केंद्र पर उपेक्षा का आरोप लगाया कई राज्य की सरकारों ने, कोरोना संकट के दौर में बढ़ गयी है केंद्र सरकार की जिम्मेदारी
वैश्विक महामारी कोरोना के खिलाफ जंग में उतरे हिंदुस्तान की एकजुटता सोमवार 27 अप्रैल को उस समय बिखरती नजर आयी, जब देश के सबसे अधिक खनिज की आपूर्ति करनेवाले प्रदेश झारखंड के मुखिया हेमंत सोरेन ने अपनी पीड़ा जाहिर की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की वीडियो कांफ्रेंसिंग में अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिये जाने के बाद हेमंत सोरेन की यह पीड़ा सामने आयी। उन्होंने अपनी पीड़ा को सार्वजनिक तो किया ही, साथ ही प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र को भी जनता के सामने रख दिया, जिससे साफ होता है कि सवा तीन करोड़ की आबादी वाले इस प्रदेश के साथ सब कुछ ठीक नहीं है। कोरोना महामारी किसी एक राज्य या समाज की समस्या नहीं है, यह बात प्रधानमंत्री के एक्शन और नजरिये से साबित हो चुका है। फिर झारखंड समेत तमाम गैर-भाजपा शासित प्रदेशों को यह महसूस होना कि उनके साथ सब कुछ ठीक नहीं हो रहा है, भारत की संघीय शासन प्रणाली के लिए बड़ा खतरा है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने साफ कहा है कि झारखंड को केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करने की कीमत चुकानी पड़ रही है। यही बात कमोबेश दूसरे राज्य भी कह रहे हैं, जहां गैर-भाजपा सरकार है। इस परिस्थिति में केंद्र सरकार की जिम्मेवारी बड़ी हो जाती है, क्योंकि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में देश भर की एकजुटता बनाये रखने का पहला कर्तव्य उसका ही है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई की पृष्ठभूमि में हेमंत सोरेन की पीड़ा का विश्लेषण करती आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।
ब्रिटेन के प्रख्यात समाज वैज्ञानिक डॉ विलियम्सन क्लिंशेफ ने कहा है कि किसी भी सामाजिक समस्या को तब तक दूर नहीं किया जा सकता, जब तक उस समस्या से प्रभावित होनेवाला हरेक पक्ष समस्या से समान रूप से प्रभावित नहीं हो। दूसरे विश्वयुद्ध के संदर्भ में कही गयी उनकी यह बात आज भारत में सच साबित होती हुई नजर आ रही है। आज भारत वैश्विक महामारी कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है और इसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में है, जो एक साल पहले ऐतिहासिक जीत हासिल कर लगातार दूसरी बार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बने। इस लड़ाई में उनकी मदद के लिए देश के सभी प्रदेश हैं और वहां के मुख्यमंत्री सेना नायक की भूमिका में हैं। इसी ताकत और एकजुटता के बल पर पूरा देश एक महीने से अधिक समय से लॉकडाउन में है और कोरोना के खतरनाक वायरस को हराने के लिए दृढ़संकल्पित है। यह एकजुटता 27 अप्रैल को बिखरती नजर आयी, जब झारखंड समेत तमाम गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनकी बात नहीं सुने जाने का आरोप लगाया। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि कोरोना संकट को कम या अधिक प्रभाव में बांटा जाने लगा है और यही विभाजन देश को मुश्किल में डालने के लिए पर्याप्त साबित हो सकता है।
झारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के मुख्यमंत्रियों की यह पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 27 अप्रैल को हुई वीडियो कांफ्रेंसिंग में उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला। यदि कोई राज्य, विशेष रूप से जहां गैर-भाजपा सरकार है, ऐसी बात कहता है तो यह बेहद गंभीर है। दूसरे राज्यों की बात छोड़ भी दें, तो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री की वीडियो कांफ्रेंसिंग के बाद जिन शब्दों में अपना दर्द बयां किया, वह केवल यही साबित करता है कि कोरोना के खिलाफ जंग में अब राजनीति की भी इंट्री हो चुकी है। हेमंत सोरेन ने तो केवल अपनी पीड़ा व्यक्त की, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो सीधे-सीधे दोरंगा व्यवहार करने का आरोप लगा दिया। यहां तक कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो भाजपा के सहयोग से ही सरकार चला रहे हैं, ने भी केंद्र से एक ठोस दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया। कुछ दिन पहले उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक निर्णय से काफी दुखी नजर आये और साफ-साफ कहा कि ऐसा करने से लाकडाउन का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन तो खैर इस वीडियो कांफ्रेंसिंग से ही दूर रहे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पीड़ा को इसलिए भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि झारखंड में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल रहा है और यहां की स्वास्थ्य सेवाएं दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहद कमजोर हैं। एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कह चुके हैं कि उनके पास संसाधन इतने नहीं हैं कि वह अकेले इस जंग को जीत सकें। हेमंत की यह साफगोई केंद्र की जिम्मेवारी और बढ़ा देती है। आम तौर पर माना जाता है कि अपने कमजोर बच्चे पर मां अधिक ध्यान देती है। हेमंत सोरेन की पीड़ा यही है। झारखंड में कोरोना से लड़ने की हिम्मत है, ताकत है, लेकिन हथियारों की कमी है। इसलिए केंद्र को इस पर अधिक ध्यान देना ही चाहिए, जो हेमंत सोरेन कहना चाहते हैं।
हेमंत सोरेन की पीड़ा के बाद केंद्र की जिम्मेवारी बढ़ गयी है। भारत की संघीय व्यवस्था को बनाये रखने की पहली जिम्मेवारी उसकी ही है। उसे सभी राज्यों को यह भरोसा दिलाना होगा कि केंद्र सभी के प्रति समान रूप से जिम्मेवार है। खुद प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि कोई भी बीमारी जाति, धर्म या संप्रदाय देख कर नहीं आती, तो फिर उन्हें झारखंड जैसे राज्यों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी सेनापति की छवि ही मजबूत होगी। केंद्र सरकार के पास लड़ाई की कमान है और यदि कोई भी मोर्चा कमजोर हुआ, तो फिर उससे लड़ाई ही कमजोर होगी। अभी कोरोना के खिलाफ लड़ाई को राजनीतिक स्तर पर ले जाने का समय नहीं है। यह एक ऐसी लड़ाई है, जिसमें पूरे देश को अपनी भागीदारी निभानी है। केंद्र को अब झारखंड जैसे राज्यों को यह भरोसा देने के लिए आगे आना होगा कि वह इस लड़ाई में लगातार अग्रणी भूमिका में है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो कोरोना का संकट तो खैर टल जायेगा, लेकिन भारत की संघीय खूबसूरती पर हमेशा के लिए एक दाग लगा देगा, जो आनेवाले समय के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए अब समय आ गया है, जब केंद्र को अपने राजनीतिक विरोधियों द्वारा शासित प्रदेशों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि कोरोना के संकट को 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश से हमेशा के लिए दूर किया जा सके।