सुनहरे वर्तमान के लिए अतीत में संघर्षों से कितना जूझना-लड़ना पड़ा है, यह दिशोम गुरु शिबू सोरेन से बेहतर शायद ही कोई जानता होगा। अपने 77वें जन्मदिन पर शुभचिंतकों की बधाइयां लेते और खुद पर लिखी गयी किताबों के पन्ने पलटते अतीत का स्मरण हो आना स्वाभाविक है और यही सोमवार को झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के साथ हुआ। रांची विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट सभागार मेें जब उन्होंने महाजनों के खिलाफ संघर्ष की अपनी गाथा सुनानी शुरू की, तो जैसे वे अपने पुराने दिनों में लौट चुके थे। शिबू सोरेन ने कहा कि मेरा आंदोलन महाजनी शोषण के खिलाफ था। यह आंदोलन अलग झारखंड राज्य के लिए भी था। पर अब भी उसका पूरा लाभ झारखंड के गरीब आदिवासियों को नहीं मिला है। वे आज भी खेती करते और जंगल के सहारे जीते हैं। कमोबेश पहले की तरह वे आज भी शोषित और दुखी हैं। आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए हम लड़ाई छेडेंÞगे और उसमें जीत भी हमारी ही होगी। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नायक बनने के कारणों की पड़ताल करती दयानंद राय की रिपोर्ट।

ये खूबियां बनाती हैं शिबू को नायक
अविभाजित बिहार में जब महाजन आदिवासियों की खून-पसीने की कमाई लूट रहे थे तो यह सब दिशोम गुरू शिबू सोरेन से बर्दाश्त नहीं हुआ और वे महाजनों के खिलाफ निर्णायक आंदोलन में न केवल कूद पड़े, बल्कि उसका निडरतापूर्वक नेतृत्व भी किया। जिस समय शिबू सोरेन इस काम को अंजाम दे रहे थे, उस समय उनके सामने चुनौती दोहरी थी, उन्हें न केवल महाजनों का मुकाबला करना था, बल्कि सत्ता और पुलिस से भी लोहा लेना था, जो तब महाजनों के हक में ही काम कर रही थी। शिबू सोरेन ने ऐसी परिस्थितियों में न सिर्फ लंबे समय तक आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि कई बार ऐसा करते हुए अपनी जान को जोखिम में डालने से नहीं चूके। उनका साहस उन्हें कद्दावर नेतृत्वकर्ता बनाता गया।
समस्याएं समझीं और समाधान का रास्ता बनाया
दरअसल, शिबू सोरेन यह समझ चुके थे कि आदिवासी समाज की दुर्दशा इसलिए नहीं है कि यह समाज मेहनत कम करता है, या फिर इसके पास संसाधनों का अभाव है। इसकी दुर्दशा इसलिए है, क्योंकि इसकी मेहनत पर महाजन डाका डाल देते हैं, धान वे अपने खेत में उगाते हैं और उनकी उपज महाजन ले जाते हैं। अशिक्षा और शराब का सेवन भी आदिवासी समाज के उत्थान में बाधक है। इसलिए यदि आदिवासी समाज में बेहतरी लानी है तो इन्हें उनका हक दिलाना होगा। वे जानते थे कि समाज में उन्नति बोलने से नहीं आयेगी करने से आयेगी और इसलिए उन्होंने कर के दिखाया।
बताया डर के आगे जीत है
आदिवासी समाज महाजनों के शोषण का शिकार इसलिए बन रहा था क्योंकि वे महाजनों के जुल्म के खिलाफ बोलने से डरते थे। जेल जाने के प्रति उनके मन में भय था और शिक्षा की कमी के कारण उनमें हिचक थी। शिबू सोरेन ने इन सब भ्रांतियों को न सिर्फ तोड़ा, बल्कि आदिवासियों में जागृति भी ले आये। वे तय कर चुके थे कि हम न सिर्फ जुल्म के खिलाफ आंदोलन करेंगे, बल्कि उसमें जीत भी हमारी होगी। शिबू सोरेन यह भी जानते थे कि जिस निर्णायक संघर्ष का वे नेतृत्व कर रहे हैं उसमें उन्हें जेल भी जाना होगा। पर इसके लिए वह खुद को तैयार कर चुके थे। खुद उनके ही शब्दों में आंदोलन के दौरान जेल भी जायेंगे तो अच्छा है, जेल भी दिखना चाहिए, जेल से डरता है लोग। जेल से दूसरे भले ही डरते हों पर शिबू सोरेन के लिए तो जेल की चाहरदीवारी और घर में जैसे कोई अंतर ही नहीं था। इन्हीं संघर्षों ने आदिवासी समाज में उनकी नायक की छवि निर्मित की। आदिवासी समाज दिशोम गुरु को अपने हक के लिए लड़ता देख रहा था, जूझता देख रहा था, जेल जाता देख रहा था, शिक्षा हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करता देख रहा था और शराब से बचने की सीख देता दिख रहा था। वे देख रहे थे कि दिशोम गुरु की जबान में जो है, वही उनके दिल में भी है। इन सबने मिलकर जनजातीय समाज में उनकी ऐसी गहरी छाप छोड़ी जो विस्मृत होनेवाली नहीं थी।
राजनीति में भी खींची लंबी लकीर
शिबू सोरेन की आंखों में जनजातीय समाज की बेहतरी के साथ अलग झारखंड राज्य का सपना भी पलता था। वे जानते थे कि राजनीति में आये बिना यह काम पूरा नहीं हो सकता, इसलिए उन्होंने स्वर्गीय बिनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। ऐसे समय में जब राष्टÑीय राजनीति में कांग्रेस की तूती बोल रही हो उसमें पार्टी बनाकर उसे स्थापित करना चुनौती भरा काम था। शिबू सोरेन ने यह काम बखूबी किया और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो झारखंड का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनने में सफल रहा। नायक की एक और काबिलियत यह होती है कि उसके कथन की स्वीकार्यता सबमें होती है। अपनी पार्टी में शिबू सोरेन ने अपने कार्यों से वह स्थान हासिल किया कि उनकी बात काट पाना फिर उनकी पार्टी के किसी नेता के लिए संभव नहीं हो पाया।
झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य उनके व्यक्तित्व की बाबत कहते हैं कि अनुसूचित जाति के जीवन में नयी रौशनी लाने का जो काम बाबा साहेब भीम राव अंबेदकर ने किया, वही काम आदिवासियों के जीवन में उत्थान लाने के लिए शिबू सोरेन ने किया। ये राष्टÑ के दो ऐसे आइकॉन हैं जिन्होंने दलित, वंचित और शोषित समाज की बेहतरी के लिए पूरी ताकत लगायी। शिबू सोरेन आज भी आदिवासियों के हक लिए संघर्षरत हैं। आदिवासी समाज की बेहतरी के लिए किया जा रहा उनका संघर्ष ही उन्हें दिशोम गुरु बनाता है।

हर जन्मदिन के साथ बढ़ जाता है आत्मविश्वास
झारखंड की दो बड़ी राजनीतिक हस्तियों का जन्मदिन सोमवार को मना। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन और प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के जन्मदिन को लेकर कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह रहा। समर्थकों ने भी अपने-अपने अंदाज में जन्मदिन को सेलिब्रेट किया। पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी किसान परिवार में जन्म लेकर राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने। उनके बारे में यह सत्य है कि विषम परिस्थिति में वह और अधिक मजबूती से उभरते हैं और कभी धैर्य नहीं खोते, विचलित नहीं होते। उन्हें जब-जब चुनौती मिलती है, वह और अधिक निखर कर सामने आते हैं। उनकी जीवटता का अंदाज आप इससे भी लगा लें कि नक्सलियों ने बाबूलाल मरांडी को अपने पथ से डिगाने के लिए उनके पुत्र की हत्या कर दी, बावजूद वे इससे टूट नहीं। और अधिक मजबूती से वे राजनीति के क्षेत्र में उभरे। तमाम राजनीतिक झंझावातों के बीच बाबूलाल मरांडी भाजपा विधायक दल के नेता हैं और जन सरोकार की राजनीति कर रहे हैं। जन्मदिन के अवसर पर उनके बारे में बता रहे हैं आजाद सिपाही के सिटी एडिटर राजीव कुमार।

झारखंड की राजनीतिक सियासत के मजबूत स्तंभ माने जानेवाले बाबूलाल मरांडी सोमवार को पूरे जोश और उत्साह से लबरेज नजर आये। जन्मदिन के मौके पर सुबह से शाम तक आम और खास की बधाइयां वह सहज स्वीकार करते गये। कार्यकर्ताओं में बाबूलाल मरांडी के प्रति अब भी गहरा विश्वास है। शायद इसी कारण बाबूलाल मरांडी का आत्मविश्वास भी देखने लायक था। बाबूलाल के चेहरे की मुस्कान यह बता रही थी कि अभी भी उनमें सियासत का काफी दम बाकी है। एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि शायद बाबूलाल खत्म हो जायेंगे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मजबूती के साथ सफर पर चलते रहे। वहीं भाजपा में आने के बाद भी गुटबाजी के शिकार होने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारे में खूब चली, लेकिन बाबूलाल मरांडी इससे बेपरवाह अपनी मंजिल की ओर चलते रहे। नतीजा जन्मदिन पर दिखा, भाजपा का आम और खास शायद ही कोई ऐसा होगा, जिन्होंने बाबूलाल को जुबां या दिल से विश नहीं किया हो। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश, धर्मपाल सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास से लेकर तमाम विधायक और कार्यकर्ताओं ने उन्हें बधाइयां दीं। उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस अवसर पर कार्यकर्ता-नेताओं की भीड़ के बावजूद बाबूलाल मरांडी ने नेत्रहीन बच्चों के संग अपना जन्मदिन मनाना नहीं भूले। वह लगातार आठ साल से इन बच्चों के साथ अपना जन्मदिन मनाते रहे हैं। इस कारण इन नेत्रहीन बच्चों को भी 11 जनवरी का इंतजार बेसब्री से रहता है। यहां भी सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ताओं ने उन्हें विश किया। बाबूलाल मरांडी ने भी किसी कार्यकर्ता और नेता को निराश नहीं किया। पूरी गर्मजोशी के साथ सबकी बधाइयां स्वीकार की।
चुनौतियों के पहाड़ को अवसरों में बदला बाबूलाल ने
पग-पग पर चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने राज्य के मुखिया तक का सफर तय किया। जन्मदिन के मौके पर चर्चा यह भी रही कि चुनौतियों के पहाड़ को अवसरों के आसमान में बदलने का नाम बाबूलाल मरांडी है। बचपन से ही उनके सामने चुनौतियां आती रहीं, लेकिन उन्होंने डटकर मुकाबला किया और उसे अवसर में बदला। कैसे झंझावातों को झेलकर आगे बढ़ा जाता है, इसका जीता जाता उदाहरण बाबूलाल मरांडी हैं। मुसीबतों में भी हार नहीं मानते हैं। नक्सलियों ने उन्हें रास्ते से हटाने के लिए उनके बेटे तक की हत्या कर दी, लेकिन बाबूलाल मरांडी पथ से विचलित नहीं हुए। उन्होंने उसी अंदाज में नक्सलियों को ललकारा। विषम से भी विषम परिस्थिति में बाबूलाल हार नहीं मानते। निराश नहीं होते। बाबूलाल के चेहरे पर मुस्कान इनसे मिलनेवालों का भी विश्वास और उत्साह को और बढ़ा देती है। यही कारण रहा कि न सिर्फ बाबूलाल को रांची में आम और खास ने बधाई दी, बल्कि सोशल मीडिया से लेकर झारखंड के विभिन्न शहरों और गांवों में बाबूलाल का जन्मदिन उत्साह के साथ मनाया गया। राजनीति के अलावा शिक्षा जगत में भी बाबूलाल की लोकप्रियता कम नहीं है। शिक्षक भी जन्मदिन पर बाबूलाल को विश करते दिखाई पड़े। उनका जीवत वृत्तांत काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। बतौर शिक्षक जब वह गिरिडीह के देवरी प्राथमिक विद्यालय में नौकरी कर रहे थे, उस वक्त विभागीय अधिकारियों से कुछ ऐसी बातें हो गयीं कि शिक्षक बाबूलाल मरांडी ने नौकरी छोड़ राजनीति की राह पकड़ ली और समय के साथ राजनीति में भी धाक जमा ली। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर सीएम तक बने। एक समय उन्होंने भाजपा को त्याग दिया लेकिन फिर अपनी नयी पार्टी झाविमो का 14 साल बाद 2020 में उन्होंने बीजेपी में विलय कर लिया और एक बार फिर झारखंड में बीजेपी के सर्वमान्य नेता बन गये। यही कारण रहा कि पार्टी का विलय करने के बाद उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया।
हर समय सबका विश्वास जीतने की कोशिश
सर्वमान्य नेता क्या होता है, इसका रूप भी सोमवार को बाबूलाल के जन्मदिन पर दिखाई पड़ा। माला पहनाने, केक खिलाने, बुके देने की होड़ लगी रही। बाबूलाल भी सरलता और सहजता के साथ बधाइयों को स्वीकार करते रहे। दरअसल बाबूलाल मरांडी को धैर्य, संयम, सरल और सहज व्यवहार के कारण जाना जाता है। कहते हैं अगर वे गुस्सा भी जाते हैं, तो उसकी झलक चेहरे पर नहीं आने देते। उनमें सहनशीलता बहुत है। उनके बारे में कार्यकर्ताओं में यह बात प्रचलित है कि राजनीति में वह किसी का नुकसान नहीं करते। किसी को लंगी मार कर वह आगे नहीं बढ़ते, बल्कि अपनी राह अलग बना कर स्थापित होने की कोशिश करते हैं। भाजपा में फिर से आने के बाद भी बाबूलाल मरांडी किसी को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मान रहे, बल्कि सबका विश्वास जीतने की कोशिश कर रहे हैं।

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