आधा दर्जन नेताओं की उड़ी नींद, जुटे जोड़-तोड़ में
झा रखंड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने आलाकमान को एक लंबा चौड़ा शिकायती पत्र सौंपा था, जिसमें आरोप लगाया था कि वैसे लोग उन्हें पद से हटाना चाहते हैं, जो अपने पुत्र-पुत्री और रिश्तेदारों के लिए टिकट चाहते हैं। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे नेताओं की सूची भी आलाकमान को सौंपी थी। पूर्व अध्यक्ष तो अब पार्टी में नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने झारखंड में पार्टी को पाक साफ रखने का निर्णय जरूर ले लिया है। आलाकमान के ये दोनों निर्देश कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं। दरअसल कांग्रेस में ऐसे नेताओं की लंबी कतार है, जिनके परिवार में एक से ज्यादा टिकट की जरूरत है। कई पिता-पुत्र, पति-पत्नी, पिता-पुत्री आगामी विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने की पूरी तैयारी कर चुके हैं।
संगठन को मजबूत बनाने में जुटी कांग्रेस
इधर, कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव पार्टी को पटरी पर लाने की पूरी कोशिश में जुटे हंै। अपनी टीम के साथ डॉ रामेश्वर उरांव ताकत दिखा रहे हैं। पहले तो उन्होंने झामुमो को बड़ा भाई मानने से इनकार कर दिया था, लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी है। इसके बाद उनका फोकस पार्टी पर है और लगातार जिलों में बैठक कर लोगों से परिचय बढ़ा रहे हैं। रामेश्वर उरांव, विधायक दल के नेता आलमगीर आलम को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दोनों कम मौकों पर ही साथ-साथ दिखते हैं। को-आर्डिनेटरों के साथ बैठक में अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव और आलमगीर आलम साथ-साथ दिखे। बैठक में कार्यकारी अध्यक्ष राजेश ठाकुर, केशव महतो कमलेश आदि भी लोगों के साथ नयी भूमिका में संपर्क बढ़ाते दिखे। बीते दिन रामगढ़ और सिमडेगा में संगठन की चूलें कसने पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने प्रदेश की कमान मिलने के बाद घोषणा की थी, कि जब तक भाजपा की सरकार रहेगी, वे माला नहीं पहनेंगे। इस लिहाज से तामझाम की संस्कृति से भरी-पूरी कांग्रेसी राजनीति में उठापटक को पीछे छोड़ने की उनकी कोशिश को कमोबेश बल मिलता दिख रहा है।
इन परिवारों में एक से ज्यादा टिकट की जरूरत
पिछले कई दिनों से कांग्रेस के कई दिग्गज अपने और अपने परिजनों के टिकट की जुगाड़ में भिड़े हैं। झारखंड में विधानसभा चुनावी चक्रव्यूह को भेदने का दंभ भरनेवाली कांग्रेस के नेता अपने परिजनों के लिए टिकट सुनिश्चत करने का जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में झारखंड से कांग्रेस की एक ही प्रत्याशी गीता कोड़ा को जीत मिली है। अब वह अपने पति और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को विधानसभा का टिकट दिलवाना चाहती हैं। इसके लिए वह लाबिंग भी कर रही हैं। इनके अलावा कई दिग्गज नेता परिवार के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय स्वयं एवं भाई के लिए रांची और हटिया सीट सुरक्षित कराना चाहते हैं। लोकसभा चुनाव में हजारीबाग सीट पर शिकस्त खानेवाले गोपाल साहू स्वयं एवं भाई के लिए टिकट चाहते हैं। सुखदेव भगत स्वयं विधायक हैं और नगर परिषद अध्यक्ष पत्नी के लिए भी टिकट चाहते हंै। पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव सिसई से दावेदार हैं। उनके पति अरुण उरांव भी टिकट चाहते हैं। इसी प्रकार राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने और दोनों पुत्रों के लिए भी टिकट चाहते हैं। मन्नान मल्लिक स्वयं अथवा पुत्र को धनबाद से टिकट दिलवाना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि दोनों पिता-पुत्र आसपास की सीटों पर ही चुनाव लड़ें। वहीं, पूर्व सांसद ददई उर्फ चंद्रशेखर दुबे खुद तो उम्मीदवार हैं ही, उन्हें बेटे के लिए भी टिकट चाहिए। उधर, पूर्व सांसद फुरकान अंसारी स्वयं भी लड़ना चाहते हैं और पुत्र इरफान अंसारी तो विधायक होने के नाते टिकट के दावेदार हैं ही। संथाल परगना में ही कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम स्वयं एवं अपने एक पुत्र के टिकट के लिए लगे हुए हैं। इसी प्रकार कोल्हान में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू को स्वयं एवं अपनी पुत्री के लिए भी टिकट चाहिए। गिरिडीह क्षेत्र में तिलकधारी सिंह अपने लिए और पुत्र धनंजय के लिए भी प्रयासरत हैं। वहीं, समरेश सिंह की दोनों बहुएं कांग्रेस में शामिल हो चुकी हैं और दोनों को ही टिकट चाहिए।
अब बदलेगी स्थिति
झारखंड कांग्रेस में टिकट के दावेदारों की फेहरिश्त लंबी है। दिलचस्प बात है कि अधिकांश दिग्गज सिर्फ एक ही टिकट से संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें अपने और परिजनों के लिए भी टिकट चाहिए। पर अब आलाकमान के निर्देश से स्पष्ट है कि स्थितियां बदलेंगी। अब गीताश्री उरांव को टिकट मिले और पति को नहीं, तो अरूण उरांव चुपचाप बैठेंगे नहीं, उनके मन में दूसरे दरवाजे का ख्याल जरूर आयेगा। इसी प्रकार ददई दुबे का तो चुनाव लड़ना तय है, पर क्या उनके पुत्र अपनी महत्वाकांक्षा को दबाये रहेंगे। राजेंद्र प्रसाद के तेज तर्रार पुत्र भी सिर्फ पिता को चुनाव लड़ते देख संतुष्ट होनेवालों में से नहीं हंै। इसी प्रकार फुरकान अंसारी भी विधायक पुत्र के लिए अपने राजनीतिक अरमानों की बलि तो नहीं चढ़ायेंगे। मन्नान मल्लिक के साथ भी कुछ ऐसा ही है। और अपने लिए राजनीतिक पद तलाश रहे प्रदीप बलमुचू की महत्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली पुत्री भी पार्टी की नीतियों को लेकर अपने राजनीतिक करियर पर बैरियर नहीं लगा सकती। इन हालात में पार्टी के अंदर भगदड़ मचे, तो बहुत आश्चर्य की बात नहीं होगी।
पदाधिकारियों की बढ़ी परेशानी, पड़े उलझन में
कांग्रेस आलाकमान ने स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी पदाधिकारी चुनाव नहीं लड़ेगा, जिसे लड़ना है, उसे पद छोड़ना होगा। इसे लेकर पार्टी पदाधिकारियों की उलझनें बढ़ गयी हैं। खुद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव और कार्यकारी अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, राजेश ठाकुर और मानस सिन्हा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे थे। उनके अलावा पार्टी के महासचिव आलोक दुबे, शमशेर आलम, कुमार राजा समेत कई जिलाध्यक्ष भी चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि पदाधिकारी चाहें, तो अपने पद का त्याग कर चुनाव लड़ सकते हैं। पर यह रिस्क लेना कौन चाहेगा। यदि चुनाव में असफल रहे तो, विधायकी भी जायेगी और पद भी। जाहिर है कि ज्यादा नकेल कसने पर वे दूसरे दलों के दरवाजे खटखटायेंगे। ऐसे भी लोकसभा चुनाव में हार के बाद कई नेता जगह तलाश रहे हैं।