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    Home»Breaking News»इस दिसंबर में खत्म हो जायेगी कोरोना महामारी!
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    इस दिसंबर में खत्म हो जायेगी कोरोना महामारी!

    azad sipahiBy azad sipahiMay 28, 2021No Comments15 Mins Read
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    आज दुनिया जिस कोरोना महामारी के कहर से कराह रही है, उसकी उम्र दो साल ही है! दुनिया भर में इस मुद्दे पर शोध हो रहे हैं और इन सबका निचोड़ यही है। इसके अलावा पिछली शताब्दी की शुरूआत में फैली मानव इतिहास की अब तक की सबसे खतरनाक महामारी स्पेनिश फ्लू के इतिहास के अध्ययन से भी यह बात साबित होती है। क्या है स्पेनिश फ्लू का इतिहास और तथ्य तथा इसकी पृष्ठभूमि में कोरोना महामारी की संभावित उम्र के बारे में आजाद सिपाही के टीकाकार राकेश सिंह का विशेष आलेख।

    कोरोना से भी खतरनाक थी इनफ्लुएंजा महामारी। उसका विख्यात नाम स्पेनिश फ्लू था। उसने दुनिया भर में 50 करोड़ लोगों को संक्रमित किया था। इस महामारी ने पांच करोड़ लोगों की जान ले ली थी। उसके बाद महामारी तो कई तरह की आयी और गयी, लेकिन मानव इतिहास में इतनी खतरनाक महामारी अभी तक नहीं देखी गयी। असल में स्पेनिश फ्लू को इनफ्लुएंजा कहा जाता है। इसका स्पेन से कोई लेना-देना नहीं है। पहला विश्व युद्ध चालू था, जिसकी शुरूआत नवंबर 1914 में हो चुकी थी। 1918 आते-आते यह समाप्ति पर था, लेकिन जैसे ही यह ठंडा पड़ने लगा, एक अनजानी बीमारी का पारा चढ़ने लगा। मार्च 1918 में अमेरिका में फ्लू जैसा रोग उभर कर आने लगा। करीब एक सौ लोग इसकी चपेट में आये। अमेरिकी सैनिकों के बंकरों से शुरू हुआ यह सिलसिला अब महामारी की शक्ल लेने को तैयार बैठा था। पहले विश्व युद्ध में जहां सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दो करोड़ लोग मारे गये थे, वहीं अब एक अनजाने वायरस से पांच करोड़ लोग मारे जानेवाले थे। कहा तो यहां तक जाता है कि मरनेवालों की संख्या करीब 10 करोड़ थी और सिर्फ भारत में मरने वालों की संख्या सवा करोड़ के आस-पास थी। भारत में इसे बांबे इनफ्लुएंजा या बांबे फीवर के नाम से जाना जाने लगा था। हालांकि वैश्विक महामारी इनफ्लुएंजा की उम्र दो साल तक रही और इसमें कुल तीन लहरें आयी थीं। पहला केस अल्बर्ट गिटशैल नामक अमेरिकी सेना के एक रसोइये में कैंप फुनस्टोन (कंसास) में पाया गया था, जिसे 104 डिग्री बुखार में अस्पताल में भर्ती किया गया था। यह वाकया 11 मार्च 1918 को हुआ था। यह बीमारी मतलब वायरस बहुत ही तेजी से अमेरिकी सेना के 54 हजार जवानों और उनके घर-परिवार के लोगों में फैल गयी थी। उस समय 11 सौ सैनिकों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें 38 सैनिकों की मौत हो गयी थी। पता चला कि उनके शरीर में निमोनिया पनप रहा था।

    जांच में पाया गया था कि यह निमोनिया वायरस के चलते ही पनप रहा था और घातक रूप ले रहा था। इससे लोगों को बुखार आता था और सांस फूलती थी, जिस कारण मौत हो रही थी। इसके बाद जैसे ही अमेरिकी सेना ने यूरोप की तरफ अपना रुख किया, तो अपने साथ वे उस अनजान वायरस को भी लेते गये और अप्रैल-मई 1918 तक इसका संक्रमण जंगल की आग की तरह इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन और इटली में फैल गया। एक अनुमान के अनुसार तीन चौथाई फ्रांसीसी सेना में यह संक्रमण बसंत ऋतु तक फैल गया और ब्रिटिश सेना के आधे सैनिक भी लगभग संक्रमित हो चुके थे।
    ऐसा पाया गया था कि इस महामारी की पहली लहर बहुत घातक नहीं थी। लोगों में हलके बुखार के लक्षण और कमजोरी पायी जा रही थी, जो तीन दिनों तक रहता था और फिर ठीक हो जाता था। मौत का आंकड़ा बहुत नहीं था। इसमें जिनकी भी मौत हुई, उनमें से बहुत में निमोनिया के लक्षण पाये गये थे। सीमित सार्वजनिक आंकड़ों के मुताबिक मृत्यु दर उतनी ही थी, जितनी मौसमी फ्लू में होती थी।

    अब दूसरी लहर की जानकारी देने के पहले सवाल यह उठता है कि इस वैश्विक महामारी का नाम स्पेनिश फ्लू कैसे पड़ा, जबकि स्पेन से इसका दूर-दूर तक नाता नहीं था। स्पेन पहले विश्व युद्ध में तटस्थ की भूमिका में था, जो उसके पड़ोसी यूरोपीय देशों से अलग रुख था। फ्रांस, इंग्लैंड, और अमेरिका की मीडिया को युद्ध को प्रभावित करने और सैनिकों में वायरस का संक्रमण फैलने के बारे में कोई जानकारी देने की इजाजत नहीं थी। यहां स्पेन की मीडिया निष्पक्ष भूमिका में आयी और वैश्विक महामारी से जुड़ी खबरें को उसने बेधड़क बताना शुरू किया। उस दौरान सिर्फ स्पेनिश पत्रकार फ्लू की खबरों को ब्रेक कर रहे थे। इसलिए विश्व में यह स्पेनिश फ्लू से चर्चित हो गया। देखते-देखते 1918 की गर्मियों में पहली लहर शांत पड़ती दिखने लगी और मामलों में काफी गिरावट आयी। लोग निश्चिंत होने लगे। उन्हें लगा कि इस वायरस की उम्र बस अब अगस्त के महीने तक ही सीमित है। लेकिन यह तूफान के आने से पहले की शांति थी। यूरोप में कहीं इस वायरस का म्यूटेंट स्ट्रेन पाया गया, जो 24 घंटे के अंदर स्वस्थ और जवान व्यक्ति को मार सकता था। यह अब आनेवाली आंधी का ऐसा संकेत था, जिससे पूरा विश्व प्रभावित होनेवाला था। अगस्त की आखिरी तारीख में जब सेना का एक पोत इंग्लिश पोर्ट सिटी के लिए रवाना हुआ, तब यह पता नहीं था कि इसमें संक्रमित जवान भी हैं। वायरस के म्यूटेशन का दौर चल रहा था, जो बहुत की खतरनाक शक्ल लेनेवाला था। और जब यह पोत फ्रांस के ब्रेस्ट की, अमेरिका के बॉस्टन और पश्चिम अफ्रीका के फ्रीटाउन जैसे शहरों में पहुंचा, तभी वैश्विक महामारी की दूसरी लहर का आगमन हो गया। कहा जाता है कि सेना की टुकड़ियों का एक देश से दूसरे देश में इतनी मात्रा में आना जाना ही इस वायरस के फैलने का मुख्या कारण बना। सितंबर महीने से लेकर नवंबर तक इस महामारी से मरनेवालों की संख्या आसमान छूने लगी। सिर्फ अक्टूबर महीने में अमेरिका में लगभग दो लाख लोगों की मृत्यु हुई। आम मौसमी फ्लू में ऐसा देखा गया था कि यह ज्यादातर युवा या बुजुर्गों को ही अपना शिकार बनाता था। लेकिन स्पेनिश फ्लू की दूसरी लहर ने ज्यादातर मध्य आयु वर्ग के लोगों को मतलब 25 से 35 वर्ष तक के लोगों को अपना शिकार बना रहा था। यह सामान्य नहीं था। पूरी दुनिया में न सिर्फ जवान मर्द-औरतें मर रहे थे, बल्कि चौंकानेवाली बात उनके मरने की प्रक्रिया थी। किसी की नाक से खून आने लगता, तो कोई फफोला वाले बुखार का शिकार बनता। किसी के फेफड़े में निमोनिया विकसित होने लगती, तो कोई पल्मोनरी एडिमा का शिकार हो रहा था। जो लोग दमा, मधुमेह, हृदय रोग जैसी बीमारियों से ग्रसित थे, उन्हें तो स्पेनिश फ्लू के इस स्ट्रेन ( एच1एन1 ) ने तबाह कर रखा था। उनकी मृत्यु ज्यादा हो रही थी। स्पेनिश फ्लू का एच1एन1 स्ट्रेन बहुत ही घातक था और यही स्ट्रेन स्पेनिश फ्लू के विस्फोट का कारण बना। लोग साइकोटाइन स्टॉर्म या यूं कहें कि साइकोटाइन एक्सप्लोजन का शिकार बनते गये।

    जब भी हमारे शरीर में कोई वायरस प्रवेश करता है, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता उससे लड़ती है और उसे खत्म कर देती है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हमारा इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाता है और बीमारी से लड़ने के साथ-साथ हमारे शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाने लगता है। इसे ही ‘साइटोकाइन स्टॉर्म’ कहा जाता है। दूसरी लहर ने इंसानी फेफड़ों को ऐसा संक्रमित किया कि मौत भी खुद को देख कर सिहर गयी। पूरी की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराने लगी। जब 1918 में पहली बार फ्लू ने दस्तक दी, तब डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को समझ में नहीं आ रहा था कि इस बीमारी का इलाज कैसे किया जाये, क्योंकि उस दौर में ना ही कोई प्रभावी वैक्सीन थी या एंटी वायरल दवा, जो उस फ्लू से निजात दिला सकती थी। उस वक़्त इस बीमारी से लड़ने के लिए डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की भी भारी किल्लत थी, क्योंकि पहला विश्वयुद्ध भी चल रहा था। स्पेनिश फ्लू की जब पहली लहर आयी, तब अगर लोगों को क्वारेंटाइन में रहने या सख्त लॉकडाउन का निर्देश मिल गया होता या दूसरी लहर की शुरूआत में भी अगर सरकारों ने यह आदेश निकाल दिया होता, तो शायद यह महामारी इतने बड़े पैमाने पर नहीं फैलती। लेकिन पहला विश्व युद्ध चल रहा था और सरकारें नहीं चाह रही थीं कि युद्ध किसी भी तरीके से प्रभावित हो।

    जब डॉक्टरों को फ्लू का इलाज नहीं मिल पा रहा था, तो बहुत से डॉक्टरों ने लक्षणों के आधार पर इलाज करना और दवा देना शुरू किया। इनमें एस्पिरिन दवा भी शामिल थी, जिसे बेयर नामक कंपनी ने 1899 में ट्रेड मार्क किया था और जिसका पेटेंट 1917 में एक्सपायर हो गया था। इसका मतलब यह था कि अब नयी कंपनियां स्पेनिश फ्लू के दौर में इस दवा को बड़े पैमाने पर बना सकती थीं। जब लगातार मौत का आंकड़ा बढ़ रहा था, अमेरिका के सर्जन जनरल, नेवी और अमेरिकी मेडिकल एसोसिएशन की पत्रिका ने एस्पिरिन के इस्तेमाल की सिफारिश कर दी। उसके बाद चिकित्सकों ने आम जनता को रोज 30 ग्राम का डोज लेने के लिए सार्वजनिक कर दिया। जबकि आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कहता है कि चार ग्राम से ज्यादा मात्रा में डोज लेना प्राणघातक है। इस दवा के इस्तेमाल के बाद पाया गया कि अक्टूबर 1918 में लोगों के मरने की संख्या ज्यादा बढ़ गयी और ये मौतें इस दवा के जहर से, मतलब हाई डोज से हुईं। 1918 के दिसंबर में दूसरी लहर खत्म हुई और इसकी तीसरी लहर ने 1919 के जनवरी में आॅस्ट्रेलिया में दस्तक दी और उसके बाद फिर से अमेरिका और यूरोप में। इस महामारी की तीसरी लहर ने अमेरिका के राष्ट्रपति को भी अपनी चपेट में ले लिया। अप्रैल 1919 में जब विश्व युद्ध खत्म करने के लिए शांति वार्ता हुई, उसी दौरान वूड्रो विल्सन भी इनफ्लुएंजा के लक्षण के शिकार हो गये। ह्वाइट हाउस ने राष्ट्रपति की गंभीर हालत की खबर छिपा कर रखी और जानकारी दी कि राष्ट्रपति को सिर्फ सर्दी-खांसी ही हुई है। जुलाई में उनकी तबीयत ठीक हुई और वह अमेरिका वापस आ गये। स्पेनिश फ्लू की तीसरी लहर में भी मौत दूसरी लहर की ही तरह उसी तेजी से हो रही थी, लेकिन चूंकि विश्व युद्ध अब खत्म हो गया था, तो वायरस दूसरी लहर की तरह अधिक फैल नहीं पाया। जिस वैश्विक महामारी की शुरूआत 1918 में हुई, उसका अंत 1920 में हुआ।

    इससे जोड़ कर अगर कोरोना वायरस के स्ट्रेन और स्पेनिश फ्लू के दौरान एच1एन1 वायरस के स्ट्रेन को देखा जाये, तो काफी समानताएं हैं। बीमार होने के लक्षण भी वही हैं। सर्दी-खांसी से शुरू होती यह बीमारी बुखार के साथ-साथ फेफड़ों में जाकर निमोनिया विकसित कर देती है और मरीजों में संक्रमण इतनी तेजी से फैलना शुरू हो जाता है कि सही समय पर अगर इसका इलाज नहीं किया जाये, तो उसका बचना नामुमकिन हो जाता है। कोरोना वायरस की पहली लहर भी बहुत घातक नहीं थी। वह आम फ्लू के लक्षणों जैसी ही थी, लेकिन फिर भी यह आम नहीं थी। मौतें तब भी हुई थीं, लेकिन कम थीं। जब कोरोना की दूसरी लहर आयी, तब मानो मौत और संक्रमण की सुनामी आ गयी। यहां भी क्या जवान, क्या बुजुर्ग, सभी के सभी इससे संक्रमित होने लगे और मौत का आंकड़ा जवान लोगों, जिसमें खास कर 25 से 35 साल वाले मध्य आयुवर्ग के लोगों के लिए प्राणघातक हो गयी। ज्यादा जवान मरीज साइकोटाइन स्टॉर्म के शिकार हो गये और उनकी मृत्यु दर बढ़ने लगी। 1918 की तरह 2020 में भी भारत में सरकार ने प्रोटोकॉल के हिसाब से दवाओं की सूची जारी कर दी, जिसमें भी कोरोना के शुरूआती लक्षण दिखें, वे सरकार द्वारा जारी दवा लेना शुरू कर दे। हुआ भी यही। लोगों ने भारी मात्रा में दवा का सेवन करना शुरू कर दिया, लेकिन 1918 के चिकित्सा विज्ञान के मुकाबले अभी का चिकित्सा विज्ञान बहुत विकसित है। लिहाजा दवाएं उचित मात्रा में सरकार ने देना शुरू किया, जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि मौतें पहले की तुलना में कम हुर्इं। लेकिन इस बार भी कोरोना वायरस में बहुत सी ऐसी दवाओं का इस्तेमाल शुरू हो गया, जिसने मरीज पर बुरा प्रभाव डालना शुरू कर दिया। कोरोना को जल्दी ठीक करने की गरज से बड़ी मात्रा में स्टेरॉयड्स का इस्तेमाल होने लगा। बगैर जांचे-परखे रेमडेसिविर इंजेक्शन, ब्लड थिनर के इंजेक्शन और दवा, भारी मात्रा में एंटीबायटिक्स, यहां तक कि प्राण बचाने की आखिरी उम्मीद टोसिलिजुमैब इंजेक्शन का भी इस्तेमाल किया गया। यही नहीं, प्लाज्मा थेरेपी और तरह-तरह की अन्य दवाएं, जिसमें फेबीफ्लू भी शामिल है, का खुल कर इस्तेमाल हुआ। अब इनका क्या साइड इफेक्ट है या हुआ है या होगा, यह तो अध्ययन के बाद ही पता चलेगा, लेकिन यह सही है कि बहुत सी मौतों का यही कारण बना है। यहां तक कि इसने ब्लैक फंगस को भी आमंत्रित कर दिया है। इलाज के नाम पर डॉक्टरों की पहली प्राथमिकता यही है कि किसी तरह मरीज की जान बच जाये। इसी क्रम में ताबड़तोड़ दवाओं का इस्तेमाल होने लगा। दूसरी लहर में ज्यादा मृत्यु होने के लिए सिर्फ वायरस ही जिम्मेदार है या इसमें इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी, यह तो शोध का विषय है, लेकिन इतना तय है कि हड़बड़ी में गड़बड़ दवाएं दी गयी हैं और इनमें निजी अस्पतालों में कुछ ज्यादा ही प्रयोग हुआ है। अब तीसरी लहर की बारी है। तीसरी लहर का क्या कहर होगा, यह भी अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतिहास गवाह है कि अगर सख्त लॉकडाउन रहा, तो तीसरी लहर बहुत ज्यादा नुकसान नहीं कर पायेगी, क्योंकि वायरस जितना कम फैलेगा, खतरा भी उतना ही कम होगा। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोना की उत्पत्ति की जांच की ओर कदम बढ़ा रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नवंबर 2019 में वुहान लैब के तीन कर्मचारी बीमार पड़ गये थे। उनमें कोरोना वायरस जैसे ही लक्षण दिखाई पड़े थे। फिर उनका इलाज भी शुरू हुआ। 2019 के नवंबर महीने के बाद दिसंबर-जनवरी के बीच पूरे विश्व को कोरोना वायरस महामारी के बारे में पता लगा। पहले तो विश्व में यह प्रचारित हुआ कि संक्रमण 2019 के दिसंबर महीने में मध्य चीन के वुहान शहर में देखने को मिला। वहां बहुत से लोगों को बिना किसी कारण निमोनिया होने लगा और यह पाया गया कि पीड़ित लोगों में से अधिकतर वुहान सी फूड मार्केट में मछलियां, मांस, विभिन्न तरीके के जानवर और पशुओं का व्यापार करते थे। इस नये वायरस में 70 प्रतिशत वही जीनोम अनुक्रम पाये गये, जो सार्स-कोरोना वायरस में पाये जाते हैं। ये वायरस विश्व में कोविड 19 या सार्स कोव 2 के रूप में विख्यात हुआ। भारत में इस वायरस की दस्तक मार्च 2020 में सुनाई पड़ी। उसी वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा कदम उठाते हुए देश में लॉकडाउन की घोषणा भी कर दी, जिससे कोरोना की पहली लहर नियंत्रण में रही और संक्रमण भी भारत में अधिक नहीं फैल पाया। लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खत्म होना शुरू हुआ, लोग सड़कों पर उतरे और एक-दूसरे के संपर्क में आने का सिलसिला शुरू हुआ। तब तक कोरोना वायरस अपना असली रूप धरने को तैयार बैठा था, मतलब वायरस अपना नया रूप, नया स्ट्रेन अख्तियार कर रहा था और अब हमला बोलने को तैयार था। होली आयी और लोगों ने संयम तोड़ दिया। बेधड़क घूमने लगे। महाराष्ट्र और गुजरात में दूसरी लहर की धमक सुनामी की तरह फैलने लगी, मौतों का आंकड़ा आसमान छूने लगा। फिर तो भारत में सिर्फ और सिर्फ लाश ही दिखाई पड़ रही थी। लाशों को जलाने के लिए श्मशान कम पड़ने लगे, तो उन्हें गंगा में बहाने का सिलसिला शुरू हुआ। बता दें कि 1918 में भी इतनी ज्यादा संख्या में मौतें हुर्इं कि जलाने के लिए लकड़ियां कम पड़ गयी थीं और लोग लाशों को नदियों में प्रवाहित करने लगे थे, जैसा इस बार भी उत्तरप्रदेश में हुआ।

    1918 के इनफ्लुएंजा या स्पेनिश फ्लू और 2019 के कोरोना वायरस में समानता इसलिए दिखती है, क्योंकि कोरोना वायरस से बीमारी की शुरूआत बिल्कुल उन लक्षणों से ही हो रही है, जो स्पेनिश फ्लू के दौरान दिखे थे और वायरस उसी तरह अपना रूप और संक्रमण बढ़ा रहा है, जिस तरह स्पेनिश फ्लू के दौरान बढ़ा था। बिल्कुल वही घटना, जो मार्च 1918 में पहली लहर के दौरान दिखी, तीन दिन का बुखार,सर्दी-खांसी और लक्षण के हिसाब से दवा लेने पर बीमारी का ठीक होना और मृत्यु दर की भी सीमित मात्रा, लेकिन जैसे ही स्पेनिश फ्लू के वायरस ने अपना रूप या स्ट्रेन बदला और दूसरी लहर का आगमन हुआ, वही हूबहू कोरोना वायरस की दूसरी लहर में दिखा। उसी हिसाब से लोगों के बीच संक्रमण का बढ़ना, मृत्यु दर का बढ़ना, उसी उम्र वाले लोगों के बीच अधिक मात्रा में संक्रमण का घातक रूप अख्तियार करना और मौत। तब और अब सबमें समानता है। उस वक्त भी उस बीमारी से लड़ने की कोई दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं थी और इस वक्त भी वही हाल है। बस अंतर यह है कि जो दवा उस वक्त दी गयी, वह अधिक मात्रा में प्राणघातक सिद्ध हुई और इस कोरोना काल में जो दवाएं या इंजेक्शन या स्टेरॉयड दिये जा रहे हैं, उनका क्या दुष्प्रभाव होगा या कितनी मात्रा तक ही दी जा सकती हंै, यह जानकारी डॉक्टरों में है, लेकिन इन दवाओं के क्या साइड इफेक्ट्स हैं, इसके बारे में जानकारी लोगों और शोधकर्ताओं के बीच छन-छन कर आ रही हैं। यह एक अलग ही महामारी का रूप ले रही है-जैसे ब्लैक फंगस, जिसे मेडिकल भाषा में म्यूकरमाइकोसिस कहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे स्पेनिश फ्लू की उम्र दो साल की थी, जो कोरोना से भी अधिक घातक थी, तो क्या कोरोना की भी उम्र महज दो साल ही है? यह सवाल तो बनता है, क्योंकि इतिहास कुछ इसी ओर इशारा कर रहा है।

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