रांची। झारखंड में जदयू अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। लगातार पार्टी का कुनबा झारखंड में कमजोर होता जा रहा है। एक समय था जब झारखंड में जदयू के कई नामदार नेता थे। अलग राज्य बना, तो उस समय जदयू अस्तित्व में नहीं था। समता पार्टी से पांच और जनता दल से तीन विधायक थे। वर्ष 2003 में समता पार्टी और जनता दल का विलय हो गया और जदयू के नाम से पार्टी बनी। पहली सरकार में जदयू के सभी विधायक सत्ता के शीर्ष पर थे। आठ विधायकों में से सात विधायक मंत्री थे और एक विधानसभा के अध्यक्ष थे। उस समय झारखंड की सत्ता में मधु सिंह, लालचंद महतो, जलेश्वर महतो, रमेश सिंह मुंडा, बच्चा सिंह, रामचंद्र केसरी, बैद्यनाथ राम की तूती बोलती थी। खासकर मधु सिंह, लालचंद महतो, रामचंद्र केसरी और रमेश सिंह मुंडा तो अपने हिसाब से सत्ता को चलाते थे। जदयू के ही इंदर सिंह नामधारी की अति महत्वाकांक्षा के कारण बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। नामधारी का साथ दिया था जदयू के विधायकों के साथ समरेश सिंह ने। लेकिन पहली विधानसभा के बाद से ही जदयू में बवंडर शुरू हो गया था।
वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लालचंद महतो, मधु सिंह, रामचंद्र केसरी ने राजद का दामन पकड़ लिया। हालांकि जनता ने चुनाव में इन तीनों नेताओं को विधानसभा नहीं पहुंचने दिया। पार्टी में बिखराव के बाद भी जदयू को वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में छह सीटें मिली। कांग्रेस छोड़कर जदयू में शामिल हुए राधाकृष्ण किशोर विधायक चुने गये। खीरू महतो और कामेश्वर दास ने भी पहली बार विधानसभा में इंट्री मारी। वर्ष 2009 में इंदर सिंह नामधारी ने भी अलग रास्ता अख्तियार कर लिया और राधाकृष्ण किशोर अपने पुराने घर लौट गये। इस चुनाव में जदयू मात्र दो सीट पर सिमट कर रह गया। वर्ष 2014 के चुनाव में तो झारखंड में जदयू का सूपड़ा साफ हो गया। इसी दौरान बिहार में जदयू का स्वर्णिम काल चल रहा था।
वर्ष 2005 से नीतीश कुमार बिहार में मुख्यमंत्री बने। इससे पहले नीतीश कुमार केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री थे, जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष भी वाजपेयी जी की सरकार में केंद्रीय मंत्री थे, लेकिन झारखंड पर कभी इन दोनों नेताओं की नजरें इनायत नहीं हुई। साल में कभी किसी निजी कार्यक्रम में नीतीश कुमार का झारखंड आना होता था। अलबत्ता जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग चल रहे थे, उस समय वह रांची और जमशेदपुर में कार्यक्रम जरूर किये थे। अब फिर भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार चला रहे हैं, तो उनका एक बार भी झारखंड आना नहीं हुआ है। झारखंड में जदयू की स्थिति तो यह है कि उनके प्रदेश अध्यक्ष भी इस पार्टी में रहकर अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे।
वर्ष 2006 से लगातार जलेश्वर महतो जदयू के प्रदेश अध्यक्ष रहे। बीच में एक वर्ष तक खीरू महतो को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। इतने लंबे अंतराल तक पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष रहने के बाद कुछ दिनों पहले जलेश्वर महतो ने जदयू से तौबा कर लिया। आलम यह है कि झारखंड जदयू के खेवनहार बिहार के नेता बने हुए हैं। दो-तीन महीने में एक बार प्रदेश प्रभारी रामसेवक सिंह तथा सह प्रभारी अरुण कुमार सिंह बैठक करने झारखंड आते हैं। कभी भी पार्टी के शीर्ष नेताओं का झारखंड में कार्यक्रम नहीं हुआ।
बिहार के विधायक सुनील चौधरी की कर्मभूमि झारखंड रही है। विधायक सुनील चौधरी भी वर्षों से झारखंड में बिजनेस कर रहे हैं। विधायक बनने के बाद उन्होंने भी ज्यादा समय झारखंड में पार्टी की मजबूती के लिए देना गंवारा नहीं समझा। अब जदयू की स्थिति यह है कि दर्जन भर भी बड़े नेता खोजने पर भी नहीं मिल रहे हैं। ले-देकर खीरू महतो, सुधा चौधरी, बटेश्वर मेहता, कृष्णानंद मिश्र, संजय सहाय, भगवान सिंह सरीखे कुछ नेता हैं, जिन्हें लोग जान रहे हैं। इन्हीं नेताओं के भरोसे यहां पार्टी चल रही है।
बिहार में भाजपा के साथ जदयू के फिर से गठबंधन होने के बाद प्रदेश पार्टी के नेताओं में उम्मीद जगी थी कि झारखंड में भी भाजपा के साथ गठबंधन होने से यहां लगभग मृतप्राय हो चुकी पार्टी को नयी ऊर्जा मिल जायेगी। लेकिन भाजपा ने अभी तक जदयू को कोई भाव ही नहीं दिया। अब तो प्रदेश प्रभारी राम सेवक सिंह एवं श्रवण कुमार भी कहने लगे हैं कि झारखंड में भाजपा के साथ जदयू का गठबंधन नहीं है। पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
नीतीश कुमार का जदयू भले ही बिहार में भाजपा के साथ तालमेल कर लिया है, लेकिन यह फार्मूला झारखंड में चल नहीं रहा है। बिहार में भाजपा के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाने वाला जदयू यहां पसोपेश की स्थिति में है। पार्टी भाजपानीत गठबंधन सरकार का खुलकर समर्थन नहीं करने के साथ-साथ नीतिगत मसलों पर विरोध के स्वर भी बुलंद नहीं कर पा रही है। हालांकि बिहार में भाजपा संग गठबंधन से पहले झारखंड में जदयू के नेता न केवल कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने का काम कर रहे थे, बल्कि समय-समय पर आंदोलन भी करते थे। स्वयं नीतीश कुमार भी रघुवर सरकार को निशाने पर लेने का कोई मौका नहीं चूकते थे।
शराबबंदी के पक्ष में उन्होंने यहां कई कार्यक्रमों में शिरकत किया, लेकिन भाजपा से जुगलबंदी बढ़ने के साथ ही उनका झारखंड आने का सिलसिला भी थम गया है। दरअसल, प्रदेश जदयू के नेता इस आंशा में थे कि भाजपा संग गठबंधन की स्थिति में वह सरकार के ज्यादा करीब होंगे। लेकिन भाजपा ने झारखंड में कभी जदयू को तवज्जो ही नहीं दी। यहां तक कि नगर निकाय चुनाव तथा उपचुनाव में भी इससे कोई सहयोग नहीं लिया।
झारखंड में जदयू की उपेक्षा का आलम यह है कि अब पार्टी के नेता खुले मंच से यह कहने लगे हैं कि उनका यहां भाजपा के साथ गठबंधन नहीं है। जदयू झारखंड में विधानसभा की सभी 81 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। कार्यकर्ताओं के दबाव में लंबे अरसे बाद तय हुआ कि पार्टी राज्य सरकार के अच्छे कार्यों की प्रशंसा करेगी, लेकिन जनता से जुड़े मुद्दों तथा सरकार की खामियों को लेकर चुप नहीं बैठेगी। हालांकि भाजपा द्वारा जदयू की उपेक्षा का एक बड़ा कारण यह भी है कि झारखंड में जदयू की हालत खराब है।
स्थिति यह है कि आज एक भी विधायक इस पार्टी से नहीं हैं। संगठन को मजबूत करने की बात हो तो दो-चार माह पर प्रदेश प्रभारी एवं सह प्रभारी आकर एक-दो दिन बैठक कर चले जाते हैं। पार्टी की गतिविधियां नहीं के बराबर हैं। नीतीश कुमार चाहते तो झारखंड में पार्टी को एक्टिव कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यही वजह है कि जदयू अब बिहार तक ही सीमित होकर रह गया है। प्रशांत किशोर के जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बाद यहां के कार्यकर्ताओं को लगा था कि उनका भी समय झारखंड में पार्टी को मजबूत करने में लगेगा। लेकिन अब तक एक भी कार्यक्रम प्रशांत किशोर का झारखंड में नहीं हुआ है। बहरहाल पिछले चुनाव में तो भाजपा और जदयू एक साथ नहीं थे, लेकिन एक बार फिर से भाजपा और जदयू की जुगलबंदी हो गयी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या मिशन 2019 में भाजपा झारखंड में भी बिहार की तरह जदयू को साथ लेकर चलेगी या यहां दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में होंगे।