अभीक बरुआ : बतौर एक बजट विश्लेषक और बीते दो दशकों से राजकोषीय आंकड़ों से जूझने वाले एक व्यक्ति के रूप में मेरे मन में आशंका है कि आगामी बजट शायद समझने के लिहाज से सबसे अधिक कठिन बजट साबित होने जा रहा है। ऐसा मुख्यतया तीन वजहों से है। पहली बात, यह बजट विमुद्रीकरण अर्थात नोटबंदी अप्रत्याशित वृहद आर्थिक परिस्थितियों में पेश किया जा रहा है। यह अपने आप में बहुत जटिल नहीं लगता क्योंकि वर्ष 2008 में हम भीषण वित्तीय मंदी का सामना कर चुके हैं। बहरहाल, वस्तु एवं सेवा कर को लागू करने की प्रतिबद्घता ने जरूर थोड़ी दिक्कत पैदा की है। मैं मानकर चल रहा हूं कि अप्रत्यक्ष कर के अनुमान नई जीएसटी दरों के अनुरूप रखे जायेंगे, लेकिन इसके बावजूद उस मोर्चे पर भ्रम कायम है। अगर कोई व्यक्ति आंकड़ों का पूर्ण विश्लेषण चाहता है तो उसके सामने कुछ बाधाएं होंगी। उदाहरण के लिए कौन सी वस्तुओं पर कर लगेगा और किस दर से लगेगा? बजट का लेखाजोखा तैयार करने वाले जीएसटी में केंद्र की हिस्सेदारी और राज्यों की हिस्सेदारी के आंकड़ों को किस तरह अलग करेंगे यह भी देखना होगा? तीसरी समस्या जो चीजों को और अधिक कठिन बनाती है वह राजकोषीय अंकेक्षण मानकों में बदलाव से उत्पन्न होती है। व्यय के मामले में योजनागत और गैरयोजनागत राजस्व का अंतर समाप्त हो जायेगा और समूचा रेल बजट अब आम बजट का हिस्सा होगा। इस सारी कवायद में समस्या यह है कि पिछले सालों से तुलना करना कठिन हो जायेगा।
एक परिश्रमी विश्लेषक अवश्य ही जरूरी समायोजन करके सही नतीजे पर पहुंच ही जायेगा लेकिन अन्य समस्याएं सामने आयेंगी। योजनागत और गैरयोजनागत का विभाजन भले ही बंद कर दिया गया हो, लेकिन यह सोद्देश्य होता है। इसकी वजह से अधिक उत्पादक राजस्व व्यय और वेतन भत्तों तथा ब्याज भुगतान आदि को अलग-अलग देखा जा सकता है। मैं सब्सिडी को भी इसमें शामिल करना चाहूंगा। गलत ही सही लेकिन आम धारणा यह है कि हर योजनागत व्यय वास्तव में बढिय़ा परिसंपत्ति निर्माण वाला पूंजीगत व्यय है और इसका अहम राजस्व घटक है। इसे बेहतर राजस्व व्यय कहा जा सकता है। इसमें मनरेगा जैसी योजनाओं पर होने वाला व्यय शामिल है। मुख्य आंकड़ों में ऐसा भेद बजट व्यय की गुणवत्ता के आकलन की दृष्टि से बेहतर था। मुझे उम्मीद है कि नया प्रारूप इन्हें और अधिक आसान बनायेगा। रेलवे बजट को आम बजट में मिला देने से यह जोखिम पैदा होता है कि उसके व्यय और आय से जुड़ी योजनाएं सूचनाओं के ढेर में दफन हो जायेंगी। क्योंकि आम बजट में तमाम विभागों को लेकर जबरदस्त आंकड़े जारी किये जाते हैं। यह सब अहम है क्योंकि रेलवे को बुनियादी निवेश में अपनी हिस्सेदारी अभी निभानी है।
खबरों के मुताबिक इस वर्ष पूंजीगत व्यय पूर्वनिर्धारित लक्ष्य से काफी हद तक कम रह गया। एक जोखिम यह भी है कि एक अन्य प्रमुख क्षेत्र यानी सड़क जल्दी ही पूरी तरह परवान चढ़ सकता है ऐसे में अगर सरकार चाहती है कि सरकारी व्यय पर आधारित आर्थिक सुधार हो तो रेलवे को भी दम दिखाना होगा। मुझे उम्मीद है कि इस बजट में रेलवे को लेकर ठोस योजनाएं सामने आयेंगी। सबसे अहम बात यह कि 1 फरवरी का बजट विमुद्रीकरण और आंशिक पुनर्मुद्रीकरण के बाद का पहला बजट होगा। वित्त मंत्री अपने बजट भाषण और बजट संबंधी आंकड़ों में इन दोनों का जिक्र जिस तरह करते हैं वह बात बजट की विश्वसनीयता निर्धारित करेगी और आगे की नीति तय करने में भी मदद करेगी। पहला प्रश्न जो उठता है वह यह है कि वित्त मंत्री को किस तरह की वृद्घि को लक्षित करना चाहिए। इस बात के काफी प्रमाण नजर आते हैं कि विमुद्रीकरण ने कुछ क्षेत्रों को अस्थायी तौर पर ही प्रभावित किया है। बहरहाल, तथ्य यह भी है कि शायद ये प्रमाण अपर्याप्त हैं और देश की अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए व्यापक रुझानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसके अलावा मेरा इस धारणा में भी यकीन नहीं है कि अर्थव्यवस्था आसानी से गति पकड़ सकती है या मंद हो सकती है। बहरहाल मैं इसके विपक्ष में दलीलें सुनने को भी तत्पर रहता हूं। अगर बजट में जताए गए वृद्घि संबंधी अनुमान अत्यधिक आक्रामक हुए तो इससे बजट की विश्वसनीयता को ठेस पहुंचेगी।
बहरहाल, अगर सरकार अपने राजकोषीय आकलन को मजबूत वृद्घि पर केंद्रित करना चाहती है तो या तो उसे ठोस योजना पेश करनी होगी जो वृद्घि को बढ़ावा दे या फिर उसे यह स्पष्टद्द बताना होगा कि आखिर उसे यह उम्मीद क्यों है कि अर्थव्यवस्था बिना खास ध्यान दिये ही अपने पांव पर खड़ी हो जायेगी। जहां तक वृहद आर्थिक अनुमानों की बात है तो सबकुछ पहले की तरह नहीं चलने दिया जा सकता है। हमें यह साफ पता चलना चाहिए कि इस पूरे दौर में सरकार ने क्या सोचा। एक मुद्दा यह भी है कि सरकार नोटबंदी के अप्रत्याशित असर से किस प्रकार निपट रही है और क्रेडिट और डेबिट कार्ड से लेकर मोबाइल वॉलेट तक नकदरहित भुगतान व्यवस्था के क्या हाल हैं। मेरा और मेरे सहयोगियों का कहना रहा है कि इससे केंद्र और राज्य दोनों के कर-जीडीपी अनुपात में इजाफा हो सकता है।
उस दृष्टिद्द से देखा जाए तो कह सकते हैं कि यह अचानक नहीं होगा और अगर कर अनुमान बहुत बढ़ेचढ़े नजर आते हैं तो इससे कर अधिकारियों की मनमानी का दौर शुरू हो सकता है। इससे न तो कारोबारियों और न ही उपभोक्ताओं की धारणा को कोई मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त सेनवैट (केंद्रीय मूल्यवर्धित कर) और राज्य वैट (मूल्यवर्धित कर) से जुड़े अनुभव बताते हैं कि कर व्यवस्था में बदलाव के चलते अल्पावधि में कर संग्रह में कमी आती है जबकि मध्यम अवधि में इसका लाभ होता है। बजट को विश्वसनीय बनाने के लिए इस बात पर भी ध्यान देना होगा।
बजट को लेकर भारतीय संचार माध्यम प्राय: ऐसे जुमलों का प्रयोग करते हैं कि बजट या तो बेहद सकारात्मक साबित होगा या नकारात्मक। मैं इसे अनावश्यक तूल देने वालों में से नहीं हूं लेकिन इस बजट को लेकर मुझे भी लग रहा है कि यह आर्थिक प्रगति में सुधार की दृष्टिद्द से निर्णायक साबित होगा। अपने नए स्वरूप में यह विश्लेषकों के लिए भी चुनौती लेकर आ रहा है।