रघुवर हों या हेमंत, बाबूलाल या फिर सुदेश, घर-बार सब छूटा
विधानसभा चुनावों से पहले चुनावी फीवर ने झारखंड के नेताओं का पसीना छुड़ा रखा है। नवंबर-दिसंबर में झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे मेें चाहे वह सत्तारूढ़ भाजपा और आजसू हो या फिर विपक्षी झामुमो, कांग्रेस और राजद तथा अन्य। सब अपने-अपने क्षेत्र में जनता और कार्यकर्ताओं से संवाद करने में जुटे हुए हैं। नेताओं की हालत तो यह है कि परिवार के लिए समय निकालना तो दूर दम मारने तक की फुर्सत उनके पास नहीं है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने जहां बीते चुनावों से अधिक सीटें जीतने की चुनौती है, वहीं विपक्षी दलों के सामने अपनी जीती हुई सीटों को बरकरार रखने की चुनौती है। चुनौती इतनी कड़ी है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सबके लिए अपनी अधिकतम सीमा तक खुद को चुनाव के मैदान में झोंक देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा है। हाल ये है कि राजनेता रात को सो भी रहे हैं तो उनके सपने में चुनाव आ रहा है। व्यस्तता इतनी है कि 24 घंटे में चार घंटे सोने के लिए वक्त निकालना भी उनके लिए मुश्किल हो रहा है। चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए कमोबेश सभी ने अपना-अपना घर त्याग दिया है। उनकी सुबह और रात क्षेत्र में ही हो रही है।
रघुवर के सामने अधिक से अधिक सीटें लाने की चुनौती
चुनावी समर में भाजपा की ड्राइविंग सीट पर होने के कारण मुख्यमंत्री रघुवर दास के समक्ष चुनौतियों को अवसर में बदलने का आसन्न चुनाव सुनहरा मौका है, पर इस अवसर में जोखिम भी है। उनके नेतृत्व में झारखंड में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार चली है, ऐसे में पार्टी की सीटें 37 से बढ़ा कर 65 से अधिक करने का पहाड़ जैसा टास्क पूरा करने की चुनौती रघुवर दास के पास है। जुनूनी स्वभाव के रघुवर दास ने इस काम में खुद को झोंक दिया है। हाल यह है कि उनका पूरा दिन संथाल में चुनावी सभाएं करते बीत रहा है। चुनाव से पहले भी संथाल विजय का लक्ष्य हासिल करने के लिए अपने पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने कम से कम 40 दफा संथाल का दौरा किया है। अपने छह दिनों की संथाल यात्रा के कार्यक्रम में वह 581 किमी की यात्राएं और 44 सभाएं करेंगे। संथाल के बाद कोल्हान में 25 सितंबर से वे जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ करेंगे। दुर्गा पूजा के पहले संथाल और कोल्हान की जनता को साधने का टफ टास्क उन्हें पूरा करना है। रघुवर दास के लिए यह चुनाव कठिन परीक्षा की घड़ी इसलिए भी है क्योंकि झामुमो ने भी अपना गढ़ बचाने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी है।
हेमंत सोरेन के सामने 19 सीटें बचाये रखने की चुनौती
झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन के लिए यह चुनाव दोहरी चुनौती पेश कर रहा है। एक तरफ उनके सामने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बचाये रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ अपने प्रबल प्रतिद्वंद्वी भाजपा और आजसू की राजनीतिक बमबारी से अपनी सीटें बचाये रखने की चुनौती है। भाजपा का 65 प्लस का अभियान तो झामुमो की रातों की नींद उड़ाये हुए है, क्योंकि भाजपा का यह लक्ष्य पूरा होता है तो सर्वाधिक नुकसान झामुमो को ही होगा। वर्ष 2009 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 18 सीटों पर विजय हासिल की थी, 2014 में इसमें मोदी लहर के बावजूद पार्टी ने एक सीट का इजाफा करते हुए 19 सीटें जीतीं। इससे उनकी प्रतिष्ठा बरकरार रही। पर बीते लोकसभा चुनावों में वर्ष 2014 में जीती गयी दो लोकसभा सीटों में से एक दुमका गंवाने के बाद से हेमंत सोरेन हिल गये हैं। पार्टी की बदलाव यात्रा के जरिये वह भाजपा के मुकाबले खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। 19 अक्टूबर को मोरहाबादी मैदान में होनेवाली महाबदलाव रैली को सफल करने की भी चुनौती उनके सामने है। पार्टी का मुखिया होने के कारण यह चुनाव उनके लिए नाक का सवाल बन गया है। होटल रैडिशन ब्लू में आयोजित पूर्वोदय में हेमंत ने अपनी चुनावी रणनीति का खुलासा नहीं किया पर पार्टी कितनी शिद्दत से अपनी तैयारियों में जुटी हुई है यह भी छिपी बात नहीं है।
पुराना प्रदर्शन दोहराना बाबूलाल के समक्ष चुनौती
भाजपा छोड़कर झाविमो का गठन करने के बाद झारखंड के पहले मुख्यमंत्री का पद सुशोभित कर चुके बाबूलाल मरांडी के झाविमो को विधायक तैयार करने की फैक्टरी कहा जाता था। उनकी फैक्ट्री का प्रोडक्ट इतना लुभावना होता था कि बीते विधानसभा चुनावों में भाजपा उसके आठ में से छह विधायकों को तोड़कर ले गयी। बाबूलाल मरांडी ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी पर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। अब बाबूलाल धुर्वा के प्रभात तारा मैदान में आयोजित होनेवाले जन समागम को सफल बनाने में जुटे हुए हैं। बंधु तिर्की उनके चुनावी अभियान के प्रमुख सिपहसालार की भूमिका में हैं। चुनावी समर में अपना दम-खम साबित करने के लिए झाविमो ने बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में पांच लाख सदस्य बनाने का लक्ष्य सफलतापूर्वक पूरा किया है। पार्टी अपनी आठ सीटों पर जीत हासिल करने का प्रदर्शन दुहराना चाहेगी और यह लक्ष्य बाबूलाल मरांडी की नींद उड़ाये हुए है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उनकी नजर भाजपा में टिकट बंटवारे पर टिकी हुई है। इस दौरान जो कद्दावर नेता भाजपा में टिकट हासिल करने से वंचित रह जायेंगे, उन्हें अपने टिकट पर लड़ाकर पार्टी चुनाव में अधिक से अधिक सीटों पर जीत हासिल करना चाहती है। इस बहाने झाविमो भाजपा से अपनी वह पुरानी खुन्नस भी निकालेगी जो भाजपा ने उसके विधायकों को तोड़कर की थी।
सुखदेव का हमलावर होना रामेश्वर के लिए मुसीबत
डॉ अजय के बाद प्रदेश कांग्रेस की गद्दी संभालनेवाले डॉ रामेश्वर उरांव के लिए लोहरदगा विधायक सुखदेव भगत का हमलावर होना मुसीबत बन गयी है। डॉ अजय को भगोड़ा बतानेवाला बयान भी उनके पक्ष में नहीं गया है। पूर्वोदय कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि वे सबको लेकर चलेंगे पर यह कथन करनी में परिवर्तित होता नहीं दिख रहा है। सुखदेव भगत तो मुखरता से उनका विरोध कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं के उत्साहवर्द्धन से लेकर उनमें नया जोश भरने की है। पर पार्टी बिखरी और कार्यकर्ताओं का उत्साह सुस्त हो गया है। डॉ अजय के जाने के बाद जो क्राइसिस मैनेजमेंट करने की जिम्मेवारी डॉ रामेश्वर उरांव को संभालनी थी, उसे करने में वह असफल लग रहे हैं। पार्टी में नयी उर्जा भरनी डॉ रामेश्वर उरांव की जिम्मेवारी है लेकिन अपनी उर्जा का इस्तेमाल वह कर नहीं पा रहे।
चुनौतियों के द्वार पर खड़े हैं सुदेश महतो
झारखंड की राजनीति में लगातार मजबूत हो रही आजसू के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिल्ली में अपने गढ़ में जीत हासिल करने की है। आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को अपना राजनीतिक रसूख बरकरार रखने के लिए उनके पास आसन्न चुनावों में सिल्ली से जीत हासिल करना अनिवार्य हो गया है।
इसके अलावा भाजपा के साथ अपने गठबंधन का रिश्ता सम्मानजनक स्तर पर रखने के लिए भी पार्टी को अधिक से अधिक सीटों पर जीताने की चुनौती है। सोनाहातू के जाड़ेया मैदान में आयोजित करम अखरा में सुदेश ने अपने क्षेत्र के लोगों को साधने की पुरजोर कोशिश की। इस कार्यक्रम के जरिये क्षेत्र के लोगों के बीच पार्टी का पुराना आकर्षण पैदा करने की उन्होंने पुरजोर कोशिश की पर चुनाव में यह और बिरसा आहार योजना तथा पेंशन प्लान कितना फायदा पहुंचा पायेगा यह भविष्य के गर्भ में है। पर इतना तय है कि पार्टी को आगे ले जाने के लिए सुदेश कोई कसर बाकी नहीं रख रहे और उन्हें उत्साह मिल रहा है उनकी सभाओं में जुटनेवाली भीड़ से।