- जब भीड़ को नियंत्रित करने की कूबत नहीं थी, तो क्यों निकाला जुलूस
- दो लोगों की मौत और एक दर्जन घायलों की जिम्मेदारी कौन लेगा
- उपद्रव के समय कहां थे रांची को शांति का पैगाम देनेवाले
शुक्रवार को देखते ही देखते हंसती-खेलती रांची तनाव के आगोश में डूब गयी। दिन के ढाई बजे तक सब कुछ शांत था। बाजार में चहल-पहल थी, सड़कों पर ट्रैफिक सामान्य थी। किसी को यह भान भी नहीं था कि ढाई बजे के बाद यहां कुछ हो भी सकता है। अचानक एकरा मसजिद में नमाज पढ़ने के बाद लगभग छह सौ की संख्या में लोग सड़क पर उतरे और नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ने लगे। यह भीड़ नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग कर रही थी। भाजपा की प्रवक्ता रहते हुए नूपुर शर्मा ने पैगंबर मोहम्मद साहब के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी की थी। जब देश ही नहीं, विदेश में भी उसका पुरजोर विरोध हुआ, तो भाजपा आलाकमान ने नूपुर शर्मा को पार्टी से छह साल के लिए निलंबित कर दिया। उनके साथ नवीन जिंदल को भी निष्कासित किया गया। उन्होंने भी अपनी गलती के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली। नूपुर शर्मा के निलंबन के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि अब यह विवाद थम जायेगा। लेकिन एक सप्ताह बाद फिर जुÞमे की नमाज के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। उसी क्रम में रांची में भी डेली मार्केट की मुसलिम दुकानें बंद कर दी गयी थीं और नमाज के बाद सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनायी गयी। एक दिन पहले यानी गुरुवार को कुछ धार्मिक लोगों और संगठनों की बैठक हुई और यह तय हुआ कि शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन जुलूस निकाला जायेगा। पुतला जलाने की भी योजना थी। जब रांची जिला प्रशासन ने उनसे आग्रह किया कि ऐसा नहीं किया जाये, तो प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लोग यही विश्वास दिलाते रहे कि जुलूस शांतिपूर्वक निकलेगा और कहीं कोई हंगामा नहीं होगा। पुलिस ने उनकी बातों पर विश्वास कर लिया। यही कारण था कि जब शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद धार्मिक नारा लगाते हुए भीड़ मेन रोड की तरफ बढ़ी तो उस समय गिनती की पुलिस सड़कों पर थी। वह भी सामान्य स्थिति में। लेकिन जैसे-जैसे भीड़ मेन रोड की तरफ बढ़ने लगी, जुलूस में शामिल होनेवालों की संख्या में अचानक इजाफा हो गया और फिर नारेबाजी में भी आक्रामकता सुनाई पड़ने लगी। डेली मार्केट आते-आते जुलूस में शामिल कुछ उपद्रवियों ने कमान अपने हाथ में ले ली और अचानक वे भीड़ से निकल कर सामने आ गये। उन्होंने पुलिस पर ही पत्थरबाजी शुरू कर दी। दरअसल, पुलिस उन्हें आगे बढ़ने से मना कर रही थी, क्योंकि कुछ ही दूरी पर मेन रोड में हनुमान मंदिर था। पुलिस यह अच्छी तरह जानती थी कि अगर मंदिर पर पत्थरबाजी हो गयी, तो फिर रांची की स्थिति बेकाबू हो जायेगी। इसीलिए पुलिस ने भीड़ को आगे बढ़ने से रोकना चाहा। फिर क्या था, पता नहीं कहां से भीड़ में शामिल उपद्रवियों के पास पत्थर आ गये और उन्होंने पुलिस को निशाना बना कर पत्थर बरसाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कुछ पुलिसकर्मी लहूलुहान हो गये। उन्होंने तुरंत पुलिस मुख्यालय और एसएसपी से संपर्क साधा और अतिरिक्त पुलिस बल भेजने का अनुरोध किया। इस क्रम में आधा घंटे लग गये और उपद्रवी थे कि अनियंत्रित हो गये थे। उन लोगों ने सड़कों पर जो भी ठेले, खोमचे मिले, उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया। सड़कों पर निकले वाहनों को भी उन्होंने निशाना बनाया। महावीर मंदिर के पुजारी को भी उन लोगों ने पीटा और चर्च रोड में काली मंदिर के आसपास अवस्थित दुकानों में लूटपाट शुरू कर दी। दुकानों से प्रसाद निकाल पर सड़कों पर बिखेर दिया। कुछ ठेले और खोमचे में आग भी लगा दी गयी। इस क्रम में सड़क पर जो भी मिला, वह चाहे मीडियाकर्मी ही क्यों न हो, उपद्रवियों ने उन्हें अपना निशाना बनाया।
उपद्रवियों ने मंत्री और विधायक को भी नहीं बख्शा
शुक्रवार को रांची मेन रोड में भीड़ में शामिल उपद्रवियों ने चुन-चुन कर लोगों को निशाना बनाया। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग या फिर क्या महिलाएं। सब पर उनका कहर बरपा। लात-घूंसों से उनकी पिटाई हुई। किसी-किसी पर लाठियां भी बरसायीं। इसी क्रम में बिहार में जदयू के मंत्री नवीन कुमार किसी काम से रांची आये थे। वह भी उपद्रवियों के हत्थे चढ़ गये और उपद्रवियों ने उनकी गाड़ी को क्षतिग्रस्त कर दिया। उपद्रवियों ने विधायक अमित कुमार की गाड़ी को भी नहीं बख्शा। तोड़फोड़ कर दी। ड्राइवर की सूझबूझ से गाड़ी आगजनी से बच गयी। वह किसी तरह पत्थर खाते-खाते बच बचा कर गाड़ी लेकर भागा। दंगाइयों ने कुछ भिखारियों के साथ भी मारपीट की। उन्हें लाठियों से पीटा। भिखारी हनुमान मंदिर के इस आस में बैठे थे कि कुछ दाता आयेंगे और उनके कटोरे में कुछ दान देंगे। भक्तों से वे रोटी की आस लगाये बैठे थे। उन्हें क्या पता था कि इंसान के रूप में कुछ ऐसे लोग भी आयेंगे, जो उन जैसे बेबसों को पीटेंगे।
एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि आखिर डेली मार्केट के पास ही हंगामा क्यों शुरू होता है। वहां के मुसलिम युवक बार-बार कानून को अपने हाथ में क्यों ले लेते हैं। यह पहला अवसर नहीं है, जब डेली मार्केट दुकानदार संघ ने ऐसा हिंसक प्रदर्शन किया हो। इसके पहले भी उन लोगों ने पुलिस को उस समय निशाना बनाया था, जब रघुवर सरकार में मेन रोड से भाजयुमो अपनी उपलब्धि को लेकर जुलूस निकाल रहा था और पुलिस उसे सुरक्षा घेरा में लेकर जा रही थी। अचानक डेली मार्केट के पास उपद्रवियों की भीड़ जमा हो गयी और इंस्पेक्टर को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। रैली में शामिल भाजपाइयों को बुरी तरह दौड़ाया और पीटा। उपद्रवियों का कहना था कि इस रास्ते से जुलूस क्यों निकाला गया। यहां एक सवाल डेली मार्केट दुकानदार संघ के पदधारियों से। जब आप अपने क्षेत्र से किसी दूसरे का जुलूस नहीं जाने देंगे और जब आपकी मर्जी हो तो सड़कों पर निकल जायेंगे, फिर तोड़ फोड़ शुरू कर देंगे, यह कहां से जायज है। ऐसे में आखिर रांची में शांति की उम्मीद कैसे की जा सकती है। सोचना तो प्रशासन को भी पड़ेगा। या तो वह मेन रोड में जुलूस ही नहीं निकलने दे और अगर निकलता है, तो उस पर नियंत्रण होने की कूबत पुलिस में होनी चाहिए।
जुलूस के नेतृत्वकर्ताओं से सवाल
जिन लोगों ने भी जुमे की नमाज के बाद रांची मेन रोड पर विरोध प्रदर्शन की योजना बनायी थी, उनसे सवाल है कि जब उनमें भीड़ को नियंत्रित करने की कूवत ही नहीं थी, तो उन्होंने जुलूस क्यों निकाला। जुलूस निकालने के पहले बार-बार वे आश्वासन दे रहे थे कि जुलूस बिल्कुल शांतिपूर्ण रहेगा। किसी भी तरह का हंगामा नहीं होगा। लेकिन जब सड़कों पर निकले, तो उनके सारे वादे कपोल कल्पित साबित हुए। सच तो यह था कि जुलूस में शामिल उपद्रवी पहले से ही झोले में पत्थर लेकर चल रहे थे। कुछ के हाथ में डंडे थे। कुछ झंडे का बहाना लेकर डंडे लेकर चल रहे थे। जैसे ही उन्होंने अपने सामने दूसरे समुदाय के लोगों और खास कर हिंदुओं को देखा, तो वे चुन-चुृन कर उन्हें निशाना बनाने लगे। मेन रोड ही नहीं, गलियों में घुस-घुस कर उपद्रवियों ने आम लोगों को निशाना बनाया। वैसी निर्दोष लोगों पर कहर बरपाया, जो कहीं से भी कसूरवार नहीं थे।
मंदिर पर पत्थरबाजी कर दंगा कराना चाहते थे उपद्रवी
मेन रोड में हनुमान मंदिर पर उपद्रवियों ने एक सोची-समझी साजिश के तहत पत्थरबाजी की। मंदिर को बार-बार निशाना बनाया। मंदिर में घुस कर पुजारी को पीटा। वहां प्रसाद की दुकानों को तहस-नहस कर दिया। दरअसल ये उपद्रवी इस साजिश के तहत मंदिर को निशाना बना रहे थे कि उधर से विरोध हो और फिर इन्हें दंगा करने का मौका मिल जाये। भला हो मंदिर में एकत्र भक्तों का कि उन्होंने विरोध नहीं किया और मार खाकर भी दुबके रहे। बता दें कि उस समय मंदिर में कुछ लोग पूजा करने के लिए आये थे, तो कुछ लोगों ने उपद्रवियों की हिंसा को देख कर बचने के इरादे से मंदिर में शरण ले रखी थी। फिर भी उपद्रवियों ने उन्हें नहीं बख्शा। यहां भिखारियों तक पर कहर बरपाया। लाठी-डंडों से पीटा और उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दीं। क्या जुलूस निकालने वाले इस बात का जवाब देंगे कि हनुमान मंदिर से उनकी क्या दुश्मनी थी। उन्होंने मंदिर को क्यों निशाना बनाया। यही काम अगर दूसरी कौम के लोग उनकी मसजिदों के खिलाफ करते, तो क्या ये बरदाश्त कर लेते। उन्हें यह सोचना पड़ेगा कि अगर सम्मान पाना चाहते हैं, तो उन्हें भी दूसरों को सम्मान देना पड़ेगा। अगर वे न्याय चाहते हैं, तो दूसरों के साथ अन्याय नहीं करना होगा।
पुलिस को इसलिए पीटा, क्योंकि पुलिस मंदिर पर पथराव करने से रोक रही थी
उपद्रवियों ने रांची पुलिस को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया कि वह भीड़ से आग्रह कर रही थी कि वह एक तय जगह से आगे नहीं बढ़े। पुलिस चाहती थी कि भीड़ अल्बर्ट एक्का चौक तक नहीं जाये। पुलिस इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि अगर भीड़ मंदिर के आसपास पहुंची, तो उपद्रवी मंदिर पर हमला कर देंगे और फिर रांची में हिंदू-मुसलिम का बखेड़ा शुरू हो जायेगा। यही कारण था कि पुलिस एक जगह अड़ गयी और भीड़ को आगे जाने से रोक दिया। उसके बाद भीड़ में शामिल उपद्रवियों ने पुलिस को ही निशाना बना दिया। उस पुलिस को, जो उन्हें राजनीतिक दबाव में भैया-बाबू कह कर संबोधित कर रही थी और बार-बार हाथ जोड़ कर आग्रह कर रही थी कि आप लोग आगे नहीं बढ़ें, प्लीज रुक जायें। जब भीड़ पर इस आग्रह का असर नहीं पड़ा तो पुलिस घेरा बना कर खड़ी हो गयी। फिर क्या था। देखते ही देखते उपद्रवियों ने झोले से पत्थर निकाले और दे दनादन पुलिस पर बरसाने लगे। पत्थर रांची के एसएसपी सुरेंद्र झा को भी लगे। एक इंस्पेक्टर लहूलुहान हो गया। डेली मार्केट के थाना प्रभारी बुरी तरह जख्मी हो गये। जब पुलिसकर्मियों ने अपने अफसरों को मार खाते देखा तो पुलिस भी तन कर खड़ी हो गयी और उसने लाठीचार्ज कर दिया। इस बीच उपद्रवियों ने भीड़ में से पुलिस को लक्ष्य कर फायरिंग शुरू कर दी, जिसके जवाब में पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और फायरिंग भी की। परिणाम सबके सामने है। दो लोगों की मौत हो चुकी है। आधा दर्जन लोग जख्मी हुए हैं। अभी दो और लोगों की हालत गंभीर है। लाठी से घायल होनेवालों की संख्या तो और ज्यादा है।
एक बड़ा सवाल, जुलूस निकालने की योजना बनानेवालों से
शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद जिन लोगों ने भी मेन रोड में जुलूस निकालने की योजना बनायी थी, उनसे सवाल कि आखिर भीड़ को लेकर सड़कों पर क्यों निकले? क्या वे उन दो लोगों के परिवारवालों को यह जवाब दे पायेंगे कि आखिर उनके लोग क्यों मारे गये। इस बात का प्रदर्शन का नेतृत्व करनेवालों के पास क्या जवाब है कि उन दोनों का हंसता-खेलता परिवार क्यों उजड़ गया। इस प्रदर्शन से उन्हें क्या हासिल हुआ, यह तो वे ही जानें, लेकिन इन दो लोगों के परिवारवालों को तो ताउम्र ये गम दे गये। अगर इन लोगों ने प्रदर्शन की योजना नहीं बनायी होती, तो वे उसमें शामिल नहीं होते और उसमें शामिल नहीं होते, तो मारे नहीं जाते। इस घटना के बाद दो दर्जन से अधिक लोगों को पुलिस अभियुक्त बनायेगी। धर-पकड़ होगी, वे जेल जायेंगे। आखिर इसकी जवाबदेही कौन लेगा। कौन लेगा उन लोगों की जवाबदेही, जिनके ठेले या खोमचे तोड़ दिये गये। जिनके वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया, जिनकी दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया। आखिर कौन लेगा इसकी जवाबदेही कि इस घटना के बाद हिंदू और मुसलिम के बीच भी दरार पैदा हो गयी है।
अगर पुलिस जुलूस नहीं निकालने देती, तो नहीं होता हंगामा
रांची पुलिस एक बार फिर उपद्रवियों की हंसी-चुपड़ी बातों पर विश्वास कर गयी। वह उन लोगों के झांसे में आ गयी, जो बार-बार पुलिस को यह विश्वास दिला रहे थे कि प्रदर्शन होने दें, किसी तरह का हंगामा नहीं होगा। वे एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह प्रचार भी कर रहे थे कि हंगामा नहीं होगा। लेकिन जैसे ही नमाज पढ़ कर भीड़ सड़क पर आयी, भीड़ में शामिल उपद्रवियों ने बड़ी चालाकी से उसमें नारेबाजी शुरू कर दी और फिर भीड़ को उकसा दिया। धीरे-धीरे भीड़ हिंसा पर उतारू हो गयी। यहां पुलिस से बहुत बड़ी चूक हुई थी। जब उसे पहले से पता था कि मेन रोड पर प्रदर्शन की तैयारी कर ली गयी है, तो या तो पुलिस प्रदर्शन करने ही नहीं देती और अगर इजाजत भी देती, तो पहले से ही वहां काफी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी गयी होती। जाहिर है, अगर एक हजार के आसपास वहां पुलिस बल मौजूद रहता, तो फिर उपद्रवियों की यह मजाल ही नहीं होती कि वे उपद्रव करते। तब तो पुलिस वहीं उनका इलाज कर देती, जहां वे बदमाशी शुरू करते। उपद्रवियों ने जिन लोगों को चोट पहुंचायी है, वे तो आजीवन उससे जूझते रहेंगे, लेकिन पुलिस को चाहिए कि जिन लोगों ने भी प्रदर्शन का नेतृत्व किया, भीड़ में नारेबाजी शुरू करवायी, जिन्होंने यह आश्वासन दिया था कि कुछ हंगामा नहीं होगा, उन्हें उपद्रव के लिए जिम्मेदार बनाते हुए उन पर एफआइआर दर्ज करे और उन्हें जेल भेजे। दो लोगों की मौत का जिम्मेदार भी उन्हें ही बनाया जाये। उन पर हत्या का मुकदमा चले। घायलों के भी गुनगहार वही हैं और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का कसूरवार भी।
अपना चेहरा चमकाने के लिए अब बिल से निकलेंगे शांति समिति के लोग
शुक्रवार को जब मेन रोड में जुलूस निकालने की योजना बनी, उस समय शांति समिति का कोई भी सदस्य जुलूस निकालनेवालों के पास नहीं गया कि भैया जुलूस नहीं निकालो। अगर विरोध करना है, तो एकरा मसजिद के पास खड़ा होकर ही विरोध प्रदर्शन कर लो या फिर कहीं मैदान में चले जाओ। अब स्थिति सामान्य होने के बाद ये लकदक कपड़ों में सामने आयेंगे। ये थानों में जायेंगे। लंबी-लंबी बातें करेंगे। गंगा-जुमनी तहजीब की दुहाई देंगे। फोटो खिंचवायेंगे और बड़ी शान से रांची की सड़कों पर चलते हुए कहेंगे कि उन्होंने रांची को जलने से बचा लिया। वे यह भी कहेंगे कि अगर वे नहीं होते, तो रांची बर्बाद हो जाती। अब वे पुलिस के इर्द-गिर्द अपनी मौजूदगी दिखाना चाहेंगे। ऐसा करके वे अपना बाजार बनाना चाहते हैं। इसलिए कि उन्हें दलाली जो करनी है। पुलिस प्रशासन से फायदा जो लेना है। सच कहा जाये, तो जितना दोषी उपद्रवी हैं, उससे कम दोषी ये शांति समिति के लोग नहीं, जो फोटो खिंचवाने के समय तो सड़कों पर उतर जायेंगे। सभा-जुलूस में चले जायेंगे, लेकिन जब रांची को जलाने की साजिश होगी, तो ये बिल में घुस जायेंगे। कहीं इनका चेहरा नजर नहीं आयेगा। उस समय उनका कोई बयान नहीं आयेगा। अगर उनसे उस समय पूछिये कि यह क्या हो रहा है, आप उन्हें समझाते क्यों नहीं, तो वे कहेंगे लड़के बड़ी बदमाश हो गये हैं, वे उनकी बात मानते ही नहीं और जब पुलिस उन बदमाशों पर कार्रवाई करेगी, तो फिर ये अपनी राजनीति चमकाने सड़कों पर उतर जायेंगे कि पुलिस उनके साथ नाइंसाफी कर रही है। ये एक बार भी इस समय नहीं बतायेंगे कि दोषी कौन है, उसकी शिनाख्त नहीं करेंगे, लेकिन जैसे ही पुलिस गिरफ्तार कर उपद्रवियों को जेल भेजने लगेगी, ये थानों में पहुंच जायेंगे और कहेंगे कि यह तो निर्दोष है। इसे जेल नहीं भेजा जाये। यह तो बड़ा अन्याय हो रहा है।
आखिर रांची पुलिस को हो क्या गया है
हाल के दिनों में कई अवसरों पर यह देखा गया है कि रांची पुलिस हद से ज्यादा कमजोर हो गयी है। अपराध का ग्राफ बढ़ रहा है। अभी दो दिन पहले सोना कारोबारी की हत्या कर दी गयी। उससे पहले भी घटनाएं हुर्इं। सबसे ज्यादा पुलिस का नरम चेहरा शुक्रवार को दिखा। आखिर रांची पुलिस को हो क्या गया है। वह क्यों मेन रोड और डेली मार्केट के पास जब भीड़ जुटती है, तो हाथ जोड़ने लगती है। शुक्रवार को उसने हद से ज्यादा नरमी बरती। शुरू में ही अगर पुलिस अड़ जाती, कड़ा रुख अख्तियार कर लेती, तो हिंसक प्रदर्शन नहीं होता और हंसती-खेलती रांची में आज वीरानी नहीं छाती। दुकान कारोबार आज बंद नहीं होता। दो लोग मारे नहीं जाते, एक दर्जन से अधिक लोग घायल नहीं होते। पुलिस को यह सोचना चाहिए कि लोगों का अंतिम भरोसा पुलिस ही है। वही भरोसा अगर टूट जायेगा, तो फिर उसके रहने न रहने का क्या मतलब। पुलिस को यह भी सोचना चाहिए कि कांटा कांटा से ही निकलेगा। शरीफ इंसानों से इंसानियत से पेश आये पुलिस और अगर उपद्रवी सामने आ जाये, तो उसे हर हाल में कठोरता बरतनी होगी, वह चाहे किसी भी धर्म या कौम का हो। नहीं तो पुलिस के दामन पर दंगा का ऐसा दाग लगेगा, जो उसके सेवाकाल तक उसे टिस पहुंचाता रहेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि रांची पुलिस उपद्रवियों के खिलाफ अपना पौरुष दिखायेगी और उन लोगों को न्याय दिलवायेगी, जो कल की घटना के शिकार बने हैं।