टंडवा (चतरा)। सीसीएल की आम्रपाली एवं मगध कोल परियोजना स्थापना काल से ही देश और राज्य मे खूब सुर्खियां बटोर चुकी है। चाहे बात टेरर फंडिंग की हो या कोयले स्टॉक में आग लगने की, दोनों ही मामलों में पूर्व के अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध रही है। आम्रपाली कोल परियोजना से विस्थापित एवं प्रभावित क्षेत्रों में समग्र विकास योजना (सीएसआर) फंड से की जाने वाली विकास कार्य ठोस रूप से नजर नहीं आया। विकास का सारा पैसा कहां गया, यह भी जांच का विषय है। इस बार सीबीआइ के चंगुल में फंसकर कंपनी सुर्खियों में है। अधिकारियों के द्वारा पिछले पांच वर्षों से कोयले की क्वालिटी में हेर-फेर कर भारत सरकार को अरबों की चपत लगाने की बात सामने आ रही है। सीबीआइ पिछले तीन दिनों से सीसीएल की आम्रपाली कोल परियोजना क्षेत्र में दस्तक दे रही है। इससे हड़कंप मचा है। बताया जा रहा है कि सीसीएल आरओएम कोयला खरीदने वाले प्लांट को एसएम कोयले सप्लाई करती थी। इससे सरकार को प्रति टन लगभग 400 रुपये का नुकसान होता था। प्रति टन 400 रुपये प्लांट तथा अधिकारी के बीच बंदरबांट होती थी। सीसीएल अधिकारियों द्वारा पिछले पांच वर्षों से किये जा रहे इस महाघोटाला में केंद्र सरकार को 100 करोड़ से भी अधिक राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा है। सीबीआइ पिछले तीन दिनों से कार्यालयों में सभी कागजातों का जांच पड़ताल करने में जुटी है। इस दौरान आम्रपाली परियोजना में आरओएम पेपर से कोयला लोड सभी गाड़ियों की जांच की गयी। लोड गाड़ियों में एसएम कोयले की प्राप्ति पर सीबीआइ की जांच का दबाव सीसीएल पर और बढ़ गया। सीबीआइ के आदेशानुसार रविवार को पूरे परियोजना क्षेत्र में माइनिंग एवं कोयले की डिस्पैच पर रोक लगा दी गयी। बताया जा रहा है, कि अब सीबीआइ पिछले पांच वर्षों में कोयले की बीडिंग से लेकर कोयले के उत्पादन क्वालिटी की जांच करेगी तथा आरओएम कोयला के कुल बिडिंग डिस्पैच तथा उत्पादन में समानता पर आगे की जांच रखेगी।