- सकारात्मक पहल : 2 अप्रैल को घाटी में जुटेंगे विस्थापित कश्मीरी पंडित
विवेक रंजन अग्निहोत्री की बहुचर्चित फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के जरिये कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार, उनके कत्लेआम और उनके विस्थापन का दर्द दुनिया के सामने आने के बाद इस बार नये साल यानी नवरेह पर घाटी में पंडितों की वापसी की आवाज बुलंद होगी। कश्मीरी पंडितों को एकजुट करने और उन्हें घाटी तक लाने के लिए कई संगठनों ने बड़ी पहल की है और उम्मीद की जा रही है कि यह पहल एक बड़े आंदोलन के रूप में बदलेगी और इसका सकारात्मक नतीजा निकलेगा। यह पहल 2 अप्रैल को नवरेह के मौके पर शुरू होगी और 32 साल में यह पहला मौका होगा, जब कश्मीरी पंडितों को घाटी तक लाने के उपाय किये जायेंगे। इस मौके को निरापद ढंग से संपन्न कराने के लिए तमाम तैयारियां चल रही हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि 1989 के बाद पहली बार कश्मीरी पंडितों के दर्द का स्थायी और पुख्ता इलाज करने के बारे में सोचा गया है। इस आयोजन से पहले एक अमेरिकी संस्था द्वारा आयोजित सुनवाई के दौरान करीब दर्जन भर कश्मीरी पंडितों ने जो दर्द बयां किया है, वह भी गौर करनेलायक है। ऐसे में सवाल उठता है कि कश्मीरी पंडितों के लिए होनेवाले इस आयोजन को सियासत से अलग कैसे रखा जाये। इन तमाम सवालों को रेखांकित करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।
32 साल, यानी हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार कलियुग का पौने तीन युग (एक युग 12 साल के बराबर) कम नहीं होता। इस दौरान झेलम और चिनाब में बहुत पानी बह गया है और भारत के सिर का ताज कश्मीर भी बहुत बदल चुका है। मोदी सरकार द्वारा धारा 370 हटाये जाने के बाद से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की मुख्यधारा में कश्मीर अपना सकारात्मक योगदान दे रहा है। वहां पाकिस्तान पोषित आतंकवाद अब दम तोड़ रहा है। लेकिन कश्मीर का एक दर्द, जो अब तक अनदेखा और उपेक्षित था, इस बार हमेशा के लिए खत्म होने की संभावना बन गयी है। यह दर्द है कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की।
क्या है यह साहसिक पहल
विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के जरिये दुनिया को कश्मीरी पंडितों का दर्द बयां करने के बाद अब इन विस्थापितों की घर वापसी की पहल शुरू हो रही है। कश्मीरी विस्थापितों के लिए काम करनेवाले कई संगठनों ने यह पहल शुरू की है और 2 अप्रैल को 32 साल में पहली बार कश्मीरी पंडित घाटी में जुटेंगे। उस दिन नवरेह, यानी नववर्ष मनाने के लिए ये लोग एकत्र होंगे। इन्हें जम्मू और देश के अलग-अलग हिस्सों से घाटी तक ले जाया जायेगा। वहां हरि पर्वत पर मां शारिका मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ ही पंडितों की वापसी की कामना की जायेगी। सार्वजनिक समारोह कर वापसी के लिए अनुकूल माहौल बनाने के प्रयास होंगे, जिसमें सभी धर्मों और संप्रदायों के लोग शामिल होंगे। इस समारोह को सियासी तामझाम और विवादों से अलग रखने के लिए इसमें सभी दलों के नेताओं को बुलाया गया है। इस पहल का नेतृत्व जेके पीस फोरम नामक संगठन कर रहा है और दूसरे कई संगठन इसका समर्थन कर रहे हैं। घोषित कार्यक्रम के अनुसार शारिका मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ ही शेर-ए कश्मीर पार्क में नवरेह मिलन कार्यक्रम होगा। घाटी में भाइचारे को बढ़ावा देने के साथ ही पंडितों की सम्मानजनक वापसी की आवाज बुलंद की जायेगी। कार्यक्रम का उद्देश्य 30 साल के विस्थापन के बीच धार्मिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से नयी पीढ़ी को अवगत कराना और दहशत में घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर लोगों के लिए सुरक्षा और आत्मसम्मान की भावना जगाना है। इस पहल का सबसे खास पहलू यह है कि इस बार कोशिश है कि सभी धर्मों के लोगों को एक मंच पर लाकर पंडितों की वापसी का माहौल बनाया जाये। इसके लिए अंतर समुदाय सांस्कृतिक महोत्सव भी कराया जा रहा है। कोशिश होगी कि सभी लोग एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और सभी के प्रति सम्मान का भाव जगे। आयोजकों के अनुसार सर संघचालक डॉ मोहन भागवत भी नवरेह पर इस बार आॅनलाइन संबोधित करेंगे। संजीवनी शारदा केंद्र जम्मू के माध्यम से इस कार्यक्रम का आयोजन 3 अप्रैल को होगा।
32 साल बाद पहली बार ऐसा कार्यक्रम
इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि 32 साल में पहली बार कश्मीर पंडितों की घर वापसी के लिए सकारात्मक माहौल बना है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने के ऐतिहासिक फैसले के बाद पहली बार सामूहिक स्तर पर इतना बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। 32 साल पहले जिन कश्मीरी पंडितों को अपना घर-बार छोड़ कर शरणार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ा था, उनके मन में आशा का संचार हुआ है। लेकिन इस बड़ी और सकारात्मक पहल के बीच एक और बात नोट करने लायक है कि कश्मीरी पंडितों का दर्द अब छिप-छिपा कर नहीं, बल्कि खुलेआम सामने आ रहा है। कश्मीरी पंडितों को यह हिम्मत मोदी सरकार की नीतियों ने दी है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।
क्या कहा कश्मीरी पंडितों ने
कश्मीरी पंडितों ने अमेरिका स्थित संस्था अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता आयोग को यह मानने के लिए मजबूर कर दिया है कि 1989 और इसके बाद के कई वर्षों तक कश्मीर में पंडितों का नरसंहार हुआ। आयोग द्वारा की गयी आॅनलाइन सुनवाई के दौरान कश्मीरी हिंदुओं ने अपने परिजनों, रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों पर हुए अत्याचारों और हत्याओं का ब्योरा दिया। आयोग के पदाधिकारियों ए आदित्यांजी और कार्ल क्लींस ने इन्हें दर्ज किया। आयोग ने कहा, कत्ल, विस्थापन, हिंदुओं से भेदभाव, यह नरसंहार नहीं तो और क्या था? संस्था को कश्मीरी पंडितों ने बताया है कि किन हालात में कश्मीर छोड़ने को वे मजबूर होने लगे थे। कई कश्मीरी परिवारों ने बिना किसी तैयारी के और डर के साये के बीच अचानक कश्मीर छोड़ दिया था और यह पलायन कई सालों तक चलता रहा। उनका मानना है कि यह कोई एक-दो दिन या एक-दो साल की घटना नहीं थी, जिसकी वजह से ऐसे हालात पनपे हैं और कश्मीरियों को विस्थापित होना पड़ा, इसके पीछे लंबी कहानी है। यह सिलसिला डर और गुस्सा, दोनों के कारण शुरू हुआ। इन्हीं दोनों ने मिल कर 90 के दशक की वह भयावह शुरूआत की, जिसमें कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनने पर मजबूर किया गया और कश्मीर को दमन, हिंसा और डिस्टोपिया के गहरे और अंतहीन दलदल में धकेल दिया गया। अब 2 अप्रैल को पहली बार उस दर्द के स्थायी इलाज की पहल शुरू हो रही है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। विस्थापन का दर्द सीने में दबाये हजारों कश्मीरी पंडितों के लिए दुआ की जानी चाहिए कि वे अपने घर वापस जा सकें। जो हो गया, उसे तो लौटाया नहीं जा सकता, लेकिन उस पीड़ा को कम जरूर किया जा सकता है और फिलहाल इसकी ही सबसे अधिक जरूरत है।