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    Home»Breaking News»झारखंड में फिर सिर उठाने लगे हैं नक्सली
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    झारखंड में फिर सिर उठाने लगे हैं नक्सली

    azad sipahiBy azad sipahiNovember 26, 2021No Comments6 Mins Read
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    पुलिस का शिकंजा ढीला पड़ते ही बढ़ गयी है गतिविधि

    कब से कहा जा रहा था कि झारखंड से नक्सलियों के पांव उखड़ने को हैं। लक्षण भी कुछ इसी तरह के दिख रहे थे। सुरक्षा बलों ने माओवादियों के सबसे बड़े नेता प्रशांत बोस और उसकी पत्नी को क्या पकड़ा, कि नक्सलियों ने एक बार फिर अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी है। पहले भारत बंद के दौरान उन्होंने झारखंड के कई स्थानों पर रेल पटरियों को निशाना बनाया और अब झारखंड बंद के दौरान इन नक्सलियों की दहशत राज्य के ग्रामीण इलाकों में बखूबी महसूस की जा सकती है। तीन दिन के बंद के दौरान कई जिलों में बस और दूसरे सार्वजनिक वाहनों का परिचालन बंद है, हाट-बाजार बंद हैं और लोग घरों में कैद हैं। दहशत का यह आलम आज से 15-20 साल पहले हुआ करता था, जब नक्सलियों के एक आह्वान पर जनजीवन ठहर जाया करता था। इस बात में कोई संदेह नहीं कि नक्सलियों ने पिछले कुछ दिनों में राज्य में अपने पैर मजबूत किये हैं और कोयला और बालू के साथ बीड़ी पत्ता के कारोबार से लेवी वसूल कर खुद को आर्थिक रूप से मजबूत किया है। यह बेहद चिंता का विषय है, क्योंकि नक्सलियों की सक्रियता से झारखंड के विकास की गाड़ी की रफ्तार कम हो जायेगी और यह राज्य एक बार फिर दो दशक पीछे लौट जायेगा। इसलिए इस समस्या पर तत्काल ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है। झारखंड में नक्सली वारदातों में अचानक हुई अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी और इसके संभावित परिणामों का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के राज्य समन्वय संपादक अजय शर्मा की खास रिपोर्ट।

    घटना 2004 की है। रांची में एक सरकारी बैंक के अधिकारी को आॅफिस के काम से सिमडेगा जाना पड़ा था। अगले दिन वह वहां से लौट रहे थे, लेकिन उनकी गाड़ी सिमडेगा से बाहर नहीं निकल सकी, क्योंकि नक्सलियों ने बंद बुला रखा था और पूरा शहर बंद था। अधिकारी को किसी तरह 24 घंटे वहां बिताना पड़ा। संयोग से वही अधिकारी फिर रांची में हैं। दो दिन पहले उन्हें गुमला जाना था, लेकिन वह नहीं गये, क्योंकि नक्सलियों ने बंद बुला रखा था। उक्त अधिकारी ने कहा कि उन्हें लग रहा था कि झारखंड से नक्सली समस्या खत्म हो गयी है, लेकिन जिस तरह यहां रेल पटरियां उड़ायी जा रही हैं और दहशत का माहौल है, उससे तो 2003-04 की याद आ गयी। बीच में तो ऐसी कोई घटना सामने नहीं आती थी।

    बैंक अधिकारी का निष्कर्ष बहुत हद तक सही था। आज से 10 साल पहले तक नक्सली बंद और रेल पटरियों को उड़ाये जाने की खबर अकसर आती रहती थी। नक्सली मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के जवानों के मारे जाने की खबर भी मिलती थी और लेवी के लिए उत्पात मचाने की घटनाएं भी सामने आती थीं। लेकिन धीरे-धीरे यह सब बंद होता गया। पुलिस ने इसे अपनी रणनीतिक सफलता मान कर नक्सलियों के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान को खत्म नहीं, तो ढीला जरूर कर दिया।

    बिहार से अलग निकल कर झारखंड राज्य बने तो करीब दो दशक गुजर गये। इस दौरान कई सरकारें आयीं और कई सरकारें चली गयीं, कई मुख्यमंत्री बने और कई सत्ता से दूर हुए, लेकिन नक्सलवाद की समस्या तब भी थी और आज भी है। सभी सरकारें इसे चुनौती के रूप में लेते हुए खत्म करने का वादा जरूर करती रहीं। कई राजनीतिक दल नक्सलवाद को खत्म करने के वादे के साथ सत्ता तक पहुंच भी गये, लेकिन लोगों के लिए यह समस्या आज भी बनी हुई है।

    झारखंड अलग राज्य बनने के बाद इस राज्य को नक्सली समस्या विरासत में मिली थी। पहले नक्सलियों के निशाने पर ग्रामीण इलाकों के दबंग लोगों से लेकर सुरक्षा बल तक होते थे। यही कारण है कि अलग राज्य बनने से लेकर अब तक झारखंड में पांच सौ से अधिक अधिकारियों-जवानों ने नक्सली हिंसा में अपने प्राणों की आहुति दी है। झारखंड में नक्सली हमेशा से ही नासूर रहे हैं। हाल के दिनों में यह दावा किया जाता रहा है कि नक्सली पहले की तुलना में कमजोर पड़े हैं, लेकिन हाल की घटनाओं को देखा जाये, तो नक्सली लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं और पुलिस को मात देने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

    नक्सलियों की सक्रियता इनके सबसे बड़े नेता और इस्टर्न रीजनल ब्यूरो के सचिव प्रशांत बोस, सेंट्रल कमेटी सदस्य शीला मरांडी और अन्य की गिरफ्तारी के बाद कई गुना बढ़ गयी है। गिरफ्तारी के विरोध में नक्सलियों ने पहले प्रतिरोध दिवस मनाया और फिर 25 नवंबर तक बंद का आह्वान किया। इस दौरान लातेहार, चाईबासा और खूंटी में वारदातें भी हुईं। लेकिन पुलिसिया एहतियात से वारदातों पर लगाम लगी। राज्य पुलिस के आला अधिकारियों के मुताबिक, नक्सल प्रभाव वाले सभी जिलों में अभियान चलाया जा रहा है, ताकि माओवादी किसी वारदात को अंजाम नहीं दे सकें। वहीं, सीमावर्ती इलाकों में विशेष चौकसी बरती जा रही है।

    नक्सलियों की इस सक्रियता के पीछे दरअसल आर्थिक कारण है। नक्सली समस्या को खत्म करने के लिए सुरक्षा बलों ने जो दोहरी रणनीति अपनायी थी, वह कारगर साबित हुई थी। इसके तहत पु्लिसिया कार्रवाई के साथ उनके आर्थिक स्रोत को खत्म करने पर जोर दिया गया था। इसके अपेक्षित परिणाम भी निकले। पुलिस को पता है कि कोयल शंख जोन से नक्सलियों को सर्वाधिक लेवी मिलती है। इस जोन में सरकारी विकास योजनाओं, बीड़ी पत्ता कारोबार (हरा सोना), बालू खनन (सुनहरा सोना) और इस इलाके में कोयला खनन (काला सोना) से लेवी की वसूली होती है। सुरक्षा बलों को जानकारी है कि हर साल इस इलाके से करीब ढाई सौ करोड़ रुपये की लेवी वसूली जाती है। सुरक्षा बलों की रणनीति के कारण इस वसूली पर लगाम लगी, तो नक्सली कमजोर हो गये, लेकिन जैसे ही सुरक्षा बलों का शिकंजा ढीला पड़ा, वे फिर से सिर उठाने लगे हैं। जैसे-जैसे बालू और कोयला की तस्करी की रफ्तार बढ़ रही है, वैसे-वैसे नक्सली आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। बालू तस्करी के मामले में चतरा, डालटनगंज, गढ़वा, लातेहार उफान पर है। रांची के तमाड़, खूंटी में भी बालू की तस्करी चरम पर है।

    पुलिस और खुफिया एजेंसियों को जो सूचनाएं मिली हैं, उसके मुताबिक प्रशांत बोस की गिरफ्तारी के बाद पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा की टीम ज्यादा आक्रामक है। मिसिर बेसरा की टीम प्रशांत बोस की गिरफ्तारी में शामिल पुलिसकर्मियों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों को चिह्नित करने में जुटी है। लेकिन पुलिस कहती है कि झारखंड में नक्सलियों की इस बढ़ती सक्रियता के खिलाफ अभियान तेज करने की कवायद शुरू हो गयी है। यह बेहद जरूरी है, क्योंकि दहशत के माहौल में विकास की कल्पना बेमानी है। झारखंड में सुरक्षा बलों को अपना शिकंजा अभी कसना होगा, ताकि नक्सलियों का फन कुचला जा सके। यही नहीं, बालू और कोयला तस्करी पर भी पूर्ण रूप से नकेल कसनी होगी, तभी नक्सलियों से झारखंड को निजात मिल सकती है।

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