गोविंद बल्लभ पंत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्र भारत के शुरुआती राजनीतिक इतिहास के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। बाद में उन्होंने देश के गृह मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। उनके सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार, भूमि सुधार और प्रशासनिक बदलाव के कई महत्वपूर्ण पड़ाव रहे।

10 सितंबर 1887 को हुआ था जन्म

गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को तत्कालीन अल्मोड़ा क्षेत्र के खूंट गांव में हुआ था। बचपन से ही वह पढ़ाई में तेज थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का रुख किया। छात्र जीवन के दौरान ही उनका जुड़ाव राष्ट्रीय आंदोलन से बढ़ने लगा।

1905 में बनारस में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने स्वयंसेवक के तौर पर हिस्सा लिया। बाद में इलाहाबाद के कुंभ मेले के दौरान कांग्रेस शिविर में दिए गए उनके भाषण को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें परीक्षा में बैठने से रोक दिया था। बाद में मदन मोहन मालवीय के हस्तक्षेप से यह फैसला वापस लिया गया।

‘कुली बेगार’ प्रथा के खिलाफ उठाई आवाज

1909 में कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद पंत ने वकालत शुरू की। अल्मोड़ा, रानीखेत और काशीपुर में वकालत करने के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

1914 में उन्होंने गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए ‘प्रेम सभा’ की स्थापना की। इसके बाद 1916 में कुमाऊं परिषद के गठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कुमाऊं क्षेत्र में प्रचलित ‘कुली बेगार’ प्रथा के खिलाफ आंदोलन में पंत की भूमिका खास रही। इस व्यवस्था के तहत ग्रामीणों से सरकारी अधिकारियों के लिए बिना पारिश्रमिक काम कराया जाता था। पंत ने इसके खिलाफ लोगों को संगठित किया और इसे खत्म करने की मांग को मजबूती दी।

स्वतंत्रता आंदोलन में निभाई अहम भूमिका

महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन तेज होने के साथ पंत भी कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय हो गए। उन्होंने स्वराज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 1923 और 1926 में चुनाव जीतकर विधान परिषद में प्रवेश किया।

1925 के काकोरी कांड के बाद उन्होंने क्रांतिकारियों को कानूनी मदद भी उपलब्ध कराई। अंग्रेजी शासन के दौर में क्रांतिकारियों के पक्ष में खड़ा होना जोखिम भरा माना जाता था।

साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू के साथ किया प्रदर्शन

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में देशभर में प्रदर्शन हुए। लखनऊ में हुए प्रदर्शन में गोविंद बल्लभ पंत और जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। पुलिस के लाठीचार्ज में पंत को गंभीर चोटें आईं।

नेहरू ने बाद में अपनी आत्मकथा में पंत के इस साहस का उल्लेख किया। लाठीचार्ज के दौरान लगी चोटों का असर उनके स्वास्थ्य पर लंबे समय तक रहा।

1937 में बने संयुक्त प्रांत के प्रीमियर

भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत 1937 में प्रांतीय चुनाव हुए। संयुक्त प्रांत में कांग्रेस को बहुमत मिला और 17 जुलाई 1937 को गोविंद बल्लभ पंत संयुक्त प्रांत के प्रीमियर बने।

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को बिना भारतीय नेताओं की सहमति के शामिल किए जाने के विरोध में कांग्रेस ने अपनी प्रांतीय सरकारों से इस्तीफा देने का फैसला किया। इसके बाद पंत ने भी पद छोड़ दिया।

आजाद भारत में उत्तर प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री

1946 में पंत दोबारा संयुक्त प्रांत के प्रीमियर बने। आजादी के बाद 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद उन्होंने 20 मई 1952 को स्वतंत्र भारत के उत्तर प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में भूमि सुधार और प्रशासनिक बदलावों पर विशेष जोर दिया गया। उनकी सरकार ने जमींदारी उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। इसके साथ भूमि सुधार और चकबंदी जैसी व्यवस्थाओं को भी आगे बढ़ाया गया।

महिलाओं के अधिकारों से जुड़े सुधार

पंत के मुख्यमंत्री कार्यकाल में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनी सुधारों की दिशा में भी कदम उठाए गए। हिंदू कानूनों में बदलाव के जरिए विवाह, तलाक और पैतृक संपत्ति जैसे विषयों पर महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

रिहंद बांध परियोजना और गोविंद बल्लभ पंत सागर

1954 में उनके मुख्यमंत्री रहते रिहंद बांध परियोजना की शुरुआत हुई। बाद में रिहंद जलाशय को गोविंद बल्लभ पंत सागर नाम दिया गया। यह परियोजना उत्तर प्रदेश के औद्योगिक और विकास संबंधी ढांचे में महत्वपूर्ण मानी गई।

1955 में बने देश के गृह मंत्री

1955 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गोविंद बल्लभ पंत को केंद्र सरकार में बुलाया और उन्हें भारत का गृह मंत्री बनाया। इस जिम्मेदारी के दौरान उन्होंने केंद्र और राज्यों से जुड़े कई प्रशासनिक मुद्दों पर काम किया।

26 जनवरी 1957 को उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

अयोध्या विवाद के शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री थे पंत

1949 में अयोध्या के विवादित स्थल पर रामलला की मूर्तियां रखे जाने की घटना के समय गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इस मामले को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चिंता जताई थी। यह विवाद आगे चलकर भारतीय राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल हुआ और दशकों बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक पहुंचा।

7 मार्च 1961 को हुआ निधन

गोविंद बल्लभ पंत का निधन 7 मार्च 1961 को हुआ। उनके निधन के बाद कई नेताओं ने उनके सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को याद किया।

गोविंद बल्लभ पंत की राजनीतिक यात्रा स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत के शुरुआती प्रशासन तक फैली रही। उत्तर प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री और देश के गृह मंत्री के रूप में उनकी भूमिका भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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