विशेष
उम्मीदवारों की सूची से ही पता चलता है पार्टी की असली रणनीति
पार्टी ने प्रत्याशी चयन में हरेक समीकरण पर दिया है खास ध्यान
ममता के गढ़ को भेदने के लिए पार्टी ने बिछायी है जबरदस्त बिसात
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी और चुनाव आयोग द्वारा अभूतपूर्व प्रशासनिक फेरबदल के बाद आरोप-प्रत्यारोपों के बीच प्रत्याशी चयन का काम भी तेजी से चल रहा है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भाजपा ने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है, जिनको लेकर अलग-अलग तरह की बातें सामने आ रही हैं। इन सूचियों पर नजर दौड़ाने से एक बात साफ हो जाती है कि इस बार भाजपा ने ममता के गढ़ को भेदने के लिए जबरदस्त बिसात बिछायी है। पार्टी द्वारा जारी उम्मीदवारों की दो सूचियों के गहन विश्लेषण से यह बात भी सामने आती है कि इस बार पार्टी ने पश्चिम बंगाल के लिए अपनी रणनीति में जबरदस्त बदलाव किया है। प्रत्याशी चयन में हरेक सामाजिक समीकरण का ध्यान रखा गया है और स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी इसमें जगह मिली है। इतना ही नहीं, प्रत्याशी चयन में बूथ स्तर तक के नेताओं के सुझावों पर ध्यान दिया गया। इसी का नतीजा है कि भाजपा की सूची जारी होने के बाद कहीं से विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिये हैं। पार्टी ने राजनीति और प्रशासन के कई दिग्गजों को मैदान में उतार कर साफ कर दिया है कि इस बार वह बंगाल के चुनाव को जीतने के लिए अपना सब कुछ झोंक रही है। भाजपा के इस फुलप्रूफ प्लान का नतीजा चाहे कुछ भी हो, एक बात तो तय हो गयी है कि यह चुनाव बेहद रोमांचक होनेवाला है, क्योंकि इस बार सत्तारूढ़ दल से अधिक सक्रिय विपक्षी पार्टी दिख रही है। क्या थी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी चयन में भाजपा की रणनीति और कैसे हुआ प्रत्याशियों का चयन, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पहली और दूसरी सूची जारी कर साफ संकेत दे दिया है कि इस बार वह आधी-अधूरी तैयारी के साथ नहीं, बल्कि पूरी ताकत, पूरी रणनीति और पूरी आक्रामकता के साथ मैदान में उतरी है। खासतौर पर दूसरी सूची में 111 उम्मीदवारों के नामों पर नजर डालने पर पता चलता है कि एक-एक सीट पर गहरे मंथन के बाद उम्मीदवार तय किये गये हैं। हिंगलगंज से रेखा पात्रा, खड़दह से कल्याण चक्रवर्ती, सोनारपुर दक्षिण से रूपा गांगुली, मथाभांगा से निसिथ प्रमाणिक, चोपड़ा से शंकर अधिकारी, बैरकपुर से कौस्तव बागची, कमरहाटी से अरूप चौधरी जैसे नाम सीधे चुनावी मुकाबले को और दमदार बना रहे हैं। इसके अलावा एंटाली से प्रियंका टिबड़ेवाल और मानिकतला से तपस रॉय जैसे उम्मीदवार राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखते हैं।
पहली सूची में बड़े नामों की भरमार
यदि भाजपा की पहली सूची पर नजर डालें, तो वहां भी बड़े नामों की भरमार है। विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर से उतार कर पार्टी ने सीधे ममता बनर्जी को चुनौती दे दी है। दिलीप घोष, स्वपन दासगुप्ता, अग्निमित्रा पाल, रुद्रनील घोष और बंकिम चंद्र घोष जैसे चेहरे इस चुनाव को हाइ वोल्टेज बना रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार पार्टी ने सिर्फ चर्चित चेहरों पर नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं पर भी भरोसा दिखाया है। आउसग्राम से कलिता माजी जैसी साधारण पृष्ठभूमि की कार्यकर्ता को टिकट देना इसी रणनीति का हिस्सा है।
पूर्व आइपीएस डॉ राजेश कुमार की एंट्री
इस चुनाव का एक और बड़ा और चौंकाने वाला पहलू है पूर्व पुलिस आयुक्त डॉ राजेश कुमार का राजनीति में प्रवेश। यह सिर्फ एक उम्मीदवार का नाम नहीं, बल्कि भाजपा की रणनीतिक चाल है। डॉ राजेश कुमार का प्रशासनिक अनुभव, वित्त और प्रबंधन में गहरी समझ और कानून व्यवस्था पर मजबूत पकड़ उन्हें एक अलग ही स्तर का नेता बनाती है। कोलकाता के पुलिस आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल, अपराध जांच विभाग और यातायात सुरक्षा जैसे अहम पदों पर उनकी भूमिका उन्हें आम नेता से अलग पहचान देती है। उनकी छवि एक सख्त, लेकिन न्यायप्रिय अधिकारी की रही है। मानव तस्करी के खिलाफ उनकी मुहिम और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए किये गये काम उन्हें जनता के बीच भरोसेमंद चेहरा बनाते हैं। भाजपा के लिए यह कदम इसलिए भी फायदेमंद है, क्योंकि बंगाल में कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में एक पूर्व शीर्ष पुलिस अधिकारी को चुनावी मैदान में उतारना सीधे तौर पर संदेश देता है कि पार्टी व्यवस्था सुधारने के लिए गंभीर है। राजनीतिक रूप से भी यह दांव गहरा है। डॉ राजेश कुमार का प्रशासनिक और बौद्धिक कद भाजपा को उस वर्ग में भी मजबूती देगा, जो अब तक तटस्थ रहा है। उनकी कानूनी लड़ाइयों ने यह भी साबित किया है कि वह दबाव में झुकने वाले नहीं हैं। यह छवि भाजपा के लिए चुनाव में बड़ी पूंजी साबित हो सकती है।
भावनात्मक मुद्दे को भुनाने की कोशिश
इस चुनाव को और भावनात्मक और विस्फोटक बनाने वाला मुद्दा है आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना। उस दर्दनाक घटना ने पूरे बंगाल को झकझोर दिया था। अब पीड़िता की मां का राजनीति में आने का संकेत यह बता रहा है कि जनता के भीतर गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है। महिलाओं का सड़क पर उतरना, रात भर प्रदर्शन करना और न्याय की मांग करना तृणमूल सरकार के खिलाफ एक बड़ा जनमत बना चुका है। माना जा रहा है कि पीड़िता की मां ने भाजपा से पनिहाटी से टिकट मांगा है। भाजपा उन्हें उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रही है, क्योंकि पार्टी उस जनाक्रोश को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की कोशिश कर रही है। बता दें कि पनिहाटी उन 38 सीटों में शामिल है, जहां से भाजपा ने अब तक अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किये हैं।
सामाजिक समीकरणों पर ध्यान
इसके अलावा भाजपा ने सामाजिक समीकरणों पर भी खास ध्यान दिया है। अनुसूचित जाति और जनजाति सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतार कर पार्टी ने अपने आधार को और व्यापक बनाने का प्रयास किया है। उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण तक हर क्षेत्र में संतुलन साधने की रणनीति साफ दिख रही है। इसके अलावा भाजपा अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, स्थानीय चेहरों को आगे लाने और ममता सरकार के खिलाफ जन असंतोष को वोट में बदलने की रणनीति भी बहुत पहले ही बना चुकी है और उसी के आधार पर चुनाव प्रचार अभियान चलाया जायेगा। इसके अलावा इस बार भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बदला हुआ दृष्टिकोण है। पिछली बार जहां पार्टी पर बाहरी चेहरों पर ज्यादा भरोसा करने का आरोप लगा था, इस बार उसने जमीनी कार्यकर्ताओं और विचारधारा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी है। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है और संगठन ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। दूसरी तरफ तृणमूल सरकार पर कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगातार भारी पड़ रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा पूरे दमखम के साथ यह दावा कर रही है कि इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन तय है।
बहरहाल, उम्मीदवारों की सूची, पूर्व पुलिस आयुक्त जैसे मजबूत चेहरे की भाजपा में एंट्री, जमीनी कार्यकर्ताओं पर भरोसा और जनता के गुस्से को सही दिशा देने की रणनीति ने भाजपा को इस चुनाव में बेहद मजबूत प्रतिद्वंद्वी और सत्ता का सबसे प्रबल दावेदार बना दिया है। अब देखना यह है कि क्या यह रणनीति मतदान के दिन वोट में बदलती है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इस बार बंगाल की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा तीखी, ज्यादा धारदार और ज्यादा निर्णायक होने वाली है।



