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    Home»विशेष»धर्म-पर्व»अयोध्या के भव्य व दिव्य रूप का सबको इंतजार
    धर्म-पर्व

    अयोध्या के भव्य व दिव्य रूप का सबको इंतजार

    shivam kumarBy shivam kumarJuly 31, 2020No Comments7 Mins Read
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    अयोध्या के भव्य और दिव्य रूप का सबको इंतजार है। सरकार से लेकर देश का आम और खास यही चाहता है कि अयोध्या फिर गौरवशाली बने। पांच अगस्त को अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच रजत शिलाओं को रखकर भूमि पूजन करेंगे। सरकार की योजना भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या को त्रेतायुग की तरह भव्य और दिव्य बनाने की है। इस निमित्त तैयारियां तेज हो गई हैं।
    भगवान राम विश्व सम्राट हैं। अयोध्या उनकी जन्मभूमि है। राजधानी है। अयोध्या को सजाने-संवारने का काम तेज हो गया है। अयोध्या के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपयें की योजनाओं को मंजूरी दी गई है। लोग अभी से इस बात का कयास लगाने लगे हैं कि राम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या का स्वरूप क्या होगा? उसकी श्री-समृद्धि का स्तर क्या होगा? इतने खर्च के बाद भी त्रेता युग जैसी अयोध्या बन पाएगी या नहीं, यह बात हर आम और खास की जुबान पर है। यह जानने के लिए सर्वप्रथम तो यह जानना होगा कि त्रेतायुग में अयोध्या का स्वरूप क्या रहा होगा? तत्कालीन कवि बाल्मीकि ने राम जन्म से पहले ही रामायणम की रचना कर ली थी लेकिन उसका गायन सबसे पहले उनके शिष्यों लव-कुश जो भगवान राम के पुत्र थे, द्वारा सर्वप्रथम अयोध्या की जनसभा में हुआ था। उस बाल्मीकि रामायण में अयोध्या का सविस्तार वर्णन मिलता है। इसमें अयोध्या के क्षेत्रफल आदि का भी जिक्र है। वाल्मीकि कृत रामायण के बालकाण्ड में उल्लेख मिलता है कि अयोध्या 12 योजन-लम्बी और 3 योजन चौड़ी थी।
    कोसल नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान।
    निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्। (1/5/5)
    अर्थात : सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा, उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कोसल नामक एक बड़ा देश था। इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक एक नगरी थी।’ -(1/5/6) ऋषि बाल्मीकि ने लिखा है कि पृथ्‍वी तल पर तो अयोध्या के टक्‍कर की दूसरी नगरी थी ही नहीं। उस उत्‍तम पुरी में गरीब यानी धनहीन तो कोई था ही नहीं, बल्‍कि कम धन वाला भी कोई न था। वहां जितने कुटुम्‍ब बसते थे, उन सबके पास धन-धान्‍य, गाय, बैल और घोड़े थे। रामचरित मानस में रामराज्य की व्याख्या के क्रम में कुछ ऐसा ही कहा गया है। सवाल यह उठता है कि त्रेता युग की तरह अयोध्या तो बनेगी लेकिन क्या त्रेता युग जितनी समृद्ध और विवेकयुक्त भी अयोध्या होगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
    विश्व सम्राट राम की जन्मभूमि सनातन धर्म का प्राण बिंदु है। इस अयोध्या की रक्षा स्वयं हनुमानजी करते हैं। शास्त्रों में वर्णित 36 वर्ग योजन की सम्पूर्ण अयोध्या केवल और केवल राजा रामचंद्र जी की है। वाल्मीकि ऋषि ने रामायण के बाल कांड के पंचम सर्ग में इसका वर्णन कुछ इस तरह किया है।
    ‘आयता दस च द्वे च योजनानि महापुरी। श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा।’
    इसलिए अयोध्या की उक्त वर्णित भूमि पर केवल और केवल राजा रामचंद्र जी व उनकी भक्त प्रजा का ही विशेषाधिकार है, शेष जो इस भूमि के किसी भी हिस्से पर दावा करता है, वह घोर दण्ड का भागी है। नगर की लंबाई, चौड़ाई और सड़कों के बारे में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं- इस नगरी में सुंदर, लंबी और चौड़ी सड़कें थीं। वाल्‍मीकि ऋषि अयोध्या की सड़कों की सफाई और सुंदरता के बारे में लिखते हैं कि वह पुरी चारों ओर फैली हुई बड़ी-बड़ी सड़कों से सुशोभित थी। सड़कों पर नित्‍य जल छिड़का जाता था और फूल बिछाए जाते थे। इन्द्र की अमरावती की तरह महाराज दशरथ ने उस पुरी को सजाया था। इस पुरी में राज्‍य को खूब बढ़ाने वाले महाराज दशरथ उसी प्रकार रहते थे जिस प्रकार स्‍वर्ग में इन्‍द्र वास करते हैं। इस पुरी में बड़े-बड़े तोरण द्वार, सुंदर बाजार और नगरी की रक्षा के लिए चतुर शिल्‍पियों द्वारा बनाए हुए सब प्रकार के यंत्र और शस्‍त्र रखे हुए थे। उसमें सूत, मागध बंदीजन भी रहते थे, वहां के निवासी अतुल धन संपन्‍न थे, उसमें बड़ी-बड़ी ऊंची अटारियों वाले मकान जो ध्‍वजा-पताकाओं से शोभित थे। महर्षि वाल्‍मीकि ने लिखा है कि स्‍त्रियों की नाट्य समितियों की भी यहां कमी नहीं है और सर्वत्र जगह-जगह उद्यान निर्मित थे। आम के बाग नगरी की शोभा बढ़ाते थे। नगर के चारों ओर साखुओं के लंबे-लंबे वृक्ष लगे हुए ऐसे जान पड़ते थे, मानो अयोध्‍यारूपिणी स्‍त्री करधनी पहने हो। यह नगरी दुर्गम किले और खाई से युक्‍त थी तथा उसे किसी प्रकार भी शत्रुजन अपने हाथ नहीं लगा सकते थे। हाथी, घोड़े, बैल, ऊंट, खच्‍चर सभी जगह-जगह दिखाई पड़ते थे।
    राजभवनों का रंग सुनहला था। विमानगृह जहां देखो, वहां दिखाई पड़ते थे। उसमें चौरस भूमि पर बड़े मजबूत और सघन मकान अर्थात बड़ी सघन बस्‍ती थी। कुओं में गन्‍ने के रस जैसा मीठा जल भरा हुआ था। नगाड़े, मृदंग, वीणा, पनस आदि बाजों की ध्‍वनि से नगरी सदा प्रतिध्‍वनित हुआ करती थी। सातवीं सदी में यहां आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अयोध्या को पिकोसिया कहा था। उसके अनुसार इसकी परिधि 16ली (एक चीनी ली बराबर है 1.6 मील के) थी। संभवतः उसने बौद्ध अनुयायियों के हिस्से को ही इस आयाम में सम्मिलित किया हो। आईने अकबरी में भी इस नगर की लंबाई 148 कोस तथा चौड़ाई 32 कोस बताई गई थी।
    गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या की सुंदरता का वर्णन करते हुए लिखा है कि ‘बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे संवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि। भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा। मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।’ अर्थात अनेक प्रकार के मंगल-कलश घर-घर सजाकर बनाए गए हैं। श्री रघुनाथजी की पुरी (अयोध्या) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं। उस समय राजमहल (अत्यन्त) शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेव भी मन मोहित हो जाता था।
    प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि।
    चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥2॥
    सुंदर मणियों से बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं, मानो इन्द्रधनुष सजाए हों। अटारियों पर सुंदर और चपल स्त्रियां प्रकट होती और छिप जाती हैं (आती-जाती हैं), वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो बिजलियां चमक रही हों। श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत्‌ में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते। अयोध्या में रघुनाथ जी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वी के एक मात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्मांड हैं, उनके लिए सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है। अयोध्या में भगवान राम की कई पीढ़ियों का राज्य रहा है और समस्त त्रिलोकी में उसकी अपनी प्रतिष्ठा रही है। रघुवंशम में गोस्वामी तुलसीदास ने रघु से लेकर उनके पूरे वंश और खासकर अयोध्या की समृद्धि और उसके नयनाभिराम सौंदर्य का जिक्र किया है।
    ज्यों-ज्यों 5 अगस्त की तिथि नजदीक आ रही है। अयोध्या से जुड़ने की हर राह को सजाने-संवारने की प्रक्रिया तेज हो गई है। अयोध्या के चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग का कायाकल्प किया जा रहा है। इसे डबल लेन में बदलने की सरकार की योजना है। इसके विकास और सुंदरीकरण के लिए तीन हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। 275 किलोमीटर के इस परिक्रमा मार्ग में अधिकांश जगहों पर एकल मार्ग है। इस परिक्रमा मार्ग में दो पुलों का निर्माण भी किया जाना है। अयोध्या और चित्रकूट को जोड़ने के लिए 165 किलोमीटर लंबी सड़क बनाये जाने की योजना है। अयोध्या की दीवारों पर , खंभों पर, उससे जुड़ने वाले मार्गों पर राम कथा का चित्रण किया जाना है। 600 एकड़ में हाईटेक नव्य अयोध्या विकसित की जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि राममंदिर निर्माण के साथ ही नव्य अयोध्या के निर्माण का कार्य भी पूरा हो जाएगा। 25 हजार करोड़ की योजना का ब्लू प्रिंट बताता है कि अगर इस राशि का ईमानदार सदुपयोग हुआ तो अयोध्या का कायाकल्प होते देर नहीं लगेगी। नागर शैली में बनने वाले राममंदिर का मॉडल भी बताता है कि इसबार अयोध्या में जो कुछ भी होगा, भव्य और दिव्य ही होगा। श्रीरामचंद्र इंटरनेशनल एयरपोर्ट का निर्माण, अयोध्या के चारों ओर रिंग रोड, अयोध्या के जर्जर पौराणिक भवनों का पुनिर्माण जैसी स्थापनाएं अयोध्या को निश्चित ही गौरव प्रदान करेंगी।
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