धर्म, जाति और प्रांत की तमाम दीवारों को तोड़ कर भारत के 130 करोड़ लोगों तक किसी न किसी रूप में आज केवल एक शख्स पहुंच रहा है और उसका नाम है बाबा रामदेव। मूल रूप से हरियाणा के रहनेवाले बाबा रामदेव इन दिनों एक गहरे विवाद में फंस गये हैं। हालांकि विवादों से उनका पुराना नाता रहा है। इसमें नया कुछ है, तो बस इतना ही है कि बाबा रामदेव क्या हैं, इस सवाल का जवाब आज हर भारतीय पूछ रहा है। योग गुरु के रूप में दुनिया भर में भारत का नाम रोशन करनेवाले इस शख्स ने पतंजलि योग पीठ स्थापित की, तो आयुर्वेदाचार्य बन गया। यह पीठ बाद में कंपनी बन गयी, जो दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़नेवाली कंपनी बन गयी। बाबा रामदेव इसके प्रमुख के रूप में एक सफल उद्योगपति बन गये और उनकी कंपनी देखते-देखते महज 15 साल में 33 हजार करोड़ रुपये की बन गयी। आज इस कंपनी में जींस से लेकर नमक और दवा से लेकर मसाले-आटा और शहद तक बनता है। इसके बाद बाबा रामदेव एक राजनेता की तरह बयान देने लगे और अन्ना हजारे की राह पर चलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता की तरह धरने पर बैठ गये। गिरफ्तारी के भय से महिलाओं के कपड़े पहन कर वहां से भागे। कभी अर्थशास्त्री बन कर वह देश की अर्थव्यवस्था सुधारने का उपाय सुझाने लगे। कोरोना महामारी को भी उन्होंने खूब भुनाया और अपनी दवा इस दावे के साथ लांच कर दी कि यह इस संक्रमण को ठीक करने में शत-प्रतिशत कारगर है। इसी महामारी में वह डॉक्टरों पर व्यंग्य कसने के बाद विवादों में फंसे हैं। बाबा रामदेव क्या हैं, यह शायद खुद उन्हें भी पता नहीं है। भारत के इस सर्वाधिक विवादित शख्सियत के बारे में आजाद सिपाही के टीकाकार राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।

कुछ साल पहले की बात है। प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार डैनियल जे बरस्टिन भारत यात्रा से लौट कर एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जिसे कोई ईश्वरीय शक्ति चला रही है। उनके इस कथन पर बहुत विवाद हुआ था, हालांकि उनका आशय दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का मजाक उड़ाना कतई नहीं था। बैरस्टिन ने कहा था कि भारत के लोग किसी भी चीज पर आसानी से भरोसा नहीं करते और एक बार भरोसा बन जाये, तो वे उसे ताउम्र निभाते हैं। उनका यह गंभीर दृष्टिकोण यदि बाबा रामदेव के संदर्भ में शत-प्रतिशत सही प्रतीत होता है।

बाबा रामदेव भारत में एक अजूबे की तरह उभरे। हरियाणा के महेंद्रगढ़ में 1965 में रामनिवास यादव के घर पैदा हुए रामकृष्ण यादव कब योग गुरु बाबा रामदेव बन गये, किसी को पता भी नहीं चला। भारतीय योग परंपरा को दुनिया के नक्शे पर स्थापित करनेवाले इस बाबा ने योग के बाद आयुर्वेद में हाथ आजमाया और महज 50 करोड़ रुपये के व्यक्तिगत कर्ज से शुरू की गयी पतंजलि योगपीठ 16 साल बाद 40 हजार करोड़ रुपये की कंपनी बन गयी, जहां हर बीमारी की दवा के साथ मसाले, आटा, घी, शक्कर और रोजमर्रा के करीब पांच हजार उत्पाद बनते और बेचे जाते हैं। इस कंपनी का कोई न कोई उत्पाद आज भारत के हर घर में इस्तेमाल किया जा रहा है। देश का ऐसा कोई गांव नहीं है, जहां इस कंपनी के उत्पाद नहीं मिलते हैं। पतंजलि की इस विकास यात्रा ने बाबा रामदेव को दुनिया के टॉप उद्योगपतियों की कतार में खड़ा कर दिया।

भारत में माना जाता है कि जिस व्यक्ति के पास पैसा होता है, वह सब कुछ का ज्ञाता बन जाता है। बाबा रामदेव भी खुद को सर्वज्ञाता समझने लगे। योग और आयुर्वेद जैसी भारत की प्राचीन परंपरा की चहारदीवारी से निकल कर वह समाजसेवा के क्षेत्र में भी आ गये और देश भर में घूम-घूम कर अपने अभियान को मजबूत करते रहे। एक समय ऐसा भी आया, जब वह काले धन की जानकारी रखनेवाले देश की सबसे बड़ी हस्ती बन गये। इसके बाद उन्होंने गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन की तर्ज पर कई दिनों तक दिल्ली के रामलीला मैदान में धरना दिया। इस दौरान वहां बाबा के समर्थकों की भारी भीड़ जमा हो गयी और कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन गया। पुलिस ने धरना को खत्म कराने की आक्रामक कोशिश की, लाठीचार्ज कर दिया,तो बाबा रामदेव महिलाओं के कपड़े पहन कर वहां से भाग निकले।

लेकिन इस घटना से भी बाबा रामदेव की हनक कम नहीं हुई। वह राजनीतिक शख्स बन गये और खुल कर इसकी बात करने लगे। इस दौरान वह टीवी पर भी दिखते और हर मुद्दे पर अपनी राय रखते। नंगे बदन, कभी एंकरों के साथ कुश्ती लड़ते, तो कभी मंच पर लेट कर अपनी बात कहते। उन्हें यह आभास हो गया कि भारत में उनसे बड़ा संन्यासी न पहले कभी हुआ है और न कभी होगा। इस घमंड से वह गंभीर विवादों में फंसने लगे। लेकिन उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आयी। लोग अनुलोम-विलोम, कपाल भाती और अन्य योग क्रियाओं को अपनी दिनचर्या में शामिल कर चुके थे, तो पतंजलि के उत्पाद का इस्तेमाल जरूरी नहीं, तो जरूरत बन चुके थे।

पिछले साल जब कोरोना ने देश को अपने शिकंजे में लिया, बाबा रामदेव की कंपनी ने एक दवा बनायी और दावा किया कि भारतीय औषधि नियंत्रक के साथ डब्ल्यूएचओ ने इसे कोरोना ठीक करनेवाली दवा के रूप में मान्यता दी है। हालांकि इसका सच्चाई जल्दी उजागर हो गयी, लेकिन बाबा रामदेव पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब बाबा रामदेव ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को निशाने पर लिया है। उन्होंने एलोपैथी को ‘मूर्खतापूर्ण विज्ञान’ बताया और कहा कि एलोपैथी दवाएं लेने के बाद लाखों की संख्या में मरीजों की मौत हुई है। फिर उन्होंने एक युवक से हुई बातचीत का हवाला देते हुए डॉक्टर को ‘टर…टर…’ कहते हुए तंज कसा। बात बिगड़ गयी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने बयान पर कड़ा रुख अख्तियार किया, तो उन्होंने लिखित माफी मांग ली।

यहां बड़ा सवाल यह है कि 21वीं सदी के भारत में बाबा रामदेव जैसा शख्स हर विषय और मुद्दे पर खुद को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए अपना सिक्का चला रहा है और कोई ताकत इसका विरोध नहीं कर रही है, तो यह शक्ति बाबा ने कहां से हासिल की। आखिर कैसे एक व्यक्ति दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में बार-बार विवादित बयान देकर सीना ताने चल रहा है। इन सवालों का जवाब भी भारत के लोग ही पूछ रहे हैं।

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