जोशीमठ। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के मनुस्मृति और सनातन परंपरा से जुड़े बयानों पर आपत्ति जताई है। मंगलवार को जारी बयान में उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्मशास्त्रों पर टिप्पणी करने से पहले उनके मूल संदर्भ और शास्त्रीय परंपरा का अध्ययन किया जाना चाहिए।

बयान की प्रमुख बातें

  • शंकराचार्य ने राहुल गांधी पर हिन्दू धर्मशास्त्रों की सतही समझ के आधार पर टिप्पणी करने का आरोप लगाया।
  • उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अलग विषय हैं, लेकिन धर्म और शास्त्रों पर बोलते समय तथ्य और संदर्भ का ध्यान रखना चाहिए।
  • उन्होंने राहुल गांधी से प्रमाणिक स्रोतों और विद्वानों के माध्यम से धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने की अपील की।
  • शंकराचार्य ने मनुस्मृति को लेकर समाज में मौजूद अलग-अलग मतों और व्याख्याओं का भी उल्लेख किया।
  • उन्होंने कहा कि किसी भी ग्रंथ को एकतरफा नजरिए से देखने के बजाय उसके मूल स्वरूप, उद्देश्य और संदर्भ को समझना जरूरी है।

‘रक्षति’ का अर्थ सुरक्षा करना

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मनुस्मृति के चर्चित श्लोक ‘पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने…’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसमें स्त्री की परतंत्रता की बात नहीं है, बल्कि परिवार और समाज की ओर से उसकी सुरक्षा और जिम्मेदारी का उल्लेख किया गया है।

उन्होंने संस्कृत शब्द ‘रक्षति’ का अर्थ सुरक्षा करना बताया और कहा कि इसे नियंत्रण के अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए।

नारी सम्मान का दिया हवाला

शंकराचार्य ने कहा कि सनातन परंपरा में नारी को शक्ति और सम्मान का स्वरूप माना गया है। उन्होंने ऋग्वेद की ऋषिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में परस्पर सम्मान और पूरकता की भावना रही है।

भाजपा और मनुस्मृति को जोड़ने पर भी आपत्ति

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने राहुल गांधी के उस कथित तर्क को भी खारिज किया कि भारतीय जनता पार्टी मनुस्मृति की समर्थक है। उन्होंने कहा कि भारत का शासन संविधान के अनुसार चलता है, इसलिए किसी राजनीतिक दल को मनुस्मृति से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।

‘असत्य प्रचार’ रोकने की अपील

शंकराचार्य ने कहा कि संसद और सार्वजनिक मंचों पर मनुस्मृति तथा धर्मशास्त्रों को लेकर बार-बार भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनकी आपत्ति किसी राजनीतिक दल के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन धर्मग्रंथों के बारे में तथ्यहीन बातों के खिलाफ है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि बिना शास्त्रीय अध्ययन के धर्मग्रंथों पर टिप्पणियां जारी रहीं, तो सनातन समाज लोकतांत्रिक और वैचारिक तरीके से इसका विरोध करता रहेगा।

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