Close Menu
Azad SipahiAzad Sipahi
    Facebook X (Twitter) YouTube WhatsApp
    Tuesday, April 21
    • Jharkhand Top News
    • Azad Sipahi Digital
    • रांची
    • हाई-टेक्नो
      • विज्ञान
      • गैजेट्स
      • मोबाइल
      • ऑटोमुविट
    • राज्य
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
    • रोचक पोस्ट
    • स्पेशल रिपोर्ट
    • e-Paper
    • Top Story
    • DMCA
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Azad SipahiAzad Sipahi
    • होम
    • झारखंड
      • कोडरमा
      • खलारी
      • खूंटी
      • गढ़वा
      • गिरिडीह
      • गुमला
      • गोड्डा
      • चतरा
      • चाईबासा
      • जमशेदपुर
      • जामताड़ा
      • दुमका
      • देवघर
      • धनबाद
      • पलामू
      • पाकुर
      • बोकारो
      • रांची
      • रामगढ़
      • लातेहार
      • लोहरदगा
      • सरायकेला-खरसावाँ
      • साहिबगंज
      • सिमडेगा
      • हजारीबाग
    • विशेष
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • देश
    • दुनिया
    • राजनीति
    • राज्य
      • मध्य प्रदेश
    • स्पोर्ट्स
      • हॉकी
      • क्रिकेट
      • टेनिस
      • फुटबॉल
      • अन्य खेल
    • YouTube
    • ई-पेपर
    Azad SipahiAzad Sipahi
    Home»लाइफस्टाइल»ब्लॉग»दब कर जीनेवाले लोग
    ब्लॉग

    दब कर जीनेवाले लोग

    आजाद सिपाहीBy आजाद सिपाहीJanuary 2, 2017No Comments4 Mins Read
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Share
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram LinkedIn Pinterest Email

    राहुल पांडेय : मैं असुरक्षित हूं। अंग्रेजी में इसी डायलॉग के साथ प्रसिद्ध अभिनेता लियोनार्डो डिकैप्रियो की फिल्म द एवियेटर शुरू होती है जिसकी कहानी में अभिनेता कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न पहुंच जाए, असुरक्षा के बोझ तले दबते-दबते अंतत: उसका दिमाग हिल ही जाता है। फिल्म की शुरूआत में उसे असुरक्षा का बोध उसकी मां की तरफ से मिलता है। आमतौर पर हमें हमारी असुरक्षा का बोध मां-बाप से मिलना शुरू होता है जो रोजमर्रा के जीवन में अपने साथ काम करने वाले कर्मियों और दोस्तों से भी बार बार मिलता रहता है। अपने मन में तो वह हमारे भले के लिए बार बार हमें असुरक्षित महसूस कराते रहते हैं, लेकिन अक्सर कई लोगों पर इसका विपरीत असर पड़ने लगता है। हॉस्टल में मेरे सामने वाले कमरे में केरल से आया जॉर्ज रहता था। उसे हर वक्त असुरक्षा का खौफ परेशान करता रहता था। मैं उससे बात किया करता था, लेकिन उसके मूड का कभी कुछ पता नहीं रहता था कि वह कब मारपीट करने लग जाये।

    पूरे हॉस्टल में मैं, कनार्टक से आया एंथनी परेरिया और असम से आया ध्रुबा ज्योति सैकिया ही उससे बात किया करते थे तो सिर्फ इसलिए कि वह खुद को अकेला या असुरक्षित महसूस न करे। हम उसकी असुरक्षा का वह बोध नहीं हटा पाये और हॉस्टल के अंतिम दिनों में एक रात उसे आखिरकार दौरा पड़ ही गया। बड़ी मुश्किल से हमने उसे बांधा और एंबुलेंस बुलाकर अस्पताल में भर्ती कराया। इस घटना के तकरीबन नौ साल बाद अचानक उसका फोन मेरे पास आया। वह केरल के अपने गांव में शिफ्ट हो चुका था। बहुत ज्यादा बात नहीं हुई, उसने मेरा हाल चाल लिया। मैंने उससे सिर्फ इतना पूछा कि क्या अब खुश हो? वह फोन पर ही खिलखिला उठा। असुरक्षा की भावना एक बार अगर घर कर जाती है तो जाती नहीं, अलबत्ता कहीं दब जाती है। उसकी खिलखिलाहट में भी मुझे वह दबी हुई असुरक्षा सुनाई दे रही थी।

    इस एक घटना ने मेरे सुरक्षा और असुरक्षा के सारे बोध पर सवालिया निशान खड़ा कर रखा है और अक्सर मैं सोचता हूं कि जॉर्ज के मामले में मुझसे गलती कहां हुई थी? अपने साइकायट्रिस्ट दोस्तों से हुई बातचीत में मैंने पाया कि पहली बात यह कि हमें किसी को भी यह बोध नहीं देना चाहिए। अक्सर लोग उसका वह मतलब नहीं निकालते हैं, जो हम उन्हें देना चाहते हैं। जैसे मैं जॉर्ज को सुरक्षित होने की बात कहता और वह और भी ज्यादा डर जाता। साइकायट्रिस्ट ने मुझे बताया इसी तरह से अगर किसी को यह कहते हैं कि वह असुरक्षित है तो वह जरूर कोई बंबास्टिक कारनामा कर सकता है क्योंकि असुरक्षित कोई भी नहीं रहना चाहता। डरकर भी कोई नहीं रह सकता।
    अगर किसी को कहते हैं कि वह सुरक्षित है तो ठीक उसी वक्त कहीं न कहीं उसके अंदर-बाहर फैली असुरक्षा की भी सूचना दे रहे होते हैं। जॉर्ज के बाद भी मैं लगातार ऐसे लोगों से मिलता रहा जो भारी असुरक्षा के बोध तले खुद को दबाए रहते हैं और एक दबी हुई जिंदगी छूटती सांस की तरह जीते चले जाते हैं। जॉर्ज के बारे में अपने साइकायट्रिस्ट दोस्तों से जो मेरी बहस हुई, उसका अंत इसी बात पर हुआ कि जैसे ही मुझे किसी में यह लगने लगे कि वह खुद को असुरक्षित समझता है या व्यापक सुरक्षाबोध के किसी खांचे में रहता है, उससे दूर रहूं। दोनों ही तरह के लोग कहीं न कहीं नुकसान पहुंचाते हैं और सिर्फ इसलिए क्योंकि इस तरह के बोध उनकी मानसिक समस्याएं हैं। मैं तो खैर ऐसे लोगों से दूर भागने लगा हूं, दुख बस यही है कि उन्हें जहां से भागना होता है, वह वहां से कभी नहीं भागते।

    Share. Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Previous Articleटिकट वितरण के साथ ही सपा में मतभेद उजागर
    Next Article आज से काम करने लगेगा राज्य विकास परिषद
    आजाद सिपाही
    • Website
    • Facebook

    Related Posts

    मंगलवार शाम आसमान में दिखेगा अद्भुत नजारा, दो ग्रहों-दो तारों के साथ होगा चांद का मिलन

    May 22, 2023

    कभी हिल स्टेशन के नाम से मशहूर रांची आज हीट आइलैंड इफेक्ट के प्रभाव में

    May 19, 2023

    अखंड सौभाग्य के लिए महिलाओं ने की वट सावित्री की पूजा

    May 19, 2023
    Add A Comment

    Comments are closed.

    Recent Posts
    • नोएडा श्रमिक हिंसा मामले में बिगुल मजदूर दस्ता के दो सदस्य गिरफ्तार
    • अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री नेपाल के तीन दिन के दौरे पर काठमांडू पहुंचे
    • पाकिस्तान के बलोचिस्तान में विद्रोहियों से झड़प में तीन पुलिस जवान मारे गए
    • फिल्म ‘भूत बंगला’ ने पहले वीकेंड में दिखाई ताकत, तीन दिन में की 58 करोड़ की कमाई
    • सर्राफा बाजार में मामूली गिरावट, सोना और चांदी की फीकी पड़ी चमक
    Read ePaper

    City Edition

    Follow up on twitter
    Tweets by azad_sipahi
    Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

    Palamu Division

    • Garhwa
    • Palamu
    • Latehar

    Kolhan Division

    • West Singhbhum
    • East Singhbhum
    • Seraikela Kharsawan

    North Chotanagpur Division

    • Chatra
    • Hazaribag
    • Giridih
    • Koderma
    • Dhanbad
    • Bokaro
    • Ramgarh

    South Chotanagpur Division

    • Ranchi
    • Lohardaga
    • Gumla
    • Simdega
    • Khunti

    Santhal Pargana Division

    • Deoghar
    • Jamtara
    • Dumka
    • Godda
    • Pakur
    • Sahebganj

    Subscribe to Updates

    Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

    © 2026 AzadSipahi. Designed by Launching Press.
    • Privacy Policy
    • Terms
    • Accessibility

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Go to mobile version