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    Home»विशेष»सीता सोरेन बनीं भाजपा के लिए गले की फांस
    विशेष

    सीता सोरेन बनीं भाजपा के लिए गले की फांस

    shivam kumarBy shivam kumarJune 19, 2024Updated:June 20, 2024No Comments10 Mins Read
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    विशेष

    -सीता बनीं भाजपा के लिए गले की फांस
    -भाजपा के लिए उल्टा पड़ने लगा है झामुमो को कमजोर करने का दांव
    -चुनाव हारने पर तमाम बड़े नेताओं पर लगा दिया भितरघात का आरोप
    -आहत-मर्माहत हैं तपे-तपाये नेता और कार्यकर्ता, सबक ले भाजपा

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    झारखंड की दुमका लोकसभा सीट से मिली हार के बाद आज से मात्र 90 दिन पहले भाजपा में शामिल और दुमका से भाजपा के सच्चे सिपाही सुनील सोरेन का टिकट काट कर प्रत्याशी बनीं सीता सोरेन ने केंद्र से लेकर प्रदेश नेतृत्व के ऊपर आरोप मढ़ना शुरू कर दिया है। वह अपनी हार का ठीकरा फोड़ने के लिए कई सिर तलाश रही हैं। संसद में बैठने का सपना पाले बैठीं सीता सोरेन का सपना जब चूर हुआ, तब उनके मुख से शब्द भेदी बाण बयानों के रूप में भाजपा नेताओं पर बरस रहे हैं। उन्होंने अपनी हार की वजह भितरघात को बताते हुए भाजपा के बड़े नेताओं को कटघरे में खड़ा कर दिया है। महज तीन महीने पहले भाजपा में शामिल हुईं सीता सोरेन का यह बयान झारखंड में आग की तरह फैल गया है। एक तरफ जहां आरोपित भाजपा नेताओं में रोष है, तो वहीं राजनीतिक गलियारों में लोग चटखारे ले रहे हैं। कह रहे हैं, क्यों भाजपा के नेताओं, आ गया न स्वाद। चले थे जेएमएम के तीर-धनुष को कमजोर करने, अब उसी बाण से खुद को बचाते फिरो। सीता सोरेन का तमाम भाजपा नेताओं के खिलाफ दिया गया बयान महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि इससे भाजपा के भीतर एक तरह की खेमेबंदी के साथ पार्टी की रणनीति की कमजोरी भी सामने आ गयी है। चुनाव की घोषणा होने के बाद मार्च महीने में जिस तामझाम के साथ सीता सोरेन को झामुमो से तोड़ कर भाजपा में इंट्री करायी गयी और फिर अपने सीटिंग सांसद सुनील सोरेन का टिकट वापस लेकर उन्हें दुमका जैसी प्रतिष्ठित सीट से प्रत्याशी बनाया गया, उससे तो भाजपा को यह लगा था कि उसने बहुत बड़ा तीर मार लिया है। उस समय शायद भाजपा को यह आभास भी नहीं हुआ होगा कि उसने झामुमो के लिए घाव बन चुकी सीता सोरेन को पार्टी में शामिल करा कर खुद दर्द से कराहने लगेगी। जब सीता सोरेन झामुमो छोड़ भाजपा में आयीं, तो झामुमो ने निश्चित रूप से राहत की सांस ली होगी। सीता सोरेन के बयान से यह जाहिर हो रहा है कि अगर वह दुमका से जीतती तो यह उनकी खुद की जीत होती, लेकिन अगर हारी हैं, तो यह भाजपा की हार है। उस समय भाजपा ने भी अपने सच्चे सिपाही सुनील सोरेन के साथ कौन सा अच्छा काम किया था। अगर उनका टिकट काटना ही था तो पहले ही घोषणा कर देती, लेकिन टिकट देने के बाद फिर टिकट काट देना, वह भी सीटिंग सांसद का, इससे बड़ी जगहसाई उसके लिए भला और क्या होती। एक तरफ भाजपा के कार्यकर्ता दिन रात पार्टी की बेहतरी के लिए एक किये हुए हैं, इस उम्मीद में कि उनका भी एक दिन नंबर आयेगा, लेकिन यहां नंबर आने से पहले, पैरासूट से प्रत्याशी को उतार दिया जा रहा है। यानी हांडी में बिरियानी बनाये कोई, तमाम तामझाम, तेल मसाला, नुस्खा लाये कोई, लेकिन स्वाद ले कोई तो क्या होगा। चलिये, अब भाजपा नेताओं का नंबर आये न आये, आरोप लगने का नंबर लग चुका है। चुनाव हारने के बाद सीता सोरेन जिस तरह पार्टी के बड़े नेताओं के खिलाफ आरोप लगा रही हैं और जिसके कारण पूरे झारखंड में पार्टी की किरकिरी होने लगी है, उससे तो साफ हो गया है कि झामुमो को तोड़ने की भाजपा की रणनीति एक बार फिर उसके लिए घाव बन गयी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब भाजपा ने झामुमो को तोड़ने की कोशिश की, तब-तब उसने मुंह की खाई है। पहले साइमन मरांडी, उसके बाद हेमलाल मुर्मू और अब सीता सोरेन। झामुमो कैडर बेस्ड पार्टी है। वह आंदोलन से उपजी पार्टी है। झामुमो ने कल-पुर्जे अपने हिसाब से गढ़े हैं। वे भाजपा की मशीनरी में फिट हो ही नहीं सकते। जब से सीता सोरेन ने भाजपा ज्वाइन की, तभी से यह संदेह होने लगा था कि क्या सीता सोरेन भाजपा में पूरी तरह घुल-मिल पायेंगी। आज जवाब भी उन्होंने खुद ही दे दिया है। सीता सोरेन संगीन आरोप भाजपा के नेताओं पर लगा रही हैं। भाजपा के तपे-तपाये पदाधिकारियों के ऊपर मैनेज होने तक का आरोप लगा रही हैं, इससे तो साफ है कि सीता सोरेन की नजर में भाजपा के नेताओं की कोई इज्जत नहीं है। इस बयान का क्या है मतलब और भविष्य में भाजपा में इसका क्या असर हो सकता है, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
    लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 19 मार्च को झामुमो छोड़ कर भाजपा में शामिल हुईं सीता सोरेन ने दुमका सीट पर अपनी हार का ठीकरा भाजपा कार्यकर्ताओं और पार्टी के बड़े नेताओं पर फोड़ दिया है। सीता सोरेन का कहना है कि भाजपा के संगठन में जो मजबूती होनी चाहिए थी, वह नहीं थी। पार्टी के कुछ नेता-कार्यकर्ता मनमानी पर उतर आये थे। सीता सोरेन ने कई बड़े नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठा दिया है। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी से लेकर, कर्मवीर सिंह तक, पार्टी के महासचिव और सांसद प्रदीप वर्मा से लेकर पूर्व सांसद सुनील सोरेन, पूर्व विधायक लुइस मरांडी और वर्तमान विधायक रणधीर सिंह तक को नहीं छोड़ा है। और आरोप भी ऐसा, जो किसी भी तपे-तपाये नेता-कार्यकर्ता को अंदर तक बेध जाये।

    क्या कहा है सीता सोरेन ने
    सीता सोरेन ने कहा है कि केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व को दुमका में हार की समीक्षा के अलावा ग्रास रूट पर जांच करानी चाहिए। केंद्रीय नेतृत्व टीम बना कर गांव-गांव जाये और जांच करे, तो पर्दे में रह कर पार्टी को हराने वाले पार्टी में छिपे गद्दारों का चेहरा सामने आ जायेगा। केंद्र में अगर भाजपा को इस बार पूर्ण बहुमत नहीं मिली है, तो इन्हीं गद्दारों की वजह से। इन पर पार्टी सख्त कार्रवाई करे। सीता सोरेन ने बाबूलाल मरांडी और कर्मवीर सिंह तक पर यह आरोप लगा डाला है कि उन्होंने नेताओं-संगठन के ऊपर नियंत्रण नहीं रखा। चुनाव प्रभारी के रूप में दिन-रात एक किये पार्टी के तपे-तपाये महामंत्री और सांसद प्रदीप वर्मा पर मैनेज होने तक का आरोप लगा डाला। पूर्व सांसद सुनील सोरेन के बारे में कहा कि उन्होंने केवल झामुमो का झंडा नहीं पकड़ा था, बाकी भाजपा को हराने और झामुमो को जिताने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कह दिया कि हमारे चुनाव हारने के तुरंत बाद उन्होंने खुशी में पार्टी तक आयोजित की। सीता ने आरोप लगाया है कि वह काफी कम अंतर से इसलिए हार गयीं, क्योंकि पर्दे में रह कर पूर्व सांसद सुनील सोरेन, पूर्व मंत्री डॉ लुइस मरांडी और सारठ विधायक रणधीर सिंह ने पार्टी को हराने के लिए पूरी ताकत लगा रखी थी। चुनाव के दौरान पार्टी का मंच तो साझा किया, पर बैकडोर से चुनाव हराने के लिए पूरी ताकत लगा दी। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान ये लोग खड़े तो मेरे साथ थे, लेकिन काम विरोधी दल का कर रहे थे। सीता सोरेन ने आगे कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक-एक सीट पर जीत के लिए पूरी ताकत झोंक रहे थे। इसी कड़ी में वह दुमका में भी जनसभा करने आये थे, लेकिन इसकी लाज भी जिला संगठन और कुछेक नेताओं ने नहीं रखी। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा और संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह पर भी ढीला रवैया अपनाने का आरोप लगाया।

    सीता आरोप साबित कर दें तो राजनीति छोड़ दूंगा: सुनील
    सीता सोरेन के आरोपों पर पूर्व सांसद सुनील सोरेन ने कहा कि वह साबित कर दें कि चुनाव में मैं बिक गया, तो राजनीति छोड़ दूंगा। ऐसा आरोप दुर्भाग्यपूर्ण है। मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालने की सूचना मैं प्रदेश और केंद्र इकाई से मिल कर दूंगा, मर्माहत हैं
    लुइस मरांडी
    पूर्व मंत्री लुइस मरांडी सीता सोरेन के आरोपों से मर्माहत हैं। उन्होंने कहा कि इस बार दुमका विधानसभा से वर्ष 2019 से ज्यादा मतों से लीड है और इसके बाद भी सीता सोरेन का ऐसा बयान शर्मनाक है। हम पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं और इस तरह का आरोप लगाया जाना काफी पीड़ादायक है। सीता सोरेन के बयान से ऐसा प्रतीत होता है कि वह हार की सही ढंग से समीक्षा करने की बजाय पब्लिक फोरम में समर्पित पार्टी नेताओं पर अनर्गल आरोप लगा रही हैं, जो पार्टी लाइन के खिलाफ है। सारठ के विधायक रणधीर सिंह ने कहा कि कल पार्टी में शामिल होने वाली सीता सोरेन से काम के बदले सर्टिफिकेट लेने की आवश्यकता उन्हें नहीं है।

    खुलने लगी भाजपा में गुटबाजी और अंतर्कलह की परत
    दुमका से सीता सोरेन की पराजय और अब उनके बयान के बाद भाजपा में व्याप्त गुटबाजी और अंतर्कलह की परत-दर-परत खुलने लगी है। भाजपा को इस बात का एहसास होने लगा है कि झामुमो को कमजोर करने के लिए उसने सीता सोरेन को अपने खेमे में लाने की जो चाल चली थी, वह उल्टी पड़ने लगी है। सीता सोरेन अब तक न तो झामुमो से पूरी तरह अलग हो सकी हैं और न ही भाजपा में पूरी तरह घुल-मिल सकी हैं। उन्हें भाजपा के अनुशासन और इसकी कार्यप्रणाली की भी जानकारी नहीं है। ऐसे में भाजपा को इस तरह की रणनीति पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए था। भाजपा उस समय भी नहीं संभली थी, जब एन चुनाव के समय शिबू सोरेन के छोटे बेटे, झारखंड सरकार में मंत्री और सीता सोरेन के देवर बसंत सोरेन ने यह कहा था कि भाभी का मन डोल रहा है। देखते रहिए, वह कभी भी झामुमो में आ सकती हैं। बताते चलें कि एन चुनाव के समय सीता सोरेन दुमका स्थित गुरुजी के आवास में गयी थीं। वहां वह कुछ घंटे रहीं। वहां बसंत सोरेन से उनकी मुलाकात हुई थी। उस समय सीता सोरेन ने कहा था कि वह गुरुजी का आशीर्वाद लेने आयी थीं, जबकि बसंत सोरेन ने कुछ और ही कहा था।

    दरअसल, भाजपा पिछले 15 साल से भी अधिक समय से झामुमो को तोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। इस क्रम में उसने साइमन मरांडी से लेकर हेमलाल मुर्मू तक को अपने खेमे में शामिल किया और अब सीता सोरेन को भी शामिल करा कर यह बताने की कोशिश की कि उसकी रणनीति सही ट्रैक पर है। पार्टी में शामिल करा कर जिस तरह सीता सोरेन को दुमका से टिकट दिया गया, उससे पार्टी के तपे-तपाये नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी स्वाभाविक थी, आखिर भाजपा के नेता और कार्यकर्ता भी तो हाड़-मांस से ही बने हैं, लेकिन भाजपा ने इसे भी नजरअंदाज कर दिया। इतना ही नहीं, पार्टी ने उस सुनील सोरेन का टिकट वापस ले लिया, जिन्होंने 2019 में शिबू सोरेन जैसे कद्दावर नेता को दुमका से हराया था। वह चुनाव प्रचार शुरू भी कर चुके थे, लेकिन पार्टी अनुशासन को देखते हुए चुप रह गये।

    तार-तार हुआ पार्टी का अनुशासन
    कहा जाता है कि भाजपा अनुशासनप्रिय पार्टी है और नेताओं को पार्टी के मामलों में किसी भी तरह की शिकायत मीडिया के बीच करने की इजाजत नहीं है। लेकिन जिस तरह सीता सोरेन ने बयान दिया है, उससे निश्चित तौर पर भाजपा की सख्त अनुशासन वाली छवि तार-तार हुई है। सीता सोरेन के बयान के बाद भाजपा को एहसास हो जाना चाहिए कि बिना किसी फिल्टर के किसी को भी अपनी पार्टी में शामिल करने की रणनीति कभी-कभी उल्टी भी पड़ जाती है और इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हर दाग उसकी मशीन में डाल देने मात्र से नहीं छूट सकते। यदि पार्टी ने ऐसा नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब दूसरे दलों से लाये गये चेहरों के कारण आहत होकर एक-एक कर कार्यकर्ता और तपे-तपाये नेता उससे दूर छिटक जायेंगे।

     

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