-गुरु जी के शिष्य, हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सिपहसलार थे सोनू
-‘आपका बेटा ले जा रहे हैं, कुछ बनाकर देंगे’, गुरुजी के ये बोल और बदल गयी सुदिव्य सोनू की जिंदगी
-झारखंड की माटी का ऐसा लाल, जिसकी कमी कभी पूरी नहीं की जा सकेगी

गिरिडीह की उस माटी में एक ऐसा बेटा पैदा हुआ था, जिसने राजनीति को कभी सत्ता तक पहुंचने का रास्ता नहीं माना। उसके लिए राजनीति संघर्ष थी, जनसेवा थी और अपनी माटी के हक-अधिकार की लड़ाई थी। वह बेटा था—सुदिव्य कुमार सोनू। 26 जुलाई 1970 को जन्मे सुदिव्य सोनू का 6 सितंबर 2026 को महज 56 वर्ष की उम्र में अचानक निधन हो गया। दिल का दौरा पड़ने से हुई उनकी मौत ने झारखंड की राजनीति में एक ऐसा खालीपन पैदा कर दिया, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। जिस व्यक्ति को कुछ दिन पहले तक लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए फोन कर रहे थे, जो सोशल मीडिया पर जनता से संवाद कर रहा था, जो सरकार और संगठन के मुद्दों पर अपनी बात रख रहा था, वह अचानक हमेशा के लिए खामोश हो गया। लेकिन सुदिव्य सोनू की कहानी उनकी मौत के साथ खत्म नहीं होती। असल में उनकी कहानी उस युवा से शुरू होती है, जिसके परिवार की कई पीढ़ियों का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। उनके परिवार में लोग सरकारी नौकरियों में रहे थे। राजनीति से दूर रहने वाले इस परिवार का एक लड़का जब झारखंड आंदोलन की आवाज से प्रभावित हुआ, तो घर-परिवार के लिए यह किसी अचरज से कम नहीं था। 80 और 90 के दशक में जब झारखंड अलग राज्य आंदोलन अपने उफान पर था, तब उत्तर बिहार में पढ़ाई के दौरान उनके साथी अक्सर ताना मारते—‘अलग राज्य बना लोगे?’ शायद उस समय इन शब्दों ने उनके मन में एक ऐसी टीस पैदा की, जिसने आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी।

गुरुजी से वह मुलाकात, जिसने जिंदगी बदल दी
साल 1989, डीएसपी बरनाड कीचिया के आवास पर युवा सुदिव्य सोनू की मुलाकात दिशोम गुरु शिबू सोरेन से हुई। यह मुलाकात सामान्य मुलाकात नहीं थी। यह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। गुरु जी ने जब जाना कि सुदिव्य पढ़े-लिखे युवा हैं, तो उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा— अगर तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लोग अलग राज्य के आंदोलन में नहीं आयेंगे, तो आंदोलन का विस्तार कैसे होगा? गुरु जी के शब्द और कंधे पर रखा वह हाथ युवा सुदिव्य के मन में गहरे उतर गया। उन्होंने राजनीति को नौकरी या करियर के विकल्प के रूप में नहीं चुना। उन्होंने इसे अपनी माटी के हक की लड़ाई का माध्यम बनाया और झारखंड आंदोलन में कूद पड़े। यहीं से शुरू हुई उस युवा की राजनीतिक यात्रा, जो आगे चलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा का एक मजबूत स्तंभ बना।

घर में विरोध, लेकिन कदम नहीं डगमगाये
राजनीति में आने के बाद सुदिव्य सोनू को परिवार के विरोध का सामना भी करना पड़ा। उनके पिता इस बात से नाराज थे कि बेटा अपना भविष्य छोड़कर राजनीति में क्यों चला गया। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए राजनीति में भविष्य देखना आसान नहीं था। पिता को लगता था कि बेटे ने अपना जीवन बर्बाद कर लिया है। लेकिन समय ने तस्वीर बदल दी। 2004-05 के आसपास एक दिन दिशोम गुरु शिबू सोरेन खुद सुदिव्य सोनू के गिरिडीह स्थित घर पहुंचे। चाय पीने के दौरान जब उनके पिता कमरे से बाहर आये, तो गुरु जी ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए और उनका हाथ पकड़कर कहा, ‘आपका बेटा मांग के ले जा रहे हैं, कुछ बनाकर देंगे।’ यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था। यह एक गुरु का अपने शिष्य पर विश्वास था। गुरु जी के इस व्यवहार और विश्वास ने सुदिव्य के पिता का मन बदल दिया। इसके बाद उन्होंने बेटे के राजनीतिक जीवन को लेकर सवाल उठाना लगभग बंद कर दिया। यही रिश्ता आगे चलकर गुरु-शिष्य के रिश्ते से बढ़कर राजनीतिक विश्वास में बदल गया।

साधारण कार्यकर्ता से ‘सोनू भैया’ तक
सुदिव्य सोनू ने राजनीति की शुरूआत किसी बड़े पद से नहीं की थी। वह एक सामान्य कार्यकर्ता थे। गिरिडीह में उन्होंने संगठन के लिए वर्षों तक मेहनत की। झामुमो के जिलाध्यक्ष के रूप में उन्होंने पार्टी को मजबूत करने का काम किया। कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में खड़े रहना उनकी आदत बन गयी थी। धीरे-धीरे गिरिडीह में उनका नाम बदल गया। सुदिव्य कुमार सोनू से वे लोगों के ‘सोनू भैया’ बन गये। यह संबोधन किसी राजनीतिक पद से नहीं मिला था। यह जनता और कार्यकर्ताओं के दिल से निकला था। उनका घर और कार्यालय आम लोगों के लिए खुला रहता था। कोई ग्रामीण अपनी जमीन की समस्या लेकर आता, कोई छात्र अपनी परेशानी लेकर, कोई गरीब परिवार मदद की उम्मीद में पहुंचता, सोनू उनकी बात सुनते थे। उनकी राजनीति का सबसे मजबूत पक्ष यही था कि वे समस्या सिर्फ सुनते नहीं थे, उसके समाधान की कोशिश भी करते थे।

संघर्षों ने बनाया ‘सोनू’ को सुदिव्य सोनू के जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय उनकी पुस्तक ‘मेरी जेलयात्रा’ में दर्ज है। राजनीतिक-सामाजिक संघर्ष के दौरान जेल जाने का अनुभव उन्होंने शब्दों में दर्ज किया। यह किताब सिर्फ जेल के भीतर की कहानी नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की कहानी थी, जिसमें उन्होंने जल, जंगल और जमीन तथा आदिवासी-मूलवासी अधिकारों के सवालों को लेकर संघर्ष किया। संघर्षों ने उनके व्यक्तित्व को कठोर बनाया, लेकिन व्यवहार में वह उतने ही सहज बने रहे। यही विरोधाभास शायद उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी थी।

विचारों पर दृढ़ता और व्यवहार में विनम्रता: गिरिडीह में बसता था मन
2019 में वह पहली बार गिरिडीह विधानसभा से विधायक चुने गये। 2024 में जनता ने उन्हें फिर विधानसभा भेजा। विधायक बनने के बाद भी गिरिडीह उनके लिए सिर्फ एक चुनाव क्षेत्र नहीं रहा। वह उनकी कर्मभूमि बना रहा। रांची में सरकार और संगठन की बैठकों में व्यस्त रहने के बावजूद उनका मन गिरिडीह में ही लगा रहता था। सप्ताहांत होते ही उनकी गाड़ी गिरिडीह की ओर मुड़ जाती थी। उनका मानना था कि जनप्रतिनिधि अगर अपनी जड़ों से कट जाये, तो वह दिशाहीन हो जाता है। गिरिडीह के गांवों में घूमते हुए वह सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बातें करते थे। उन्हें अपने क्षेत्र की प्राकृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर भी उतना ही भरोसा था। उसरी फॉल, खंडोली और पारसनाथ जैसे पर्यटन स्थलों को लेकर उनका सपना था कि गिरिडीह की पहचान सिर्फ कोयले और अभ्रक से नहीं, बल्कि पर्यटन और रोजगार से भी हो। उनकी सोच साफ थी कि विकास ऐसा हो, जिससे पर्यावरण सुरक्षित रहे और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले।

सदन में शोर नहीं, तथ्यों की आवाज
विधानसभा पहुंचने के बाद भी सुदिव्य सोनू ने अपनी पहचान नहीं बदली। सदन में जब वह बोलते थे, तो उनकी आवाज शोर में अलग सुनाई देती थी। कारण था पक्की तैयारी। कानून, बजट और नीतिगत विषयों पर उनकी पकड़ मजबूत थी। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम से लेकर खनिज रॉयल्टी और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों तक के विषयों पर वह तथ्यों के साथ अपनी बात रखते थे। एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि सदन शक्ति प्रदर्शन की जगह नहीं है। यह उन लाखों लोगों की उम्मीदों का स्थान है, जिन्होंने अपने प्रतिनिधि को वहां भेजा है। यही सोच उनकी राजनीति को बाकी नेताओं से अलग करती थी।

सत्ता मिली, तो सपनों का दायरा भी बड़ा हुआ
जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उन्हें अपनी कैबिनेट में शामिल किया और पर्यटन, नगर विकास, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा तथा खेल जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दी, तो सुदिव्य सोनू के सामने काम का दायरा भी बड़ा हो गया। उन्होंने शिक्षा को विशेष प्राथमिकता दी। गिरिडीह और आसपास के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों की ओर न जाना पड़े, इसके लिए सर जेसी बोस विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज जैसे प्रोजेक्ट को उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में आगे बढ़ाया। पर्यटन में उन्होंने झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश की। खेल मंत्री के रूप में युवाओं और ग्रामीण प्रतिभाओं को मंच देने पर उनका जोर रहा। पंचायत से राज्य स्तर तक खेल प्रतिभाओं को अवसर देने की दिशा में उन्होंने कई पहल कीं।

मंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला इंसान
सत्ता की कुर्सी अक्सर नेताओं और जनता के बीच दूरी पैदा कर देती है। लेकिन सुदिव्य सोनू के मामले में यह दूरी दिखाई नहीं दी। उनके आवास के बरामदे में प्लास्टिक की साधारण कुर्सियां लगी रहती थीं। ग्रामीण आते थे, मजदूर आते थे, छात्र आते थे। एक बुजुर्ग महिला जमीन से जुड़े विवाद का कागज लेकर उनके पास पहुंची थीं। सुदिव्य ने कागज अपने हाथ में लिया, पूरी बात सुनी और फिर संबंधित अधिकारी से खुद फोन पर बात की। यही उनका तरीका था। समस्या चाहे जो हो, समाधान निकलने के लिए प्रयासरत रहते। उनके लिए जनसेवा भाषण का विषय नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी। ठेठ खोरठा में ग्रामीणों से बात करते तो औपचारिकता की सारी दीवारें टूट जातीं। सामने वाला व्यक्ति खुद को किसी मंत्री या विधायक के सामने नहीं, बल्कि अपने ‘सोनू भैया’ के सामने महसूस करता था।

राजनीति के संकट में शांत चेहरा
झारखंड की राजनीति ने पिछले वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे। सरकार और संगठन पर जब भी राजनीतिक या कानूनी दबाव बढ़ा, सुदिव्य सोनू की भूमिका महत्वपूर्ण हुई। वह कैमरों के सामने आकर सुर्खियां बटोरने वाले नेता नहीं थे। वह पर्दे के पीछे रहकर परिस्थितियों को समझते, विशेषज्ञों से सलाह लेते और रणनीति बनाने में भूमिका निभाते थे। इसी कारण उन्हें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसेमंद राजनीतिक सिपहसलारों में गिना जाता था। उनकी खासियत थी बड़े से बड़े दबाव में भी संयमित रहना।

आखिरी दिनों तक जनता से जुड़े रहे
सुदिव्य सोनू की सक्रियता उनके जीवन के अंतिम दिनों तक बनी रही। निधन से कुछ दिन पहले तक वह सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। जनता से संवाद कर रहे थे और सरकार से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रख रहे थे। किसी को शायद अंदाजा नहीं था कि यह संवाद इतनी जल्दी थमने वाला है। 6 सितंबर 2026 को भोर में अचानक उनके निधन की खबर आयी। भरोसा नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है। लेकिन जैसे-जैसे सुबह हुई और समय बढ़ता चला गया, फिर मन मानने को विवश हो गया कि सोनू भैया नहीं रहे। फिर उनकी अस्पताल वाली तस्वीर सामने आयी। मन व्यथित हो गया। सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में सन्नाटा छा गया। झारखंड स्तब्ध था। अब सिर्फ उनकी यादें थीं।

संकट में हेमंत के ‘हनुमान’ बने सुदिव्य, कल्पना की सियासी पारी को दिया आकार
झारखंड की राजनीति के लिए वह एक असाधारण दिन था। तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जेल में थे और बाहर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सामने एक साथ कई मोर्चे खुल गये थे। सरकार को संभालना था। संगठन को बचाये रखना था। लोकसभा चुनाव सिर पर था और विधानसभा चुनाव भी बहुत दूर नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि हेमंत सोरेन की गैर-मौजूदगी में पार्टी का चेहरा कौन बनेगा और कार्यकर्ताओं को कौन एकजुट रखेगा? यही वह वक्त था, जब सुदिव्य कुमार सोनू की भूमिका अचानक पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हो गयी। सरकार की कमान चंपाई सोरेन के हाथों में आयी और इसी दौर में कल्पना सोरेन को राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी थी। ऐसे कठिन समय में संगठन की जिम्मेदारी संभालने वालों में सुदिव्य कुमार सोनू सबसे भरोसेमंद चेहरों में उभरे। सुदिव्य ने इस संकट को केवल राजनीतिक चुनौती के तौर पर नहीं देखा, बल्कि संगठन को एकजुट रखने का जिम्मा अपने कंधों पर लिया। 4 मार्च 2024 को गिरिडीह में जेएमएम के स्थापना दिवस समारोह में कल्पना सोरेन ने पहली बार बड़े राजनीतिक मंच से सक्रिय राजनीति की शुरूआत की। मंच पर भावुक कल्पना के लिए वह क्षण बेहद महत्वपूर्ण था। सुदिव्य ने संगठनात्मक स्तर पर उन्हें संभाला और भावनात्मक माहौल को राजनीतिक संघर्ष के संकल्प में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसके बाद गांडेय विधानसभा उपचुनाव पार्टी के सामने अगली बड़ी चुनौती थी। अप्रैल 2024 के अंत में जेएमएम ने कल्पना सोरेन को गांडेय से उम्मीदवार बनाया। चुनाव अभियान की कोर कमेटी में सुदिव्य को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, चुनावी रणनीति बनाने और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने में भूमिका निभायी। एक बैठक में सुदिव्य ने कार्यकर्ताओं से कहा था कि गांडेय के मतदाता केवल एक विधायक नहीं चुन रहे हैं, बल्कि ऐसे नेतृत्व का चुनाव कर रहे हैं, जो मुख्यमंत्री के बराबर राजनीतिक कद रखता हो। 4 जून को चुनाव परिणाम आया। कल्पना सोरेन ने भाजपा के दिलीप कुमार वर्मा को 26,483 मतों से हराकर अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित की। 28 जून को हेमंत सोरेन जेल से बाहर आये, तब तक कल्पना सोरेन की सियासी पारी आकार ले चुकी थी। नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव में कल्पना ने फिर गांडेय से जीत दर्ज की और सुदिव्य सोनू भी गिरिडीह से विजयी हुए। इसके बाद हेमंत सरकार में सुदिव्य को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। सुदिव्य सोनू की भूमिका संगठन के भरोसेमंद ‘संकटमोचक’ की रही। यही वजह है कि पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को हेमंत के ‘हनुमान’ के तौर पर भी याद किया जाता रहा।

सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक जीवन इस बात का प्रमाण है कि बिना किसी दिखावे, आक्रामकता या कटुता के भी राजनीति में एक गरिमापूर्ण और प्रभावी मुकाम हासिल किया जा सकता है। वे एक तरफ आंदोलनकारी झारखंडी चेतना के संवाहक थे, तो दूसरी तरफ आधुनिक प्रशासनिक दृष्टि वाले प्रबुद्ध विधायक। सत्ता की चकाचौंध के बीच उनका संयम, जनता के प्रति उनकी जवाबदेही और वैचारिक निष्ठा उन्हें वर्तमान पीढ़ी के राजनेताओं में एक विशिष्ट स्थान दिलाती है। जब भी झारखंड के भविष्योन्मुख, सुलझे हुए और जनसरोकारों से जुड़े नेतृत्व की बात होगी, सुदिव्य कुमार सोनू का नाम एक सकारात्मक और प्रेरक उदाहरण के रूप में सदैव याद रखा जायेगा।

एक कहानी, जो खत्म होकर भी खत्म नहीं हुई
सुदिव्य कुमार सोनू की जिंदगी को सिर्फ एक विधायक या मंत्री की जिंदगी के रूप में देखना शायद उनके साथ न्याय नहीं होगा। वह उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने झारखंड की अस्मिता के सवाल को महसूस किया। वह उस आंदोलनकारी चेतना से निकले थे, जिसने जल, जंगल और जमीन को सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि अधिकार का सवाल माना। वह गुरु शिबू सोरेन के शिष्य थे, लेकिन अपनी अलग पहचान भी बनायी। वह हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सहयोगी थे, लेकिन गिरिडीह में अपनी जमीन से जुड़े रहे। वह मंत्री थे, लेकिन जनता के बीच ‘सोनू भैया’ बने रहे। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। सुदिव्य सोनू का राजनीतिक सफर हमें यह बताता है कि राजनीति में पहुंचने के लिए हमेशा किसी बड़े परिवार की जरूरत नहीं होती। एक साधारण कार्यकर्ता भी अपने संघर्ष, विचार और जनता के भरोसे के बल पर ऊंचाई हासिल कर सकता है।
आज सुदिव्य सोनू हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन गिरिडीह की गलियों में, झारखंड आंदोलन की स्मृतियों में, विधानसभा के उन पन्नों में जहां उन्होंने जनहित की आवाज उठायी, युवाओं के उन सपनों में जिन्हें उन्होंने आगे बढ़ाने की कोशिश की और उन लोगों की यादों में, जिनकी समस्याएं उन्होंने सुनीं, वह हमेशा मौजूद रहेंगे। झारखंड की माटी ने अपना एक बेटा खोया है। लेकिन उस बेटे की कहानी अब आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत है। सोनू भैया चले गये, लेकिन उनकी आवाज, उनका संघर्ष और उनकी सादगी शायद इस माटी में बहुत लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

 

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