हाइकोर्ट की टिप्पणी से सबक ले झारखंड पुलिस
संविधान निर्माताओं ने कानून-व्यवस्था को राज्यों का विशिष्ट अधिकार बनाया। लक्ष्य बहुत स्पष्ट था कि हर प्रदेश की चुनी हुई सरकार सर्वप्रथम अपने लोगों को संपूर्ण सुरक्षा प्रदान करेगी। उन्हें निर्भय होकर अपनी प्रजातांत्रिक जिम्मेदारियां पूरी करने का मार्ग प्रशस्त करेगी। हेमंत सरकार ने दिसंबर 2019 में सत्ता संभाली, तो कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का संकल्प लिया। इस दिशा में कदम भी आगे बढ़ाया। बहुत हद तक अपराध पर अंकुश भी लगा। पुलिस अपनी ही कार्यशैली के कारण कठघरे में खड़ी हो रही। आम तो आम खास लोग भी आपराधिक घटना के शिकार हो रहे हैं। हाइकोर्ट की कौन कहे, सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंच रहा। कोर्ट राज्य के बारे तल्ख टिप्पणी कर रहा है। झारखंड हाइकोर्ट ने तो झारखंड की तुलना नागालैंड तक से कर दी। हाइकोर्ट की टिप्पणी से पुलिस को सबक लेना चाहिए। इधर, राज्य में हर तरह की आपराधिक मामलों को मिला दें, तो औसतन पांच हजार से अधिक घटनाएं हो रही हैं। नीति आयोग की हाल की रिपोर्ट देखें, तो झारखंड देश में अच्छी कानून व्यवस्था के मामले में 21 वें नंबर पर है। वहीं इसके साथ बना राज्य उत्तराखंड पहले स्थान पर है। बेलगाम और बेकाबू होते अपराधियों पर अंकुश जरूरी है। राज्य में एक बार फिर नये सिरे से पूरी व्यवस्था की समीक्षा और ठोस कदम उठाये जाने की जरूरत है। इससे देश में अच्छी कानून व्यवस्था बनाकर राज्य पहले नंबर पर पहुंच जाये। राज्य की कानून व्यवस्था की खराब होती स्थिति पर आजाद सिपाही ब्यूरो की यह खास रिपोर्ट।
धनबाद में जज की हत्या के बाद झारखंड हाइकोर्ट ने टिप्पणी कि ‘कुछ दिन पहले एक वकील की हत्या होती है। फिर जज की मौत संदेहास्पद तरीके से हो गयी। कुछ दिन पहले एक पुलिस अधिकारी की भी मौत संदेह के घेरे में है। राज्य में यह क्या हो रहा है? इससे प्रतीत होता है कि राज्य में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गयी है। स्थिति बदतर हो चुकी है। पिछले एक साल में अपराध का ग्राफ काफी तेजी से बढ़ा है। अपराधियों पर कोई लगाम नहीं है। उनके अंदर कानून का डर नहीं है।
राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति नागालैंड से भी बदतर हो गयी है।’ इस टिप्पणी को सहज रूप में नहीं लेना चाहिए। यह तो वह मामले है, जो हाइप्रोफाइल है। जिन पर हाइकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान ले लिया। राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट तलब किया। जबकि राज्य में आमलोगों से जुड़े सैकड़ों मामले हैं। वे धनबाद के न्यायाधीश उत्तम आनंद, वकील मनोज कुमार झा या पुलिस अधिकारी रूपा तिर्की जैसे ख्याति प्राप्त लोग नहीं हैं। पर जिस परिवार में होंगे, उनके लिये तो वह मायने रखते ही हैं। इसलिये आम व्यक्ति हो या खास व्यक्ति कानून व्यवस्था हर किसी के लिए मायने रखता है।
औसत पांच हजार घटनाएं हर महीने
पुलिस विभाग के आंकड़ों को देखा जाये, तो हर महीने राज्य में औसत पांच हजार आपराधिक घटनाएं होती हैं। पिछले पांच महीनों (जनवरी से मई) में 25 हजार 315 आपराधिक वारदातों को अंजाम दिया गया है। केवल मई महीने में राज्य में 129 हत्याएं हुई हैं। चोरी के 607, घरों में डाका के नौ और अपहरण के 98 मामले सामने आये। वहीं अप्रैल माह में हत्या के 147 मामले सामने आये थे। अगर केवल छिनतई और आर्म्स एक्ट की बात करें, तो पिछले वर्ष के पांच महीनों के मुकाबले में इस वर्ष मामले बढ़े हैं। बीते साल साल जनवरी से लेकर अप्रैल माह तक छिनतई की कुल 170 घटनाएं हुई थीं। इस वर्ष इन चार माह में 226 मामले हुए हैं। इसी तरह बीते साल जनवरी से अप्रैल के बीच आर्म्स एक्ट के कुल 175 मामले सामने आये थे। इस वर्ष इस अवधि में कुल 194 मामले सामने आये हैं।
झारखंड पुलिस बिहार से भी पिछड़ी
कानून व्यवस्था खराब होने के मामले में कभी हर समय बिहार का नाम आता था। झारखंड पुलिस की हालत यह हो गयी है कि अच्छी कानून व्यवस्था के मामले में बिहार से भी पिछड़ गयी है। पिछले महीने नीति आयोग ने पीस, जस्टिस और स्ट्रांग इंस्टिट्यूशन इंडेक्स 2020-21 नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें कानून व्यवस्था का आकलन किया गया है। इसमें अच्छी कानून व्यवस्था बनाने में झारखंड पुलिस देशभर में 21वें पायदान पर है। इस मामले झारखंड पुलिस को 70 अंक मिले हैं। बेहतर कानून व्यवस्था को लेकर उत्तराखंड पुलिस 86 अंक के साथ शीर्ष स्थान हासिल किया है। गुजरात पुलिस को दूसरा और मिजोरम को तीसरा स्थान मिला है। देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश 79 अंक के साथ आठवें नंबर पर है। वहीं, बंगाल चौथे, आंध्र प्रदेश नौवें, कर्नाटक 10वें, पंजाब 11 वें और बिहार 12वें नंबर पर है।
जेल से चलती है सल्तनत
झारखंड के कुख्यात अपराधी जेल से ही अपनी सल्तनत चला रहे हैं। इस बात का खुलासा समय-समय पर होता रहता है। राज्य के नामचीन लगभग एक दर्जन गैंगस्टर जेल में बंद हैं, पर उनके गिरोह के लोग सक्रिय हैं। उनका जेल से ही कारोबार चल रहा है। रंगदारी, हत्या, गोलीकांड जैसे कई मामलों में इसा खुलासा हुआ है। गिरोह के लोग सरकारी अधिकारियों से लेकर बड़े ठेकेदारों से रंगदारी वसूल रहे हैं। समय-समय पर व्यवसायी, कारोबारी और अन्य लोग रंगदारी की बात लेकर पुलिस के सामने आते और अपनी सुरक्षा की मांग करते हैं।
कानून व्यवस्था में सुधार की है जरूरत
किसी भी सरकार की कार्यकुशलता की कसौटी मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर ठोस पहलकदमी मानी जाती है। नागरिकों के बीच सुरक्षा की भावना कितनी मजबूत हुई है, यह काफी मायने रखता है। झारखंड की मौजूदा हेमंत सरकार की अपराधियों पर नकेल कसने की पहल को नकारा नहीं जा सकता है। बीच के दिनों में आपराधिक घटनाओं का ग्राफ गिरा था। सरकार जनता में सुरक्षा भावना कायम करने में काफी हद तक सफल रही है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से अपराध का ग्राफ बढ़ा, उससे विश्वास लड़खड़ाने लगा है। आखिर कौन सी वजहें हैं कि इतनी सख्ती के बाद भी अपराधी बेलगाम हो रहे हैं? क्यों अपराधी आये दिन किसी न किसी शहर में बेखौफ घटना को अंजाम देने में सफल हो रहे हैं? इन सभी बातों पर समीक्षा कर एक बार फिर पुलिस को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। इससे जनता का भरोसा कायम रहे। राज्य में अच्छी कानून व्यवस्था के मामले में राज्य देश में पहले पायदान पर पहुंच सके।