आजाद सिपाही संवाददाता
गुमला। कुपोषण के दौर में विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गुमला के उपायुक्त सुशांत गौरव इस बात को भली-भांति समझते हैं। तभी तो उनकी पहल से जिले को कुपोषण मुक्त बनाने की दिशा में कई प्रयास किये जा रहे हैं। इस कारण आज गुमला जिला कुपोषण मुक्त जिला बनने की दिशा में अग्रसर है। जिले में एनीमिया मुक्त अभियान, समर अभियान, पोषण माह, कुपोषण मुक्त अभियान आदि जैसे विभिन्न अभियानों का सफलतापूर्वक संचालन करते हुए कुपोषण के खिलाफ कई नवाचारी उपाय किये जा रहे हैं।
इन सभी अभियानों में जन भागीदारी एवं अधिक संख्या में लोगों को जागरूक करना सबसे महत्वपूर्ण है। इन सभी अभियानों का एकमात्र उद्देश्य कुपोषण के दंश से जिले को मुक्त करना है। इसलिए सबसे पहले जिले भर के कुपोषित (मैम) एवं अति कुपोषित (सैम) बच्चों को चिन्हित किया गया। इसके लिए आंगनवाड़ी सहिया, एएनएम आदि द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों, विद्यालयों तथा घर-घर जाकर युद्ध स्तर पर अभियान चलाते हुए बच्चों की लंबाई, वजन और हीमोग्लोबीन की माप करते हुए चिन्हित सैम बच्चों को एमटीसी सेंटर में भर्ती किया गया। वहां बच्चों की देखरेख की गयी। इसमें मुख्य रूप से बच्चों को दवाई के अलावा उन्हें पौष्टिक आहार दिया गया। जिले के 497 अति कुपोषित बच्चों में से अब तक 427 पूर्ण रूप से कुपोषण मुक्त हो चुके हैं। वहीं मैम बच्चों के परिवार के सदस्यों को पोषण आहार के विषय में जानकारी दी गयी। सभी सैम-मैम बच्चों के लिए जिला प्रशासन की ओर से नयी पहल करते हुए वृद्धि निगरानी चार्ट बनाया गया। इसके माध्यम से बच्चों की प्रति माह में हुई ग्रोथ पर नजर रखी गयी। इसके अलावा उपायुक्त सुशांत गौरव के निर्देशानुसार सभी सैम-मैम बच्चों के परिवार जनों को सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से प्राथमिकता देते हुए जोड़ा गया एवं उन सभी योजनाओं से लाभान्वित कर उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में सहायता की गयी। इसके अलावा उपायुक्त के निर्देशानुसार प्रत्येक सप्ताह सभी पंचायतों में वीएचएसएनडी (ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस) का आयोजन करते हुए लोगों को पोषण आहार के संबंध में लगातार जागरूक भी किया जा रहा है।
जिले में हुई 52 प्रकार के साग की खोज

जिला समाज कल्याण विभाग द्वारा एक पहल करते हुए जिले में उत्पादित होने वाले 52 प्रकार के पौष्टिक साग की खोज की गयी। स्थानीय क्षेत्र में उगने वाली साग-सब्जी का सेवन कुपोषण के खिलाफ एक बेहतर भूमिका निभाती है। जिले में 52 प्रकार में साग उगते हैं, जिसके सेवन से सभी कुपोषण मुक्त हो सकते हैं। इसमें कोई अधिक खर्च भी नहीं है।

रागी लड्डू जिले की महत्वपूर्ण पहल
उपायुक्त के निर्देशानुसार जिले में मोटे अनाज के उत्पादन को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत इस वर्ष रागी का उत्पादन जिले में सबसे अधिक किया गया। कैल्शियम और आयरन से भरपूर रागी बच्चों की वृद्धि और विकास के लिए बहुत उपयोगी है। हीमोग्लोबीन के स्तर को बढ़ाने के लिए एनिमिया से पीड़ित लोगों के लिए इसकी सिफारिश की जाती है।
जिला प्रशासन द्वारा ‘जोहार रागी’ कार्यक्रम के माध्यम से जिले के विभिन्न क्षेत्रों में बहुतायत से उपजने वाले रागी के संवर्धन का निर्णय लिया गया है। लगभग पांच हजार कृषक परिवरों के बीच रागी के बीज वितरित किये गये एवं उन्हें तीन स्तरों पर प्रशिक्षित किया गया। परिणाम स्वरूप पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक (270%) रागी का उत्पादन संभव हुआ। रागी की इस उपज की मार्केटिंग के लिए जेएसएलपीएस की सखी मंडल दीदी समूह को प्रशिक्षण दिया गया एवं उपायुक्त द्वारा जरूरी उपकरण, यंत्र एवं स्थल उपलब्ध कराया गया। अब सखी मंडल की दीदियां विगित रागी आटा से लड्डु एवं रागी से निर्मित अन्य खाद्य पदार्थ तैयार कर रही हैं। दीदी मंडल द्वारा तैयार किये गये रागी लड्डूओं को कुपोषित बच्चों व एनिमिक महिलाओं के बीच वितरण प्रारंभ कर दिया गया है। इन्हें प्रशिक्षित एएनएम, सेविका , सहिया की निगरानी में लड्डुओं को खिलाया जा रहा है।
जिले में कुपोषण एवं एनिमिया के स्तर में आया सुधार
जिले में कुपोषण के पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले चक्र को तोड़ने में मदद हेतु केंद्र एवं राज्य की ओर से अनेक योजनाएं संचालित हैं। विशेषकर आइसीडीएस सेवाएं एनआरएचएम कार्यक्रम, पोषण अभियान, एनिमिया मुक्त भारत, खाद्य पदार्थों में अतिरिक्त पोषक तत्व (फोर्टिफिकेशन) की उपलब्धता, स्वच्छता अभियान, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता शामिल है। इसके परिणामस्वरूप जिले में कुपोषण एवं एनिमिया के स्तर में सुधार के सकारात्मक परिणाम सामने आये है।
एनएफएचएस-5 के आंकड़े बताते हैं कि एनएफएचएस-4 के आकड़ों की तुलना में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के कुपोषण स्तर में 8.4% स्टटिंग (ठिगनापन) की दर में छह फीसदी एवं बेस्टिंग (ऊंचाई के अनुसार वजन) दर में सात फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है। परंतु कुपोषण मुक्त गुमला की मंजिल तक पहुंचने के लिए अभी भी संभावनाओं के अनेक द्वार खुले हैं और अभी भी कवायद जारी है।

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