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    Home»Breaking News»पॉलिटिक्स, करप्शन और 2000 के गुलाबी नोट
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    पॉलिटिक्स, करप्शन और 2000 के गुलाबी नोट

    azad sipahiBy azad sipahiJuly 29, 2022No Comments15 Mins Read
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    • प्रधानमंत्री जी, एक बार फिर आइये रात आठ बजे और अचानक बंद कर दीजिए 2000 के नोट
    • कारण यह नोट भ्रष्टाचारियों की पहली पसंद बन गया है, बाजार से गायब हो गया है और खास लोगों की तिजोरियों और वाशरूम की शोभा बढ़ा रहा है

    देश में झारखंड से लेकर कश्मीर तक प्रवर्तन निदेशालय एक्शन में है। इडी जहां जा रही है, वहां नोट गिननेवाली मशीन भी साथ लिये जा रही है। और भ्रष्टाचारियों का पैसे से मोह देखिए कि इडी जहां भी हाथ डाल रही है, वहीं करोड़ों में कैश मिल रहा है। शुरूआत झारखंड से ही करते हैं। यहां मौसम ने भले ही बेरुखी दिखायी है, खेत बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, लेकिन पिछले महीने इडी ने आइएएस अधिकारी पूजा सिंघल के यहां हाथ क्या डाला, बेमौसम ही नोटों की बरसात होने लगी। झारखंड में पूजा सिंघल के सीए सुमन कुमार के पास से 19 करोड़ से अधिक कैश बरामद हुआ। दो-दो हजार रुपये की गड्डी देख कर लोगों की आंखें फटी की फटी रह गयीं। उसके बाद मुख्यमंत्री के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा और उनके करीबियों के यहां से पांच करोड़ 34 लाख कैश बरामद हुआ। लगभग 36 करोड़ रुपये विभिन्न बैंक के खातों में मिले। साहिबगंज के महाशयों ने तो भ्रष्टाचार की नयी गाथा ही लिख डाली। 30 करोड़ रुपये की जहाज इसलिए खरीद ली कि उन्हें साहिबगंज से चिप्स ओर बोल्डर बिहार और बंगाल के रास्ते बांग्लादेश भेजना था। ट्रक से इतना माल कैसे जाता, लिहाजा पूरी जहाज ही मंगा ली और उस पर पूरा का पूरा ट्रक ही लोड करने लगे। वहां जिन आइएएस और आइपीएस अधिकारियों के जिम्मे झारखंड की खनिज संपदा की रखवाली की जिम्मेदारी थी, वे ट्रकों की खेप और जहाज की फेरी गिनने लगे। प्रति ट्रक कमीशन का हिसाब-किताब करने लगे। देखते ही देखते इन बाहुबलियों ने पहाड़ को डायनामाइट से उड़ा कर उसे छलनी कर दिया और फिर चिप्स और बोल्डर निकाल कर अपनी तिजोरी भर ली। यह आजाद भारत का पहला ऐसा कारनामा होगा, जहां चिप्स और बोल्डर की तस्करी के लिए जहाज खरीद लिया गया हो और उसका संचालन रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में होता रहा हो। साहिबगंज से लेकर विधानसभा तक में आवाज उठने के बाद भी प्रशासन ने उस पर रोक नहीं लगायी। खैर, अभी साहिबगंज के महाशयों को छोड़ देते हैं, क्योंकि इडी को चुनौती देनेवाले अभी ज्यादा परेशानी में हैं। आपको भी याद होगा, उन्होंने मीडिया के समक्ष जोर गले से कहा था कि हम डरनेवाले नहीं हैं। इडीवाले चाहें तो दो-चार सौ तोते और बाहर से मंगा लें। अब हम नजर घुमाते हैं झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल की तरफ। यहां एक नाम सबसे ज्यादा ज्यादा चर्चा में है। उन्हीं पार्थ चटर्जी के पास चलते हैं। ये महाशय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खासमखास थे। सरकार में इनका ओहदा दो नंबर का था। ये बंगाल की दशा-दिशा तय करते थे। अभी-अभी ममता बनर्जी ने फेस सेविंग के लिए इन्हें मंत्री पद से हटा दिया है। इन्हीं पार्थ चटर्जी की करीबी हैं अर्पिता मुखर्जी। जब इडी ने पहले इनके एक ठिकाने पर छापा मारा, तब 20 करोड़ से अधिक कैश मिले थे। उसे देख बंगाल के मानुष का माथा ही चकरा गया। कहने लगे, अरे बप्पा, एतो माल। हर जगह उसकी चर्चा होने लगी। लेकिन झारखंड वाले नार्मल थे, क्योंकि यहां उन्होंने पहले ही 20 करोड़ कैश की फोटो देख ली थी। लेकिन अर्पिता मुखर्जी को तो झारखंड की पूजा सिंघल एंड कंपनी से आगे निकलना था। इडी ने बुधवार को फिर अर्पिता के एक ठिकाने पर छापा मारा। यहां भी इडी की झोली भर गयी। वहां नोटों की इतनी गड्डी मिली कि उसे गिनने के लिए पांच-पांच मशीनें मंगानी पड़ीं और गिनती भी दस घंटे चली। 35 करोड़ तक गिनने के बाद भी मशीनें नहीं थकीं और कहा जा रहा है कि आंकड़ा 38 के पार चला गया है। अब बंगाल के साथ-साथ झारखंड वालों ने भी अपना माथा पकड़ लिया। झारखंड के लोग कहने लगे कि यह तो झारखंड के साथ चीटिंग हो गयी। लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। यहां भी कतार काफी लंबी है। अभी इडी बारी-बारी से यहां भी महारथियों को समन भेज रही है। हो सकता है, बंगाल से आगे निकल जाये झारखंड। मजेदार बात यह है कि जो कैश मिल रहा है, उसमें 2000 के नोट अधिक हैं। आम आदमी तो इस नोट का रंग भी भूल गया है। मिलता ही नहीं है। अगर सामान्य आदमी शादी-ब्याह में बैंक से तीस-चालीस हजार रुपये निकालने जाता भी है, तो बैंक वाले उसे दो हजार के नोट नहीं देते। पांच सौ के भी नहीं। सौ-सौ रुपये की गड्डी पकड़ा देते हैं। एटीएम से भी दो हजार रुपये का नोट नहीं निकलता है। ऐसा नहीं है कि यह नोट बंद हो गया है। हां, 2019 से यह नोट छपना जरूर बंद हो गया है, लेकिन फिर भी यह नोट प्रचलन में है और भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों, फ्लैट और यहां तक कि बाथरूम से भी निकल रहा है। केंद्र सरकार कहती है, नगद लेन-देन बंद। डिजिटल ट्रांजैक्शन का जमाना है। फिर सवाल:आखिर ये नोट इन महाशयों के पास कैसे पहुंच रहे हैं? क्या बिना बैंक की संलिप्तता के यह मुमकिन है? क्या यह नोट सिर्फ माननीयों के लिए ही छपे हैं? क्या 2000 के नोट की सचमुच में कालाबाजारी हो रही है? अचानक ये नोट बाजार से कहां गायब हो रहे हैं? जी हां, इन्हीं सवालों का जवाब तलाश रही है आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की यह विशेष रिपोर्ट।

    2016 में नोटबंदी के बाद जब 2000 रुपये का गुलाबी नोट बाजार में आया, तब लोगों में इसे लेकर मिक्स्ड फीलिंग्स थी। कुछ उत्साहित थे, तो कुछ डरे-सहमे हुए। उत्साहित इसलिए कि नोटों के बंडल आराम से पॉकेट में भी रखे जा सकते थे। डर इस बात से था कि अगर एक नोट भी गिरा, तो 2000 गया। डर यह भी था कि एक नोट अगर कहीं जाली निकल गया, तो छोटे दुकानदार या आम आदमी की तो पूरी पूंजी ही खत्म हो जायेगी। इसलिए आम आदमी या आम दुकानदार इस नोट से दूरी ही बना कर चलने लगे। लेकिन कुछ लोग दो हजार रुपये के नोट को लेकर काफी उत्साहित थे। कह रहे थे कि केंद्र सरकार ने उनका कितना खयाल रखा। सौ-सौ की गड्डी लेकर जाना उनके लिए संभव नहीं था। उस समय तो किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उनके उत्साहित होने का राज क्या है, लेकिन आज पता चल रहा है कि वे क्यों उत्साहित थे। दो हजार का नोट आये दिन भ्रष्टाचार की नयी-नयी कहानियां लिख रहा है। इस गुलाबी नोट के बल पर काला बाजार सज रहा है। भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों की शोभा बढ़ा रहे हैं ये नोट। इसका प्रचलन घूस लेने और देने में खूब हो रहा है। बाजार में यह चर्चा है कि अगर किसी अधिकारी या नेता को छोटे नोट में घूस की रकम दी जाये, तो उसका पारा चढ़ जाता है और कई बार तो वह उसे फेंक भी देता है। बदले में वह दो हजार रुपये के नोट ही मांगता है।
    इस नोट की डिमांड इतनी बढ़ गयी है कि इसे पाने के लिए मोटा कमीशन भी दिया जाने लगा है। बैंक के कुछ अधिकारियों की भी चांदी हो गयी है। वे दो हजार रुपये के नोट बड़े आसामी को ही देते हैं। उन्हें यह पता है कि इसे किसे देना है। आज सहज अनुमान लगा सकते हैं कि इसके पीछे क्या हो रहा होगा।

    पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के यहां से अब तक 51 करोड़ से अधिक कैश बरामद होना कोई साधारण घटना नहीं है। वह भी तब, जब इडी को कार्रवाई करते एक सप्ताह से ज्यादा हो गया है। इतने दिनों बाद इतना कैश मिलना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार का तो यह मात्र ट्रेलर है, पूरी कहानी अरबों में जायेगी। यह घटना बैंकिंग सिस्टम की भी पोल खोल रही है। यह बैंक अधिकारियों को भी कठघरे में खड़ा कर रही है। इतनी मात्रा में कैश लेन-देन क्या बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव है! क्या यह रिवर्ज बैंक के नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है। यही नहीं, इस घटना ने उस ममता बनर्जी को बंगाल के लगभग दस करोड़ लोगों की नजरों में गिरा दिया है, जिनके सामने वह जोर गला से कहती थीं कि उनके राज में भ्रष्टाचार होबे ना। यह सफेद झूठ है। जब-जब उनकी सरकार या उनके अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का दाग दिखा, वह खुद मैदान में उतर गयीं और कहने लगीं, एटा मिथ्या। एक बार तो वह सीबीआइ के आफिस ही पहुंच गयीं। सीबीआइ के खिलाफ उन्होंने तो आंदोलन ही छेड़ दिया था। अपने कार्यकर्ताओं को उन्होंने सड़क पर उतार दिया था।

    अब पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के पास से मिले पैसे के बाद बंगाल में नया नैरेटिव सेट हो गया है। बंगाल के लोगों की जुबान पर यह बात आम हो गयी है कि जब एक मंत्री के यहां इतने पैसे हो सकते हैं, तो उन मंत्रियों के पास कितने पैसे होंगे, जो इडी और सीबीआइ के रडार पर हैं। ममता बनर्जी के लगभग आधा दर्जन नेता और मंत्रियों के ऊपर इडी की तलवार लटक रही है और उन सब पर कमीशन, दलाली, कोयले की कालाबाजारी और स्क्रैप की तस्करी से पैसे बनाने के आरोप हैं। इडी उनकी पूरी आर्थिक कुंडली खंगाल रही है। लोगों को आश्चर्य इस बात से भी हो रहा है कि जब इन नेताओं ने इतने पैसे घर में रखे हैं, तो बेनामी कितनी संपत्ति और पैसे उन्होंने दबा कर रखे होंगे। लोगों की जुबान पर यह भी बात आ रही है कि ममता बनर्जी के सभी मंत्रियों की आर्थिक कुंडली खंगाली जानी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि दीदी के शासनकाल में बंगाल में क्या हो रहा है। एक समय था, जब ममता बनर्जी अपने गुस्से और राजनीतिक आंदोलन के सहारे इडी और सीबीआइ को दबाव में लाना चाहती थीं। उन्होंने सीबीआइ का कार्यालय तक घिरवा दिया था। आयकर विभाग के अधिकारी जब छापा मारने गये थे, तो बंगाल की पुलिस से उन्हें घिरवा लिया था और उनके काम में बाधा पहुंचायी गयी। यही नहीं, उन्होंने पश्चिम बंगाल में यह आदेश भी निकाल दिया कि बगैर राज्य सरकार की इजाजत के सीबीआइ वहां कोई जांच नहीं कर सकती। लेकिन भ्रष्टाचार के नित नये उजागर हो रहे मामलों से ममता बनर्जी भी अब लगता है सहम गयी हैं। आखिर अब वह कब तक यह बोल कर पश्चिम बंगाल की जनता को भरमायेंगी कि इडी और अन्य केंद्रीय एजेंसियां नरेंद्र मोदी और अमित शाह के इशारे पर उन्हें परेशान कर रही हैं। बंगाल की जनता सब देख रही है। बंगाल के लोग पार्थ चटर्जी की दोस्त के यहां से इतना ज्यादा कैश देख कर स्तब्ध हैं। बल्कि अब तो लोग यहां तक कहने लगे हैं कि पार्थ चटर्जी ने अर्पिता मुखर्जी के घर को मिनी बैंक ही बना दिया था। खुद अर्पिता ने कहा है कि पार्थ ने उनके घर का इस्तेमाल पैसे रखने के लिए किया। यह सब देख और सुन कर ममता बनर्जी के पैरों के नीचे से भी जमीन खिसकती नजर आ रही है। वह विचलित हो रही हैं। पहली बार लगता है, उन्हें डर से सामना हुआ है, तभी तो उन्होंने पार्थ चटर्जी का फोन नहीं उठाया और गुरुवार को उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया। कहते हैं, भ्रष्टाचार की जब पोल खुलती है, तो यह बड़े-बड़े लोगों को हिला कर रख देती है। पश्चिम बंगाल में वट वृक्ष का रूप ले चुकी तृणमूल कांग्रेस के साथ भी यही हो रहा है। पार्थ चटर्जी के यहां से मिले कैश के बाद पूरी पार्टी हिल गयी है। ममता बनर्जी के अचानक नरम पड़ने और पार्थ चटर्जी से दूरी बनाने के पीछे यही मूल कारण है। कहते हैं, जिस दिन इडी ने तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और बंगाल के उद्योग एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री पार्थ चटर्जी के यहां छापामारी की और उन्हें गिरफ्तार किया, उस दिन उन्होंने मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को तीन बार फोन लगाया। हर बार बांग्ला में यही जवाब मिला: आपनी दया कोरे किछु खून पोरे डायल करून। मतलब ममता बनर्जी फोन नहीं उठा रही थीं। उधर पार्थ की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। जाहिर है, वह दीदी से मदद की आस लगाये हुए होंगे। लगायें भी क्यों नहीं। पार्थ देख चुके थे कि 2019 में शारदा घोटाले को लेकर कोलकाता के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के खिलाफ सीबीआइ की कार्रवाई के विरोध में ममता बनर्जी कैसे खुद सड़क पर आ गयी थीं। मई 2021 में भी नारदा स्कैम में फंसे तृणमूल के मंत्रियों और विधायकों की गिरफ्तारी के बाद वह सीबीआइ के कोलकाता कार्यालय में घंटों धरने पर बैठी गयी थीं। लेकिन फिलहाल ममता बनर्जी का पार्थ चटर्जी से मोहभंग हो चुका है। इस बार पार्थ चटर्जी की दीदी उन्हें राखी नहीं बांधना चाहतीं। क्योंकि वह अच्छी तरह से जान चुकी हैं कि इडी की जांच क्या करवट ले सकती है।

    झारखंड की हर बात निराली
    चलते-चलते: कहते हैं, झारखंड की हर बात निराली है। इस राज्य ने घोटाले और तस्करी के नये-नये कीर्तिमान बनाये हैं। लेकिन एक बात अब नये रूप में सामने आ रही है। झारखंड में डंफर से, ट्रक से, ट्रैक्टर से, यहां तक कि साइकिल से अवैध माइनिंग के माल को ठिकाने लगाते आपने पहले बहुत बार देखा है, लेकिन अवैध माइनिंग का माल पार करने के लिए जहाज ही खरीद ली जाये, यह पहली बार सुना और देखा जा रहा है। जहाज देख कर लगा, वाह क्या बात है। सचमुच में झारखंड प्रगति के रास्ते पर है। और जिसने भी यह जहाज खरीदा, उसके साहस का दाद देनी चाहिए।

    वर्ष 2019 से बंद है 2000 रुपये के नोट की छपाई
    2019 के बाद से रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने 2000 के नोट छापने बंद कर दिये हैं। शायद रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार को यह पता चल चुका है कि पूजा सिंघल, पंकज मिश्रा, पार्थ चटर्जी, अर्पिता मुखर्जी टाइप के लोग इन्हीं नोटों के सहारे भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे तो ये नोट बैंक के काउंटर, एटीएम, दुकान, मॉल कहीं नहीं दिखेंगे। लेकिन बड़े लोगों की तिजोरियों में जब दीखते हैं तो करोड़ों में। और इनकी शक्ल वहां कालेधन के रूप में हो जाती है। आरबीआइ ने इसी कालेधन वाली गतिविधि को रोकने के लिए इसकी प्रिंटिंग को बंद कर दिया है। आरबीआइ के बिहार-झारखंड जोन के कार्यालय को चलाने के लिए करीब 90 हजार करोड़ मूल्य के 45 करोड़ नोट मिले थे। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021-22 में लगभग 4000 करोड़ मूल्य के दो करोड़ नोट ही चलन में हैं। यानी, 96 प्रतिशत 2000 के नोट बिहार-झारखंड से या तो बाहर चले गये हंै या फिर भ्रष्टाचारियों की तिजोरी में, या बाथरूम में, या फिर बेड में छिप कर सो रहे हैं। ये नोट तब लोगों की नजर में आते हैं, जब इडी या सीबीआइ कालेधन को उजागर करने के लिए छापा मारती है। निश्चित रूप से ये वही छिपे नोट हैं, जो झारखंड में पूजा सिंघल एंड कंपनी और साहिबगंज के महाशयों के करीबियों के यहां से पाये जा रहे हैं। कभी हम बचपन में सुनते थे कि अलीबाबा, चालीस चोर और गुफा में छिपे खजानें की कहानी सुनी है। आज भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों से भर-भर कर थोक में 2000 के नोट मिल रहे हैं। उन्हें ढूंढ़ने अब इडी और सीबीआइ अधिकारी जा रहे हैं। दूसरी तरफ आम आदमी 2000 के नोट का रंग भूलने लगा है।

    आखिर क्यों बंद न हों 2000 के नोट
    जब भी आर्थिक अपराधियों के यहां छापा मारा जा रहा है, बार-बार यह देखा जा रहा है कि वहां से करोड़ों का कैश बरामद हो रहा है। इनमें 2000 के नोटों की संख्या सबसे अधिक है। इसका मुख्य कारण यही है कि भ्रष्टाचारियों को उसे रखने में आसानी होती है। उत्तरप्रदेश के चुनाव के पूर्व कानपुर में इत्र कारोबारी और त्रिमूर्ति प्राइवेट लिमिटेड के मालिक पीयूष जैन के कानपुर और कन्नौज स्थित घर से 200 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी और सोना-चांदी मिले थे। टीम ने जब सर्च आॅपरेशन शुरू किया था, तो अलमारियों में नोटों के बंडल भरे मिले। टीम को नोट गिनने के लिए पांच मशीनें भी मंगानी पड़ी थीं। वहीं जब झारखंड में आइएएस अधिकारी पूजा सिंघल के करीबियों के यहां छापा पड़ा, तो वहां भी 2000 के नोट अधिक पाये गये। यहां भी नोट गिनने के लिए मशीनों की जरूरत पड़ी थी। एक दो बार मशीन खराब भी हो गयी थी। इधर विधायक प्रतिनिधि और झामुमो नेता पंकज मिश्रा से भी नित नये राज इडी को मिल रहे हैं। कुछ नये लोग भी इडी के रडार पर हैं। हो सकता है कि इडी को और नोट गिननेवाली मशीन मंगानी पड़े। कहते हैं, न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। भ्रष्टाचार की मूल जड़ में दो हजार रुपये के नोट हैं। बंगाल में जब ममता सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के वॉशरूम, वार्डरोब और संदूक से नोटों का जखीरा मिल रहा है, तो उसमे भी 2000 के नोट अधिक मिले। इडी का आकलन है कि घोटाले की यह रकम 200 करोड़ तक जा सकती है। हो सकता है, इडी को निकट भविष्य में वहां फिर नोट गिनने की मशीन मंगानी पड़े। बार-बार इतना नोट गिनना। मशीन मंगाना, यह कहानी लंबी चलनेवाली है, क्योंकि अभी तो इडी को कश्मीर भी जाना है, फारूक अब्दुल्लाह का स्वागत करने। जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन में अनिमियतता से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का मामला सामने आया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ इडी ने चार्जशीट दायर कर दी है। बार-बार भ्रष्टाचारियों, चोरों के ठिकानों पर जाने से अच्छा तो यही होता कि 2000 का नोट ही बंद हो जाता है। इससे सांप खुद ही बिल से बाहर आ जायेगा। एक बार फिर देश रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंतजार कर रहा है। अगर 2000 का नोट बंद हो जाता है, तो इस बार निशाना बिल्कुल सटीक लगेगा।

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