने की तैयारी कर रही है। इस बीच हरियाणा कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रामकिशन गुर्जर ने पार्टी छोड़ दी है। दरअसल, दोनों राज्यों में कांग्रेस के कुल 8 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी। 16 मार्च को 11 सीटों पर हुए चुनाव में 9 सीटें एनडीए के खाते में गयीं। इससे पहले 10 राज्यों की 37 सीटों में से 26 सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध चुने गये थे। वास्तव में कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा इतना कमजोर है कि किसी की जवाबदेही तय नहीं होती। जिसे जो मन में आता है करते हैं। कोई भी कहीं भी अपने हिसाब से बयान दे देता है, जिसका लाभ भाजपा को समय-समय पर मिलता रहता है। भाजपा जब भी कमजोर होती है, कांग्रेस अपनी गलतियों से फिर उनकी साख बना देती है। राज्यसभा चुनाव के बाद अब अगले महीने चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं। ये चुनाव भाजपा के अस्तित्व का सवाल हैं। मुकाबला बेहद कड़ा है, लेकिन असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा कह रहे हैं कि कांग्रेस के कम से कम 30 प्रत्याशियों के टिकट तो वह तय करेंगे। बंगाल में कांग्रेस वैसे भी हाशिये पर है। वहां मुकाबला ममता और मोदी के बीच है। तमिलनाडु में भी कांग्रेस केवल तमाशबीन है और केरल में उसका दूसरे दलों के साथ गठबंधन है, जिसमें भाजपा सेंध लगा चुकी है। इस सियासी माहौल में कांग्रेस जर्जर, खोखली और कमजोर नजर आती है। कांग्रेस कहीं से भी भाजपा जैसे मजबूत संगठन को चुनौती देने की स्थिति में नहीं दिख रही है, तो इसका एक ही नतीजा हो सकता है कि विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा थोड़ी और मजबूत होकर सामने आये। राज्यसभा चुनाव में सामने आयी कांग्रेस की इसी कमजोरी की पृष्ठभूमि में उसके राजनीतिक संभावनाओं के बारे में बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
एक दिन पहले तीन राज्यों में संपन्न राज्यसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों की अप्रत्याशित जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भाजपा के चुनावी प्रबंधन का कोई जोड़ नहीं है। राज्यसभा चुनाव इसी बात की गवाही हैं। भाजपा नहीं जीती, कांग्रेस हिट विकेट हुई है। और 2014 लोकसभा से यही कहानी चल रही है। कांग्रेस इस पर नियंत्रण करना तो दूर की बात, सोच भी नहीं रही। वैसे हर राज्य की कहानी एक नहीं होती है। राजस्थान और हरियाणा विधानसभा चुनावों की हार खुद कांग्रेस के नेताओं के कारण हुई, मगर कोई कार्रवाई नहीं। और शायद पार्टी को यह भी नहीं मालूम कि ये दोनों राज्य मूलत: कांग्रेसी हैं। जब पूरे देश में, खासतौर से उत्तर भारत में कांग्रेस बिल्कुल सिमट गयी है, ये दोनों राज्य हर चुनाव में भाजपा का बराबरी का मुकाबला करते हैं। यहां की हारें केवल यहां के नेताओं के आपसी गुटबाजी के कारण हैं। बिहार और ओड़िशा में कांग्रेसियों की दम पर ही भाजपा जीत गयी। और हरियाणा में कांग्रेस की जीत की हेडिंग बस इतनी ही हो सकती है कि कांग्रेस हार की हैट्रिक से बची! लेकिन केवल इसलिए, क्योंकि भाजपा ने तीसरी बॉल विकेट पर फेंकी ही नहीं!
राज्यसभा चुनाव में क्यों हारी कांग्रेस
बिहार और ओड़िशा में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस क्यों हारी, इसका सीधा जवाब यही है कि पार्टी नेतृत्व ने इस चुनाव को जीतने के लिए गंभीरता से प्रयास किया ही नहीं। यह केवल इसलिए नहीं कहा जा रहा है कि क्रॉस वोटिंग के कारण हुई हार का मुख्य कारण कांग्रेस के विधायक रहे हैं, बल्कि इसलिए कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी कांग्रेस इस चुनाव के प्रति गंभीर नहीं रही। वह भी यह जानते हुए कि एक भी राज्यसभा की सीट जीत लेती, तो विपक्ष की ताकत राज्यसभा में बढ़ती और सियासी मैदान में जोरदार वापसी होती। बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर हुए चुनाव में पांचवीं सीट महागठबंधन जीत सकता था। जीत के लिए पर्याप्त आंकड़े भी थे। पर कांग्रेस इस चुनाव के प्रति गंभीर नहीं दिखी। राज्यसभा चुनाव के समय ऐसा लगा कि यह चुनाव राजद का है, राजद जाने। संख्या बल मौजूद रहते राज्यसभा की सीट के प्रति कांग्रेस आलाकमान ने बिहार का रुख नहीं किया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे या फिर राहुल गांधी को बिहार आकर अपने विधायकों को एकजुट रखने का प्रयास करना चाहिए था। लेकिन वह लगाव और जरूरत कांग्रेस के बड़े नेताओं ने नहीं समझा। नतीजतन बिहार कांग्रेस बेलगाम हो गयी।
प्रासंगिकता बनाये रखने की चुनौती
इन लगातार चुनावी हार के बाद कांग्रेस के सामने अब एक के बाद एक राज्यों में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने की चुनौती है। बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु तक कांग्रेस की हालत एक जैसी है। लचर होता कांग्रेस संगठन और सिकुड़ते जनाधार के साथ क्षेत्रीय दलों पर बढ़ रही निर्भरता है। पार्टी रणनीतिकारों के लिए भाजपा से मुकाबले के साथ क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता कम करने के लिए रणनीति बनाने की चुनौती है।
संगठन से किसी को मतलब नहीं
तो सवाल उठता है कि कांग्रेस की यह हालत क्यों है। कोई इस तरफ ध्यान क्यों नहीं देता। इन सवालों का एक ही जवाब है कि कांग्रेस के पास राजनीतिक विचार तो हैं, लेकिन उन विचारों को जमीन पर उतारनेवाला कोई नहीं है।
बिहार और ओड़िशा में लचर संगठन
कांग्रेस का राज्यस्तरीय संगठन कैसे काम करता है, इसका ताजा उदाहरण राज्यसभा चुनाव है। बिहार के प्रदेश अध्यक्ष अपने छह विधायकों को एकजुट नहीं रख सके और न ही उन्हें क्रॉस वोटिंग का अंदाजा ही हो सका। ओड़िशा में आठ विधायकों को बेंगलुरू में बाड़ेबंदी जरूर की गयी, लेकिन कांग्रेस के चाणक्य, यानी डीके शिवकुमार की यह रणनीति भी फेल कर गयी और भाजपा जीत गयी। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस में इस वक्त संगठन के नाम पर सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष हैं। जिलों में पार्टी की इकाइयां बनी ही नहीं हैं।
बंगाल में है कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
बिहार के बाद कांग्रेस के लिए सबसे कठिन चुनौती पश्चिम बंगाल है। यहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है। कांग्रेस का असर महज कुछ जिलों तक सिमटा है। वाम दलों के साथ गठबंधन के बावजूद पार्टी को जनता तक पहुंच बनाने में मुश्किल हो रही है। यहां 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला और वोट शेयर सिर्फ 2.94% तक सिमट गया। पार्टी का असर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों तक सीमित हो गया। इस बार के चुनाव में पार्टी पूरी तरह हाशिये पर है।
असम में मुश्किल है वापसी की राह
असम में 2016 से सत्ता से बाहर कांग्रेस अभी तक वापसी का रास्ता नहीं खोज पायी है। भाजपा ने यहां संगठन को जड़ से खड़ा किया है और लगातार दूसरी बार सरकार बनायी। यहां कांग्रेस ने चुनाव से पहले सांसद गौरव गोगोई जैसे नेता पर दांव खेला है। कांग्रेस का यहां बिहार और बंगाल के मुकाबले संगठन और जनाधार की हालत ठीक है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में 29 सीटें जीती और 29.7% वोट शेयर हासिल किया था। इस राज्य में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में वापस आने के लिए जोर लगा रही है। लेकिन पार्टी की अंदरूनी हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सीएम हिमंता बिस्वा सरमा दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस के 30 टिकट तो वह बांटेंगे।
तमिलनाडु में सहयोगी पर निर्भरता
तमिलनाडु में कांग्रेस पूरी तरह डीएमके के सहारे है। डीएमके के साथ गठबंधन में सीटें जरूर मिलती हैं, लेकिन कांग्रेस की स्वतंत्र पहचान लगभग समाप्त हो चुकी है। राज्य की राजनीति में पार्टी का कोई अलग जनाधार अब नहीं दिखता। यहां पार्टी का वोट शेयर सिर्फ 4.30% रह गया है।
कांग्रेस की यह अंदरूनी कमजोरी अब यह सवाल पैदा कर रही है कि इतने लचर और जर्जर संगठन की मदद से उसके लिए भाजपा को चुनौती देना तो दूर, खड़ा हो पाना भी मुश्किल है। कांग्रेस के सामने वापसी का कोई रास्ता अब नहीं बचा है, क्योंकि दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने लायक रोशनी उसकी आंखों में नहीं बची है और न ही वह इतनी मजबूत है कि उस इबारत को बदल सके।

