कोरोना को हराना है : हम क्यों नहीं समझ रहे कि कोरोना हमसे ही फैलता है, सरकार से नहीं

कोरोना की दूसरी लहर ने झारखंड समेत पूरे देश में कहर बरपा रखा है और देश का कम से कम आधा हिस्सा इस समय आंशिक लॉकडाउन झेल रहा है। झारखंड में भी पिछले 25 दिन से स्वास्थ्य सुरक्षा सप्ताह के तहत प्रतिबंध आदेश लागू हैं। राज्य सरकार ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि 16 मई से प्रतिबंधों को लागू कराने के लिए सख्ती बरती जायेगी। कोरोना की चेन तोड़ने के लिए अब यही एकमात्र विकल्प रह गया था, लेकिन लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं। राज्य सरकार ने आपात स्थिति में घर से बाहर निकलने की अनुमति देने के लिए पास जारी करने की व्यवस्था की है, जिसे लोगों ने इतने हल्के में लिया है कि महज 24 घंटे में राज्य में करीब सवा लाख पास गाड़ियों के लिए निर्गत करने पड़े। इतने अधिक लोगों ने पास का आवेदन करने की कोशिश की कि इसके लिए बनाया गया पोर्टल ही क्रैश कर गया। इसमें संदेश नहीं कि इनमें से अधिकांश जरूरी काम के लिए पास बनवा रहे हैं, लेकिन कुछ लोग लॉकडाउन-लॉकडाउन खेलने के लिए पास बनवा रहे हैं। वहीं कुछ लोग यह चेक करने के लिए साइट पर लोड कर रहे हैं कि देखें कैसे बनता है। यहां लोगों को समझना होगा कि कोरोना की चेन तोड़ने का जिम्मा सरकार पर कम, लोगों पर अधिक है, क्योंकि संक्रमण लोगों से फैलता है। हम सभी जानते हैं कि कोरोना का खतरा हमारे सामने पहले से कहीं अधिक विकराल रूप में मौजूद है और यदि घोषित रियायतों का बेजा इस्तेमाल किया गया, तो इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। इसलिए इन पाबंदियों को मानना लोगों का ही काम है। झारखंड में शुरू हुए इस नये खेल के संभावित खतरों को रेखांकित करती आजाद सिपाही के टीकाकार राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।

झारखंड सरकार ने स्वास्थ्य सुरक्षा सप्ताह के तहत पाबंदियों को सख्ती से लागू करने के लिए कमर कस ली है, तो दूसरी तरफ कई लोग ऐसे हैं, जो इन पाबंदियों को नहीं मानने में अपनी बहादुरी या चतुराई समझ रहे हैं। सरकार ने पाबंदी के दौरान बेहद जरूरी कामों के लिए वाहन पास जारी करने की सुविधा दी, तो राज्य भर में इतने अधिक लोगों ने इसके लिए आवेदन कर दिया कि पूरा पोर्टल ही क्रैश कर गया। पास जारी करने की प्रक्रिया शुरू होने के 24 घंटे के भीतर ही करीब सवा लाख पास जारी कर दिये गये। लोगों की यह मानसिकता दिखाती है कि कोरोना के खिलाफ जंग में हम कितने लापरवाह और गैर-जिम्मेदार हैं। क्या यह माना जा सकता है कि झारखंड में एक साथ सवा लाख लोगों को इतना जरूरी काम पड़ गया है कि उन्हें संक्रमण के बढ़ते खतरे के बीच घर से बाहर निकलना पड़ रहा है। इसका उत्तर नकारात्मक है, लेकिन झारखंड के लोग पास की सुविधा का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं, यह बात उन्हें समझनी होगी।
मानव सभ्यता के विकास के इतिहास पर चर्चित किताब ‘बाइ सेपियंस- ए ब्रीफ हिस्ट्री आॅफ ह्यूमन काइंड’ के लेखक युवाल नोआह हरारी ने पिछले दिनों कोरोना पर लिखे लेख में कहा कि कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए दुनिया भर के लोग और सरकारें जो रास्ता चुनेंगी, वह आनेवाले सालों में हमारी दुनिया को बदल देगा। उन्होंने इस महामारी के बाद उभरनेवाले समाज और देश, समुदाय तथा समाज के बीच के आपस के संबंध का भी चित्रण किया। उन्होंने लिखा है कि यह संकट कुछ बड़े फैसले लेने के लिए लोगों और सरकारों को मजबूर कर रहा है। ये फैसले भी तेजी से लेने होंगे, हालांकि हमारे पास सीमित विकल्प भी मौजूद हैं। हरारी ने कहा कि लोगों को कोरोना संकट के दौरान सीखी हुई बातों को अपने जीवन में उतारना होगा, क्योंकि अब उनके पास बहुत अधिक समय नहीं है।
हरारी का यह लेख झारखंड के लोगों को पढ़ना और समझना जरूरी है। उन्हें समझना होगा कि संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए हर व्यक्ति को अपना संयम दिखाना होगा। यह सोचना कि कोई संक्रमण की चपेट में नहीं आयेगा, पूरी तरह गलत है। कोरोना की दूसरी लहर ने कितने ऐसे लोगों को लील लिया है, इसकी लिस्ट बहुत लंबी है। इसलिए पाबंदियों में मिली छूट का बेजा इस्तेमाल हमारे लिए ही भारी पड़ सकता है। यह सही है कि कोराना के कोहराम के बीच घर पर बैठे हम सब हालात के आगे नतमस्तक हैं। हम एक बार फिर यह मानने के लिए बाध्य हो गये हैं कि समय से शक्तिशाली कुछ भी नहीं। लेकिन साथ ही हमें यह भी सोचना है कि संक्रमण से हम खुद और परिवार के साथ समाज को कैसे बचा सकते हैं। लोगों को समझना होगा कि कोरोना संक्रमण लोगों से ही फैलता है, सरकार से नहीं और इसे रोकने की जिम्मेवारी भी लोगों पर ही है, सरकार पर नहीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार द्वारा दी गयी छूट हमारी सुविधा के लिए है और इसका दुरुपयोग करने पर खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। कोरोना से हुए नुकसान पर अब पछताने से कोई लाभ नहीं है। हम यह बात जितनी जल्दी समझ लेंगे, उतना ही सुरक्षित रह सकेंगे। हमारा सामाजिक जीवन नये अंदाज में ढल चुका है। यह नया स्वरूप तब तक जारी रहेगा, जब तक कोरोना का कारगर इलाज नहीं खोज लिया जाता है। कोरोना संकट शुरू होने के बाद से लगातार यह बात कही जा रही है कि जब तक लोग खुद जागरूक नहीं होंगे, उन्हें स्वस्थ-तंदुरुस्त रखना संभव नहीं है। हमें यह समझना होगा कि स्वास्थ्य हमारी निजी धरोहर है और कोई भी सरकार या प्रशासन इसकी रक्षा के उपाय कर सकती है, उन उपायों को अपनाना हमें ही होगा।

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