झारखंड कैबिनेट से ”1932 खतियान” प्रस्ताव के पारित होते ही सरकार विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इस विधेयक को पास कराने की तैयारी कर रही है। लागू होने के बाद हेमंत सोरेन सरकार के कई लोग बाहरी हो जाएंगे।

झारखंड में स्थानीयता को एक बार फिर से परिभाषित करने की कोशिश शुरू हुई है। इसके पूर्व झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में ऐसी कोशिश हुई थी। फिर बवाल इतना बढ़ा कि बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री के पद से हाथ धोना पड़ा। झारखंड में एक बड़ी आबादी के पास 1932 का खतियान नहीं है। इसके दायरे में सांसद-विधायक भी आते हैं तो कैबिनेट के मंत्री भी। हेमंत सोरेन सरकार की आधी कैबिनेट बाहरी साबित हो जाएगी। एक आकलन के अनुसार 60 प्रतिशत आबादी के पास 1932 का खतियान नहीं होने की बात सामने आई है।

यहां अलग-अलग जिलों में भिन्न-भिन्न है सर्वे का वर्ष

दरअसल, झारखंड के कई जिलों में तो 1960 एवं 1970 में सर्वे हुआ है, 1932 में नहीं। इन जिलों के लोगों के सामने बड़ी समस्या आएगी। हालांकि, अभी राज्य सरकार के पास समय भी है। कैबिनेट में जारी संकल्प के आधार पर विधेयक तैयार करने के क्रम में त्रुटियों के निराकरण का प्रयास किया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार विधेयक को पास कराने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुला सकती है। उसी दौरान आरक्षण से संबंधित विधेयक भी पास कराने की कोशिश होगी।

 

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