मोदी की कइयों ने आलोचना तो बहुत की, अब तो शाबाशी दीजिए
विजयी भव! इस एक शब्द की कोरोना को हराने के लिए लंबे समय से इंतजार था। भगवान ने आशीर्वाद दिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्थक बनाया। कोरोना से जूझते हुए पूरा विश्व टीके की खोज में लगा। भारत भी इसमें पीछे नहीं हटा। मोदी ने जब भारत में टीके की बात की तो लोग हंसी मान रहे थे। इस हंसी पर ध्यान दिये बगैर काम चलता रहा। मोदी के नेतृत्व में भारत ने वह कर दिखाया, जिसकी उम्मीद संभवत: पूरे विश्व को नहीं थी। भारत भी दूसरे देशों के साथ टीका को लेकर कदमताल कर रहा था। इसके बाद शुरू हुआ अविश्वास का दौर। विरोधियों ने शक-शंका जाहिर की। कुछ लोग भ्रमित भी हुए। प्रधानमंत्री के कदम नहीं रुके। नपा-तुला, समयबद्ध एक-एक कदम आगे बढ़ाया। लोगों की सोच बदली। विश्वास जगा और फिर पूरे देश में शुरू हुआ टीकाकरण का महाअभियान। इसकी शुरूआत और अब तक कहां पहुंचे इस पर आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की तथ्यात्मक रिपोर्ट।
16 जनवरी 2021, दिन था शनिवार, जब कोरोना से युद्ध के मैदान में भारत अपना शस्त्र लेकर उतर रहा था। इससे पहले भारत कोरोना की पहली लहर को परास्त कर चुका था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन का ब्रह्मास्त्र चला कर कोरोना को धराशायी कर दिया था। लेकिन कहते हैं, जख्मी शिकार और भी खूंखार होकर वापसी करता है। कोरोना विश्व भर में उत्पात मचा रहा था तो जाहिर है भारत में भी उसकी वापसी पहली लहर के मुकाबले और भी खतरनाक रूप लेने वाली थी। बारी थी कोरोना से दो-दो हाथ करने की। भारत के टीकाकरण का भाला तैयार था और पहले ही दिन 3,352 केंद्रों पर कोरोना के फ्रंटलाइन वारियर्स 1,91,181 स्वास्थ्यकर्मियों और सफाईकर्मियों को टीके की पहली खुराक दी गयी। यह टीकाकरण के पहले चरण की शुरूआत थी। यह नये भारत की नयी तसवीर थी। कोरोना टीका के मामले में भारत को किसी अन्य देश की आस नहीं थी। फिर शुरू हुआ विश्व का अब तक का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान। विडंबना देखिये कि शुरूआत होते ही टीकाकरण को देश के कई विपक्षी नेताओं की भ्रामक टिप्पणी का शिकार होना पड़ा। किसी ने इसे मोदी का टीका करार दिया, तो किसी ने इस टीके में नुक्ताचीनी निकाल ली। परिणाम सामने था, लोगों में टीका के प्रति अंधविश्वास पनपना शुरू हुआ। लोग यहां तक कहने लगे कि मर जायेंगे, लेकिन टीका नहीं लेंगे। लेकिन गनीमत यह थी कि ये मुट्ठी भर लोग थे। भ्रम फैलानेवालों को शायद यह आभास नहीं था कि यह नया भारत है, जागरूक भारत, जिसने अंधविश्वास के फन को कुचलना शुरू किया और घरों से बाहर निकल कर 60 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों ने मोर्चा संभाला। टीकाकरण केंद्रों पर धीरे-धीरे सकारात्मकता की इबारत लिखनी शुरू हो गयी।
इस पटकथा की शुरूआत भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक मार्च 2021 को पहला टीका लेकर किया। यह टीकाकरण के दूसरे चरण की शुरूआत थी, जहां 60 प्लस वाले योद्धाओं को तैयार करना था। फौज नरेंद्र मोदी की अगुवाई में तैयार हो रही थी।
अब बारी थी 45 प्लस वाले योद्धाओं को तैयार करने की। दिन था एक अप्रैल 2021, टीकाकरण केंद्रों पर योद्धा पहुंचने लगे। कुछ योद्धाओं में आत्मविश्वास की कमी थी, जिसे उनके छोटे-छोटे बच्चों ने दूर करना शुरू किया, तो कुछ को 90 वर्ष से अधिक उम्रवाले लोगों ने टीका लगवा कर पानी-पानी कर दिया। सरकार अपने हर तंत्र के माध्यम से लोगों को जागरूक कर रही थी। क्या सुदूरवर्ती गांव, क्या पहाड़ी क्षेत्र, क्या बाढ़ प्रभावित क्षेत्र, हर तरफ कोरोना की खुराक देने मोदी के सेनापति पहुंचने लगे। कोई नाव से पहुंच रहा था, तो कोई पहाड़ लांघ पहुंच रहा। हर तरफ मेडिकल स्टाफ के रूप में सेनापति योद्धाओं को तैयार करने की दिशा में निकल पड़े। समय दर समय कोरोना भी अपना विकराल रूप लेने को तैयार बैठा था। वह हर घर पांव पसार रहा था। इस बार वह ज्यादा ही खतरनाक था। उसके इस रूप ने आम लोगों में दहशत पैदा कर दी। हर तरफ अफरा-तफरी। भारत के कई योद्धा वीरगति को प्राप्त होने लगे, तो कई अस्पतालों में कोरोना से जंग लड़ रहे थे। देश तड़प रहा था। हर तरफ हाहाकार मचा था। सड़कों पर सिर्फ और सिर्फ एंबुलेंस के सायरन की ही आवाजें गूंज रही थीं। देश में कोरोना से लड़ने की कमान राज्यों पर छोड़ी गयी थी। हर राज्य अपनी तरफ से बेहतर करने की कोशिश में जुटा था। भारत को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। जीवनवर्द्धक आॅक्सीजन की कमी चहुंओर सुनने में आ रही थी। अस्पताल में बेड भर चुके थे। श्मशानों में जगह और लकड़ियां कम पड़ने लगी थीं। किसी ने अपने पिता को तो किसी ने मां को, किसी ने दोनों को, तो किसी ने पूरा परिवार ही खो दिया। इर दरम्यान पूरा विपक्ष पानी पी-पीकर सिर्फ और सिर्फ एक शख्स की आलोचना कर रहा था और वह थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। लेकिन लोग भूल गये कि मोदी भी एक हाड़ मांस के इंसान ही हैं। कोई भगवान नहीं। लोगों का कहना था कि मोदी चुनाव में व्यस्त थे। लेकिन ये लोग क्या कर रहे थे, जिन राज्यों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी, उस राज्य के मुखिया क्या कर रहे थे। क्या राज्यों के मुखिया राज्य में लॉकडाउन नहीं लगा सकते थे। कोरोना से बचाव का ब्रह्मास्त्र लॉकडाउन है। यह ब्रह्मास्त्र सभी राज्यों के पास था। केंद्र ने लॉकडाउन का हथियार राज्य सरकारों को दे रखा था। आखिरकार, जब स्थिति नियंत्रण के बाहर जाने लगी, तो राज्यों ने लॉकडाउन खुद ही लगाया, लेकिन क्या ये लॉकडाउन राज्य के मुखिया पहले नहीं लगा सकते थे। क्या दूसरी लहर से लड़ने के लिए हर राज्य तैयार था? नहीं, सभी इसी भ्रम में थे कि यह लहर भी पहली लहर की तरह ही निपट जायेगी। लेकिन यहां मामला उल्टा पड़ गया। हर तरह की आलोचना झेलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से दोहरी ताकत के साथ कमान संभाली। टीकाकरण अभियान अपनी निर्धारित गति से चल ही रहा था। विदेशों से भी भारत के लिए मदद के हाथ उठाने लगे। लोग कहते थे कि मोदी बार-बार विदेश क्यों जाते हैं, वह तो भारत में रहते ही नहीं। यह उसी विदेशी दौरा का नतीजा है, जहां कई देशों ने भारत को मुसीबत के वक़्त मदद की। ये हाल के दिनों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निर्मित इंटरनेशनल रिलेशन ही है, जिससे भारत विश्व में एक अलग मुकाम बना पा रहा है। देखते ही देखते एक मई का दिन भी आ गया और 18 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों को विश्व के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान में जोड़ने का समय आ गया। क्या युवा, क्या बुजुर्ग, क्या पक्ष, क्या विपक्ष, सभी ने टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के लिए बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। कोरोना की दूसरी लहर फीकी पड़ने लगी। देश फिर से नये जोश के साथ आगे बढ़ने लगा। खुद को मजबूत करने दी दिशा में काम करने लगा। नरेंद्र मोदी का सबको वैक्सीन-मुफ्त वैक्सीन अभियान नया कीर्तिमान गढ़ने लगा। देश ने 203 दिनों में ही लोगों को 50 करोड़ खुराक देने की उपलब्धि हासिल की। यह सिलसिला लगातार हर दिन नयी बुलंदियों को छू रहा है। अब तो कोविशील्ड, कोवैक्सीन, स्पुतनिक के बाद जॉनसन एंड जॉनसन की सिंगल खुराकवाली वैक्सीन को भी भारत में आपातकालीन उपयोग के लिए मंजूरी मिल गयी है। यह सिलसिला अब रुकनेवाला नहीं। वह दिन दूर नहीं जब भारत का हर एक व्यक्ति वैक्सीनेट हो जायेगा। भारत के दरवाजे पर कोरोना की तीसरी लहर दस्तक देने को तैयार बैठी है। देश के कुछ राज्यों से इसकी आहट भी सुनायी दे रही है, लेकिन कोरोना टीका की 50 करोड़ खुराक ने भारत के योद्धाओं में वह ताकत भर दी है, जिससे वह तीसरी लहर से लड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। प्रधानमंत्री का अभियान सबको वैक्सीन मुफ्त वैक्सीन का कवच लिये भारत कोरोना की हर लहर को मात देने को तैयार बैठा है।
हालांकि 50 करोड़ खुराक का सफर केंद्र के लिए आसान नहीं रहा। कई बार वैक्सीन की कमी के कारण केंद्र को निशाना बनाया गया। प्रधानमंत्री को टारगेट किया गया, लेकिन भारत की सच्चाई हर भारतीय को पता है। भारत की जनसंख्या 130 करोड़ से अधिक है। बड़े बुजुर्गों के साथ-साथ युवाओं के लिए वैक्सीन कोई चैलेंज से कम नहीं थी और अब तो 130 करोड़ की आबादी में शामिल 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए वैक्सीन पर भी काम चल रहा है, जो जल्द देश के सामने आयेगा। इतनी भारी संख्या में भारत को वैक्सीनेट करना कोई मजाक नहीं। अपनी उत्पादक क्षमता और राज्यों की जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए ही राज्यों को उसी के हिसाब से वैक्सीन उपलब्ध करायी जा रही है। बस आम लोग अपना तीर धनुष तैयार रखें मतलब मास्क और सैनिटाइजर, बाकी वैक्सीन तो है ही। बहुत युद्ध भारत ने लड़े हैं। प्रत्यक्ष से लेकर परोक्ष तक। इस कोरोना रूपी अदृश्य दुश्मन के तीसरे वार से भी भारत निपट ही लेगा। बस आत्मविश्वास रखिये, देश पर भरोसा रखिये।