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    Home»देश»उपराष्ट्रपति ने लोगों से पूछा, कोरोना काल में क्या सीखा सही सबक
    देश

    उपराष्ट्रपति ने लोगों से पूछा, कोरोना काल में क्या सीखा सही सबक

    shivam kumarBy shivam kumarJuly 12, 2020No Comments3 Mins Read
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    भारत के उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने लोगों से कोरोना वायरस (कोविड-19) के चलते देश भर में लागू पूर्णबंदी (लॉकडाउन) के दौरान पिछले कुछ महीनों के जीवन पर आत्मनिरीक्षण और मूल्यांकन करने का आग्रह करते हुए कहा कि इस दौरान क्या सही सबक सीखा और ऐसी अनिश्चितताओं से निपटने के लिए खुद को  कितना तैयार किया है।
    उपराष्ट्रपति ने रविवार को लिखे फ़ेसबुक पोस्ट में कोरोना महामारी के कारणों और परिणामों पर लोगों के साथ जुड़ने की बात करते हुए 10 सवाल सामने रखे, जिनके जवाबों से पिछले चार महीनों से ज्यादा समय में लॉकडाउन के दौरान सीखे गए सबक का आकलन करने और जीवन की मांगों में क्या परिवर्तन आया, यह समझने में मदद मिलेगी। नायडू ने कहा कि 10 बिंदुओं का मैट्रिक्स यह जानने में भी मदद करेगा कि क्या लोगों ने आवश्यक समझ के साथ खुद को इस तरह तैयार कर लिया है ताकि भविष्य में ऐसी कठिनाइयों की पुनरावृत्ति को रोकने में मदद मिल सके।
    उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि महामारी को न केवल एक आपदा बल्कि जीने के दृष्टिकोण और प्रथाओं में आवश्यक परिवर्तन करने वाले एक ‘सुधारक’ के रूप में भी देखने की जरूरत है जिससे हम प्रकृति और संस्कृति तथा सहायक मार्गदर्शक सिद्धांतों और लोकाचार के साथ सामंजस्य बनाकर रहें। उन्होंने कहा, ‘जीवन मार्ग का उसकी सभी अभिव्यक्तियों और समग्र रूप में लगातार मूल्याकंन उच्च जीवन के लिए एक जरूरी शर्त है। ऐसा ही एक अवसर अभी है क्योंकि हम कोरोना वायरस के साथ जी रहे हैं।’
     उपराष्ट्रपति के ‘कोरोना काल में जीवन पर चिंतन’ का जोर आधुनिक जीवन की कार्यप्रणाली, प्रकृति और रफ्तार पर फिर से गौर करने तथा एक सामंजस्यपूर्ण और नपे-तुले जीवन के लिए उपयुक्त परिवर्तन के अलावा जीवन के उद्देश्य को ठीक तरह से परिभाषित करने पर है। नायडू ने चिंता मुक्त जीवन के लिए जो सुझाव दिए उसमें सही सोचना और करना, भोजन को औषधि के रूप में देखना जो स्वस्थ जीवन का निर्वाह करता है, भौतिक लक्ष्य से परे जाकर जीवन का एक आध्यात्मिक आयाम प्राप्त करना, सही और गलत के सिद्धांतों और प्रथाओं का पालन करना, दूसरों के साथ साझा करना और उनकी देखभाल करना, सामाजिक बंधनों का पोषण और एक सार्थक जीवन के लिए जीने का उद्देश्य तय करना है।
    लगातार आपदाओं के कारणों पर गौर करते हुए नायडू ने कहा, ‘ग्रह को हमारी जरूरत नहीं है बल्कि हमें ग्रह की जरूरत है। ग्रह पर एकमात्र स्वामित्व का दावा करना जैसे कि यह केवल इंसानों के लिए है। इसने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है और कई तरह की कठिनाइयां पैदा हो गईं।’
    नायडू ने कहा कि महामारी ने कुछ वर्गों में बढ़ रहे जोखिम को उजागर किया है जिसकी वजह वो नहीं हैं। वे ज्यादा व्यवस्थित हैं और उन्हें उचित रूप से मदद की दरकार है। आपके जीने का तरीका दूसरों के बढ़े हुए जोखिमों के कारणों में से एक हो सकता है।’ लार्वा के कोकून के रूप में जीवन को धीमा करने और फिर इससे तितली के रूप में निकलने की घटना का जिक्र करते हुए नायडू ने लोगों से मौजूदा महामारी के दौरान जीवन के अनुभव को समझते हुए तितली की तरह उभरने का आग्रह किया।
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