-कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या आइएएस-आइपीएस अफसरों के बच्चों को भी कोटा मिलना चाहिए?
-कोर्ट एससी-एसटी में कोटा को लेकर दिये गये 2004 के अपने ही फैसले की समीक्षा भी करेगी
आजाद सिपाही संवाददाता
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह एससी-एसटी में कोटा को लेकर दिये गये 2004 के अपने ही फैसले की समीक्षा करेगी। 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यों को अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में कोटा के लिए सब-कैटेगरी बनाने का अधिकार नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक बेंच इस फैसले की समीक्षा करेगी। इस बेंच की अगुवाई सीजेआइ डीवाई चंद्रचूड़ करेंगे। इसमें जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के पंजाब के एससी-एसटी कानून के मामले से सुनवाई की शुरूआत की। पंजाब सरकार 2006 में कानून लेकर आयी थी, जिसके तहत एससी कोटा में वाल्मीकि और मजहबी सिखों को नौकरी में 50 फीसदी आरक्षण और प्राथमिकता दी गयी थी। पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट ने 2010 में इस कानून को असंवैधानिक बताया था और एक्ट को खत्म कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ पंजाब सरकार समेत 23 अपील दायर की गयी हैं। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई का दूसरा दिन था। इससे पहले मंगलवार को भी सुनवाई हुई थी।
कोर्ट ने सवाल किया कि क्या पिछड़ी जातियों में मौजूद संपन्न उपजातियों को आरक्षण की सूची से बाहर क्यों नहीं किया जाना चाहिए? बेंच ने यह भी सवाल उठाया कि क्या आइएस-आइपीएस अफसरों के बच्चों को कोटा मिलना चाहिए? बेंच में शामिल जस्टिस विक्रम नाथ ने पूछा कि इन्हें आरक्षण सूची से क्यों नहीं निकाला जाना चाहिए? उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ उपजातियां संपन्न हुई हैं। उन्हें आरक्षण से बाहर आना चाहिए। ये आरक्षण के दायरे से बाहर आकर बेहद पिछड़े और हाशिए पर चल रहे वर्ग के लिए जगह बना सकती हैं। बेंच में शामिल जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि एक शख्स जब आइएएस या आइपीएस बन जाता है, तो उसके बच्चे गांव में रहनेवाले उसके समूह की तरह असुविधा का सामना नहीं करते। फिर भी उनके परिवार को पीढ़ियों तक आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा। अब ये संसद को तय करना है कि संपन्न लोगों को आरक्षण से बाहर करना चाहिए या नहीं।
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