महेश दर्पण: कोई किताब अपनी भाषा से हिंदी में आने में कितना वक्त ले सकती है, इसका अनुमान लगाना आसान काम नहीं है। ऐसी बहुतेरी किताबें होंगी जो अब भी इस भाषा में अनुवाद की बाट जोह रही होंगी, लेकिन जिस किताब की बात यहां की जा रही है, उसका हिंदी में आने का इंतजार अब खत्म हो चुका है। 1891 में प्रकाशित यह किताब है, लॉर्ड आर्थर सेविलेज क्राइम एंड अदर स्टोरीज। अंग्रेजी में प्रकाशित इस किताब में आॅस्कर वाइल्ड की अनेक विश्वप्रसिद्ध कहानियां हैं। कायदे से देखा जाये तो यह वर्ष इस संग्रह के प्रकाशन का 125वां वर्ष है। हाल ही में जब मैंने इसका अनुवाद करोड़पति भिखारी के नाम से पढ़ा तो तबीयत खुश हो गयी।
बलराम अग्रवाल ने बड़ी चलती जबान में अनुवाद करके एक बड़े कथाकार की रचनाओं को हिंदी के पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। इन्हें पढ़कर इनके रचनाकार की यह बात एकदम सही लगती है कि मैं कहानियों के सिवा और कुछ सोच ही नहीं सकता। यही वजह है कि आॅस्कर वाइल्ड का यह मिजाज ही बन गया था कि वे हर वक्त अपनी कहानी की दुनिया में रमे रहते और कभी लिखते हुए तो कभी उस पर सोचते हुए उसका आनंद लेते रहते थे। जीवन का उनका अनुभव बड़ा बीहड़ था।
शायद इसलिए उनकी कहानियां अजब सम्मोहन लिए रहती हैं। ऐसा न होता तो उनकी कहानियों पर आधारित फिल्में इतनी लोकप्रिय न हुई होतीं। यह ठीक है कि आॅस्कर वाइल्ड ने अपनी कैंटरविले का भूत सरीखी कहानी में अग्रेजों के अंधविश्वास पर निशाना साधा है, लेकिन कुछ कहानियों के प्लॉट ऐसे भी हैं जो हैरान करते हैं। जैसे लॉर्ड आर्थर सैविले का अपराध। यह धनाढ्य वर्ग के एक नौजवान की कहानी है। उसे एक भविष्यवक्ता बता देता है कि उसके हाथों किसी की हत्या होने वाली है।
यह बात उसके जेहन में इस कदर बैठ जाती है कि वह चाहता है कि अपनी शादी से पहले ही यह काम कर डाले ताकि उसके अपराध में पत्नी के प्रति विश्वासघात शामिल न हो। उसके इस कन्फ्लिक्ट से यह कहानी खासी दिलचस्प बन गयी है। वैसे कहानी तो उनकी जिंदगी की भी कम दिलचस्प नहीं थी। उन पर मुकदमा चला, उनकी खूब आलोचना हुई और जेल भी भेजा गया।
आखिरी वक्त में उन्होंने कहा- मैं मर रहा हूं, लेकिन उपलब्ध साधनों के मुकाबले काफी जी लिया।