विशेष
राष्ट्रपति का पद संविधान की रक्षा और राष्ट्र की नैतिक शक्ति का प्रतीक है
देश के प्रथम नागरिक की गरिमा का थोड़ा सा भी लिहाज नहीं किया ममता सरकार ने
यह राजनीतिक पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा ही नहीं, प्रशासनिक अक्षमता है

नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने देश की राष्ट्रपति के साथ जो व्यवहार किया है, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाये, कम है। वास्तव में राष्ट्रपति के साथ जो कुछ हुआ, वह उनकी नहीं, देश का, देश के संविधान का और 140 करोड़ लोगों का अपमान है। राज्य प्रशासन द्वारा किया गया यह व्यवहार न केवल दुर्भाग्यपूर्ण, बल्कि खतरनाक भी है। जिस प्रदेश ने देश का संविधान बनाने में अहम भूमिका निभायी और एक से एक बौद्धिक रत्न पैदा किये, वहां देश के संवैधानिक प्रमुख के साथ इस तरह के व्यवहार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कभी बौद्धिक क्रांति के लिए प्रख्यात पश्चिम बंगाल की धरती पर आज भारतीय संघवाद का सिद्धांत दम तोड़ता नजर आ रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच की लगातार चौड़ी होती खाई ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि राज्य के लोगों के साथ-साथ पूरा देश आशंका भरी नजरों से संस्कारों से भरे इस प्रदेश को देख रहा है। हालत यह हो गयी है कि हर मुद्दे को राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि राज्य के भविष्य के बारे में कोई भी आकलन खतरे से खाली नहीं है। राज्य सरकार का यह व्यवहार इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करता है कि इस बार मामला सीधा नहीं है। टकराव की यह राजनीति बंगाल के लिए नयी नहीं है, लेकिन इस बार तो संवैधानिक व्यवस्था और सामान्य शिष्टाचार की सारी सीमाएं टूट गयी हैं। आखिर देश को सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण की राह दिखानेवाले पश्चिम बंगाल की राजनीति कड़वाहट और टकराव के इस चरम बिंदु तक क्यों और कैसे पहुंच गयी। कौन है इसका जिम्मेवार और क्या हो सकता है इसका परिणाम, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

भारत का लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों में लिखे प्रावधानों से नहीं चलता, बल्कि उसकी आत्मा राजनीतिक शालीनता, संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान और लोकतांत्रिक परंपराओं की मयार्दा में निहित होती है। जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, यानी राष्ट्रपति के प्रति असम्मान का भाव दिखाई देता है, तो यह केवल किसी व्यक्ति का अपमान नहीं होता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे और उसकी गरिमा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। सात मार्च को पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इसी तरह की चिंता को जन्म दिया है।

क्या हुआ दार्जीलिंग में
दार्जीलिंग के बिधाननगर उपमंडल में नौवां अंतरराष्ट्रीय संताल सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसका उद्घाटन सात मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को करना था। अंतिम समय में पश्चिम बंगाल पुलिस ने कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति नहीं दी। तब आनन-फानन में कार्यक्रम स्थल को बदल कर बागडोगरा के गोशाइपुर किया गया। राष्ट्रपति जब सिलिगुड़ी पहुंचीं, तो वहां न राज्यपाल थे और न मुख्यमंत्री। इतना ही नहीं, राज्य सरकार का कोई भी उच्चाधिकारी राष्ट्रपति के स्वागत के लिए मौजूद नहीं था। सिलिगुड़ी के मेयर और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने राष्ट्रपति का स्वागत किया। इसके बाद राष्ट्रपति कार्यक्रम स्थल पर गयीं और वहां से लौट कर विधाननगर आयीं। यहां उन्होंने अपने साथ हुए व्यवहार पर दुख प्रकट किया और राज्य सरकार के प्रति नाराजगी जतायी।
राजनीति से ऊपर है राष्ट्रपति का पद
राष्ट्रपति किसी दल, विचारधारा या क्षेत्र का प्रतिनिधि नहीं होते। वे पूरे राष्ट्र की एकता, अखंडता और संविधान की सर्वोच्चता के प्रतीक होते हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य में राष्ट्रपति के प्रति असम्मानजनक व्यवहार होता है या ऐसा वातावरण बनता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक मतभेद संवैधानिक गरिमा से ऊपर हो गये हैं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।

संवैधानिक पद की गरिमा
भारत के राष्ट्रपति का पद केवल औपचारिक नहीं है। यह संविधान की रक्षा और राष्ट्र की नैतिक शक्ति का प्रतीक है। राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होते हैं, सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं और संवैधानिक प्रक्रियाओं की अंतिम स्वीकृति उन्हीं के माध्यम से होती है। इसलिए राष्ट्रपति के प्रति सम्मान दिखाना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्य भी है। भारत की राजनीतिक संस्कृति में यह परंपरा रही है कि चाहे कितने भी तीखे राजनीतिक मतभेद क्यों न हों, राष्ट्रपति, न्यायपालिका और सेना जैसी संस्थाओं के प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं आने दी जाती। पश्चिम बंगाल की घटना ने इसी परंपरा को झकझोरने का काम किया है। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, जहां देश के प्रथम नागरिक की गरिमा प्रभावित होती दिखे, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता।

राजनीति और शिष्टाचार की गिरती मयार्दा
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में भाषा और व्यवहार की मयार्दाएं लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन जब यह प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत आक्षेपों, अपमानजनक टिप्पणियों और संवैधानिक पदों के प्रति असम्मान में बदल जाती है, तो लोकतांत्रिक संवाद का स्तर गिरने लगता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से तीखी और टकरावपूर्ण रही है। राज्य में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच संघर्ष अक्सर सड़कों तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में कई बार राजनीतिक बयानबाजी मयार्दाओं की सीमा लांघ जाती है। लेकिन राष्ट्रपति जैसे पद के मामले में यह अपेक्षा की जाती है कि सभी दल अपने मतभेदों को अलग रखकर सम्मान और गरिमा का परिचय दें।

संघीय ढांचे पर असर
भारत एक संघीय लोकतंत्र है, जहां केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन और सहयोग बेहद महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपति इस पूरे संघीय ढांचे के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। यदि किसी राज्य में राष्ट्रपति के प्रति असम्मान का वातावरण बनता है, तो इसका संदेश केवल उस राज्य तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे देश में राजनीतिक संस्कृति पर असर डालता है और संघीय संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है। संघीय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है—सम्मान और संवाद। केंद्र और राज्य सरकारें भले ही अलग-अलग दलों की हों, लेकिन संवैधानिक पदों और संस्थाओं के प्रति सम्मान बनाये रखना सभी की जिम्मेदारी है।

ऐसा क्यों है पश्चिम बंगाल
राष्ट्रपति के साथ जो कुछ हुआ, वह पश्चिम बंगाल के राजनीतिक माहौल का परिचायक है। ह्यभद्रलोक के प्रदेशह्ण के माहौल को इतना तनावपूर्ण होने के कारणों का विश्लेषण किये बिना यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि यह राज्य और देश, दोनों के लिए खतरनाक है। इस तनाव ने देश के संविधान को कटघरे में खड़ा कर दिया है। संविधान में वर्णित संघीय शासन प्रणाली में राज्यों को इस किस्म के माहौल की कल्पना नहीं की गयी है। हालांकि यह बात भी सही है कि राज्य सरकार की स्वायत्तता की सीमा को परिभाषित नहीं किया गया है, फिर भी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार का देश के संवैधानिक प्रमुख के साथ इस व्यवहार को भी किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

पहले भी इस तरह की घटना हो चुकी है
राष्ट्रपति के साथ ऐसा व्यवहार पहली बार जरूर हुआ है, लेकिन यह पहली बार नहीं है, जब पश्चिम बंगाल की टीएमसी सरकार सीधे-सीधे केंद्र से टकरायी है। करीब सात साल पहले जब ममता सरकार की पुलिस ने सीबीआइ की टीम को कोलकाता के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर जाने से रोक दिया था, तभी केंद्र और राज्य सरकार के बीच की दूरी सामने आ गयी थी। फिर एक साल बाद भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह के हेलीकॉप्टर को जाधवपुर में उतरने की अनुमति नहीं दी गयी थी। 2021 के चुनाव से ठीक पहले दिसंबर में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को तलब किया, लेकिन राज्य सरकार ने उन दोनों को वहां नहीं जाने दिया। टकराव के वर्तमान माहौल की पटकथा पिछले कई सालों से लिखी जा रही थी। यह टकराव विकास या संविधान के हित के लिए नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से सियासी लाभ के लिए ही है।
यह भी हकीकत है कि टकराव की यह जमीन एकाएक तैयार नहीं हुई है। 2019 में लोकसभा चुनाव के बाद जब वामपंथियों और तृणमूल कांग्रेस के गढ़ में भाजपा ने अपना पैर तेजी से फैलाया, तब से ही राज्य एक अजीब किस्म के तनाव से गुजर रहा है। इस तनाव में एक तरफ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस है, तो दूसरी तरफ भाजपा। ममता बनर्जी ने एक जुझारू, कर्मठ और हमेशा जनता के मध्य रहने वाली नेता के तौर पर अपनी छवि गढ़ी है, लेकिन इसमें भी दो मत नहीं है कि जिद्दी और हठी स्वभाव के चलते कई मौकों पर उन्हें तानाशाह होते हुए भी देखा गया है। पिछले एक दशक के राजनीतिक सफर में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को पश्चिम बंगाल में एक कट्टर प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा सकता है और यही कारण है कि न तो तृणमूल भाजपा पर आरोप मढ़ने का कोई मौका गंवाना चाहती है और न ही भाजपा किसी मौके से चूकना चाहती है। आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला अब तो राष्ट्रपति के अपमान में बदल गया है।
आधुनिक बंगाल का इतिहास गवाह है कि राज्य में जब भी कोई चुनाव आता है, टकराव और हिंसा की राजनीति अचानक तेज हो जाती है। लेकिन चुनाव के बाद इस टकराव के खत्म होने की मिसालें भी इसी इतिहास में मौजूद हैं। इस सब में एक बात साफ है कि इस टकराव से भारतीय संघवाद की परिकल्पना को जबरदस्त नुकसान पहुंच रहा है। इसके अलावा यह स्थिति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अराजक स्थिति की तरफ भी ले जा रही है, क्योंकि राज्य और केंद्र के बीच रिश्ते हाल के दिनों में पहले से ही खराब चल रहे हैं और इसमें गिरावट से देश को ही नुकसान पहुंचेगा। यहां अटल बिहारी वाजपेयी का वह कथन याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था “सरकारें आएंगी जाएंगी, पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए, इसका लोकतंत्र अमर रहना चाहिए”

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