राज्य के सरकारी और निजी उद्यमों को आगे आना होगा
वैश्विक महामारी कोरोना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। सवा दो महीने के लॉकडाउन के बाद 10 दिन पहले शुरू हुईं आर्थिक गतिविधियों का राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक असर देखने को नहीं मिल रहा है। राज्य सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद खजाने की सेहत सुधर नहीं रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव लगातार कह रहे हैं कि राज्य की माली हालत बिल्कुल ठीक नहीं है और यही हालत रही, तो आगे का रास्ता अधिक कठिन होगा। 12 से 15 लाख प्रवासी मजदूरों को काम देना और इसके साथ राज्य के विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाना गंभीर चुनौती है। इस स्थिति में झारखंड को बचाने के लिए अब युद्धस्तर पर अभियान चलाने की जरूरत है। इस अभियान में सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका यहां के उद्योगों की हो सकती है। राज्य सरकार के कड़े और अलोकप्रिय फैसले से स्थिति में सुधार संभव नहीं है, लेकिन यदि झारखंड में काम कर रहे सरकारी और निजी उद्योग प्रदेश को बचाने के लिए ठोस और नियमित मदद करें, तो राज्य की माली हालत बहुत हद तक सुधर सकती है। इन उद्योगों को अब यह समझना होगा कि स्थिति विकट है और वे तब तक ही यहां काम कर सकते हैं, जब तक राज्य की माली हालत ठीक रहेगी। झारखंड को मदद की दरकार है और यहां के उद्योगों को अगले कुछ साल तक लाभ-हानि से ऊपर उठ कर सोचना होगा। इसी मुद्दे को रेखांकित करती आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।
झारखंड बहुत बुरी हालत में है। सरकार का खजाना खाली है और आमदनी के स्रोत कोरोना संकट के कारण लगभग सूख गये हैं। राज्य को चलाने के लिए जो न्यूनतम जरूरतें हैं, उन्हें जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। लॉकडाउन के कारण सवा दो महीने तक ठप पड़ीं आर्थिक गतिविधियां हालांकि दोबारा शुरू हुई हैं, लेकिन इनसे बहुत अधिक अंतर नहीं दिख रहा है। पांच महीने पहले सत्ता में आयी हेमंत सोरेन सरकार शुरू से ही कह रही है कि राज्य की माली हालत बेहद गंभीर है। कोरोना संकट ने इसे और गंभीर बना दिया है। सरकार पूरी ताकत से इसे सुधारने में लगी हुई है, लेकिन भविष्य की तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि झारखंड को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य के वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव संकेत दे रहे हैं कि हालत सुधारने के लिए कुछ कड़े और अलोकप्रिय फैसले लिये जा सकते हैं। राज्य सरकार ने कुछ कठोर फैसले लिये भी हैं। लेकिन इन फैसलों का सामाजिक और राजनीतिक समरसता पर केवल विपरीत असर ही पड़ेगा। इनसे दूसरी तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जैसे महिलाओं के लिए एक रुपये में संपत्ति की रजिस्ट्री का प्रावधान खत्म करने पर हुआ। किसी ने इस फैसले के पीछे के कारणों पर ध्यान नहीं दिया और केवल सरकार की आलोचना की गयी। इसी तरह पेट्रोल-डीजल पर दी गयी छूट को वापस लेने का अलोकप्रिय फैसला राज्य सरकार को लेना पड़ा। इन फैसलों के पीछे के कारणों की यदि विवेचना की जाये, तो राज्यहित में इन्हें बेहद महत्वपूर्ण कहा जायेगा। लेकिन इन्हें राजनीतिक चश्मे से देखा गया और आलोचना हुई। दूसरी बड़ी बात यह है कि इन फैसलों से राज्य के खजाने की स्थिति भी बहुत अधिक नहीं सुधरी। सरकार को जिस मात्रा में बदनामी मिली, उस मात्रा में आर्थिक लाभ नहीं हुआ। ऐसे में अब राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि झारखंड को इस संकट से बाहर कैसे निकाला जाये। कोरोना संकट में सामाजिक मोर्चे पर हेमंत सरकार की पहल की सराहना हर तरफ हो रही है। घर लौटे प्रवासी मजदूरों को काम देने के लिए भी बहुत सारे प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन ये पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं। इसलिए अब झारखंड को अपने यहां चल रहे उद्योगों से ठोस मदद की दरकार है। खनिज संपदा से भरे-पूरे इस राज्य में सरकारी और निजी क्षेत्र के उद्योगों की भरमार है और सामान्य स्थितियों में ये पर्याप्त मुनाफा भी कमाते हैं। झारखंड को बचाने के लिए अब इन उद्योगों को आगे आने का समय आ गया है। कोरोना संकट के दौर में इन उद्योगों ने बहुत शानदार काम किया और राहत सामग्री के वितरण में दिल खोल कर योगदान दिया। लेकिन इन्हें समझना होगा कि इतने भर से काम नहीं चलनेवाला।
छोटे, सूक्ष्म और मंझोले उद्योगों की हालत खराब है, इस बात से किसी को इनकार नहीं है, लेकिन बड़े उद्योगों को तो आगे आना ही होगा। ये उद्योग राज्य के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे इस प्रदेश को दोबारा पटरी पर लाने के काम में अपना सक्रिय योगदान दें। लॉकडाउन के दौरान पीपीइ किट, खाद्य सामग्री या भोजन का पैकेट बांटने में इन उद्योगों ने भारी-भरकम रकम खर्च की है, लेकिन अब इन्हें अपने मुनाफे का बड़ा हिस्सा अगले कुछ साल तक राज्य को देना होगा। राज्य सरकार को इस उपाय पर तत्काल विचार करना चाहिए, क्योंकि अब तक किसी भी राज्य ने अपने पास उपलब्ध इस विकल्प की ओर ध्यान नहीं दिया है।
हेमंत सोरेन सरकार के बारे में अब यह पक्की धारणा बन गयी है कि वह आनेवाले संकट की आहट बहुत पहले सुन लेती है और इससे निपटने के लिए खुद को तैयार कर लेती है। राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए उसे उद्योगों के ठोस मदद लेने के लिए रणनीति तैयार करने का वक्त आ गया है। अभी अवसर भी है और राज्य की जरूरत भी। इसलिए सरकार यदि इन उद्योगों से बातचीत शुरू करे, तो स्थिति में सुधार का रास्ता निकल सकता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि आखिर इन उद्योगों की भी राज्य के प्रति कोई जिम्मेदारी बनती है। उन्हें नफा-नुकसान से ऊपर उठ कर झारखंड को बचाने के लिए मदद के अपने लंबे हाथ बढ़ाने चाहिए, ताकि राज्य की सवा तीन करोड़ जनता का जनजीवन दोबारा पटरी पर लौट सके और विकास की उसकी आकांक्षा को नये पंख मिल सकें। ऐसा करने से पूरी दुनिया में झारखंड का नाम होगा और राज्य एक बार फिर सुखी, निरापद और समृद्ध भविष्य की राह पर मजबूती से कदम बढ़ा सकेगा।