आजाद सिपाही संवाददाता
रांची। कोरोना सैंपल की जांच को लेकर रिम्स और रांची सिविल सर्जन की ओर से विरोधाभाषी बातों पर हाइकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जतायी है। कोर्ट ने मौखिक रूप से सवाल उठाया कि रिम्स का शपथ पत्र सही है या रांची सिविल सर्जन का? दोनों में से कोई तो गलत है, सही तथ्य कोर्ट के समक्ष रखा जाये अन्यथा किसी स्वतंत्र एजेंसी या सीबीआइ को जांच का आदेश दिया जा सकता है। हाइकोर्ट के समक्ष यह बात संज्ञान में आयी कि रविवार को हरमू स्थित शवदाह गृह में शवों को जलाने के ल्एि एंबुलेंसों की लाइन लगी थी, वहां की मशीनें खराब हो गयी थीं। इस पर कोर्ट ने मौखिक रूप से सरकार के अधिवक्ता से पूछा कि शवदाह गृह में शवों की लाइन लगी थी, वैसी स्थिति में रांची उपायुक्त क्या कर रहे थे? मशीनों को क्यों नहीं ठीक कराया गया।
कोर्ट ने कहा, मृत लोगों को भी शांति नहीं दे सके
कोर्ट ने मौखिक कहा कि मृत लोगों को शांति नहीं दे सके, यह किस प्रकार की स्थिति है? कोर्ट ने मामले में मंगलवार को रांची उपायुक्त, अपर नगर आयुक्त, रांची सिविल सर्जन सहित राज्य के स्वास्थ्य सचिव और रिम्स निदेशक को वर्चुअल तरीके से उपस्थित रहने का निर्देश दिया। हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ रवि रंजन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मौखिक कहा कि रिम्स की ओर से कहा जा रहा है कि उसके द्वारा कोरोना सैंपल लेने से कभी भी इंकार नहीं किया गया है। वहीं रांची सिविल सर्जन कहते हैं कि बैकलॉग के कारण रिम्स कोरोना सैंपल लेना नहीं चाहता है। कोर्ट को गुमराह करने पर सजा का प्रावधान है, इसे सभी को समझने की जरूरत है। खंडपीठ ने रांची सिविल सर्जन से मौखिक पूछा कि पांच अप्रैल को कितने कोरोना सैंपल जमा किये गये थे और कितने कोरोना सैंपल को जांच के लिए रिम्स या अन्य जगहों पर भेजा गया था। इस पर सिविल सर्जन ने बताया कि पांच अप्रैल को कोरोना जांच के लिए 1907 सैंपल लिये गये थे, जिसमें से जांच के लिए 604 सैंपल भेजा गया है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने रांची सिविल सर्जन से यह भी पूछा कि उनके आवास से जिन 73 कर्मियों का सैंपल लिया गया था, उसकी जांच रिपोर्ट का क्या हुआ। रांची सिविल सर्जन इन बातों का स्पष्ट जवाब नहीं दे रहे थे।
चीफ जस्टिस आवास की रिपोर्ट देर से तो आम आदमी का क्या हाल होगा
इस पर चीफ जस्टिस ने फटकार लगाते हुए कहा कि रांची सिविल सर्जन की अनदेखी के कारण उनके आवास के कर्मियों की कोरोना जांच की रिपोर्ट अब तक नहीं मिली है। जबकि कोरोना जांच के लिए उनका सैंपल पांच अप्रैल को ही लिया गया था। अब सिविल सर्जन बता रहे हैं कि नौ अप्रैल को उनके आवास के कर्मियों का सैंपल जांच के लिए भेजा गया। यह दुभार्ग्यपूर्ण स्थिति है। जब चीफ जस्टिस के आवास के कर्मियों की कोरोना जांच की यह स्थिति है, तो आम आदमी की कोरोना जांच की रिपोर्ट का क्या होगा? सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य सचिव और रिम्स निदेशक कोर्ट में वुर्चअल तरीके से उपस्थित थे। कोर्ट ने मामले में मंगलवार को रांची सिविल सर्जन को चार्ट वाइज शपथ पत्र देने को कहा है कि पांच अप्रैल के बाद से नौ अप्रैल तक कितने कोरोना जांच के सैंपल जमा किये गये और कितने को जांच के लिए भेजा गया। कोर्ट ने राज्य के स्वास्थ्य सचिव से मौखिक कहा कि राज्य में कोरोना के कारण हेल्थ इमरजेंसी की स्थिति है। रिम्स में जल्द से जल्द मेडिकल उपकरणों की खरीदारी सहित कर्मियों की कमी दूर करनी होगी, जिससे कारोना से लड़ा जा सके। साथ ही रांची सहित राज्य के सभी जिलों में कोरोना मरीजों के लिए पर्याप्त बेड की व्यवस्था सुनिश्चित की जाये।

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