इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब या स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगने वाली कक्षा 11वीं की छात्रा की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केवल यह दावा करना पर्याप्त नहीं है कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। इसके लिए ठोस आधार प्रस्तुत करना जरूरी है।
मामले की मुख्य बातें
- प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा ने हिजाब/स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी।
- छात्रा ने अपनी मां के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
- वह इसी स्कूल से 10वीं की पढ़ाई पूरी कर चुकी है और 11वीं में प्रवेश लेना चाहती थी।
- छात्रा का कहना था कि सिर पर स्कार्फ पहनना उसके धार्मिक अधिकार का हिस्सा है।
- उसने अपने दावे को संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) से भी जोड़ा।
- स्कूल ने कहा कि वह निजी और गैर-सहायता प्राप्त सीबीएसई स्कूल है, जहां सभी विद्यार्थियों के लिए समान यूनिफॉर्म निर्धारित है।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने 21 अगस्त के फैसले में कहा कि याचिका में हिजाब को इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा बताया गया, लेकिन इसे साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं दिए गए।
अदालत ने स्कूल की कक्षाओं की तस्वीरों का भी उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता को छोड़कर किसी अन्य छात्रा ने हिजाब नहीं पहना था। उसी धार्मिक समुदाय की अन्य छात्राएं भी स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म में ही नजर आईं।
छात्रा ने क्या दलील दी?
छात्रा की ओर से कहा गया कि वह 10वीं कक्षा तक इसी स्कूल में पढ़ी है और उस दौरान स्कार्फ पहनने पर स्कूल ने आपत्ति नहीं की थी। उसका आरोप था कि 11वीं में प्रवेश के समय स्कार्फ पहनना जारी रखने को लेकर उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
याचिका में स्कार्फ को धार्मिक प्रथा बताते हुए इसे मौलिक अधिकारों से जोड़ने की मांग की गई थी।
स्कूल का क्या कहना था?
स्कूल प्रशासन ने दलील दी कि सभी विद्यार्थियों के लिए समान ड्रेस कोड लागू है। अगर किसी एक छात्रा को यूनिफॉर्म से अलग हिजाब या स्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाती है, तो इससे स्कूल के प्रशासन और अनुशासन पर असर पड़ सकता है।
याचिका हुई खारिज
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने छात्रा की याचिका खारिज कर दी। अदालत के फैसले में स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म का पालन करने और किसी धार्मिक प्रथा को आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए ठोस आधार की जरूरत पर जोर दिया गया है।



