रास्ते चलने से बनते हैं और लकीरें खींची जाने से। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपने कार्यों से झारखंड की राजनीति में ऐसी लकीर खींच दी है कि अब उससे बड़ी लकीर खींचना असंभव नहीं, तो मुश्किल जरुर हो गया है। उन्होंने विपक्ष से न सिर्फ झारखंड की राजनीति का एजेंडा छीन लिया है, बल्कि राजनीति का एजेंडा खुद सेट करके खेलना शुरू कर दिया है। यह एक परखी गयी सच्चाई है कि राजनीति में कई बार नेतृत्व ऐसे युगांतरकारी नेताओं के हाथों में आता है, जिसके बाद राजनीति की दिशा बदल जाती है। झारखंड की राजनीति में 28 दिसंबर 2014 एक ऐसा ही दिन था। इस दिन टाटा कंपनी में मजदूर से अपने जीवन की पारी शुरू करनेवाले रघुवर दास ने झारखंड का नेतृत्व संभाला और अपने निर्णयों से इतिहास बदल डाला। उन्होंने जो निर्णय लिये, उस पर विपक्ष ने उनकी आलोचना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पर धुन के पक्के रघुवर अपनी राह चलते रहे। उनके नेतृत्व में झारखंड में पहली बार स्थिर और मजबूत सरकार बनी और उस सरकार ने ऐतिहासिक काम किये। यह रघुवर सरकार का ही कमाल था कि जिस नक्सलवाद को झारखंड का कोई मुख्यमंत्री कम करने में भी विफल रहा था, उस पर रघुवर ने न सिर्फ नकेल कसी बल्कि करीब-करीब जड़ से ही उसका खात्मा कर दिया। 1995 में वह पहली बार जमशेदपुर पूर्वी से विधायक बने और उसके बाद से पीछे मुड़कर नहीं देखा। गरीबी का दंश करीब से महसूस कर चुके रघुवर राज्य के गरीबों का उद्धार करने में पीछे नहीं हैं। यही नहीं, अपने कार्यों से वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या अमित शाह, सबका दिल जीत चुके हैं। झारखंड की राजनीति में अपनी चमक बिखेरनेवाले रघुवर की राजनीति और उनके जीवन संघर्षों को रेखांकित करती दयानंद राय की रिपोर्ट।

अब झारखंड की राजनीति का एजेंडा सेट कर रहे हैं
लीडरशिप क्वालिटी होगी तो दिखेगी जरूर। चाहे वह आज दिखे, कल दिखे या बरस दो बरस के बाद दिखे। पर दिखती जरूर है। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी लीडरशिप क्वालिटी से भरे हुए तो पहले ही थे, पर जब उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर खुल कर खेलने और अपना विजन साबित करने का मौका मिला, तो उन्होंने कोई चूक नहीं की। अपने व्यवहार से वह न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के प्रिय बन गये, बल्कि झारखंड की राजनीति को अपने नेतृत्व से ऐसी करवट दी कि उसकी दिशा ही बदल गयी। मुख्यमंत्री बनने के बाद स्थानीय नीति हो या झारखंड में नक्सलवाद के खात्मे की मुहिम, उन्होंने अपना दम साबित किया और दिखा दिया कि मुख्यमंत्री का इकबाल क्या होता है। झारखंड भाजपा की स्टीयरिंग की कमान संभालनी हो या राज्य की जनता के अरमानों को समझना। राजनीति का हर फन उन्हें आता है। हालांकि विरोधी उनकी आलोचना करने से नहीं चूकते। पर रघुवर ऐसी आलोचनाओं से परे अपने काम में मस्त रहते हैं। उन्होंने 28 दिसंबर 2014 को झारखंड के मुख्यमंत्री की कमान संभाली थी और तब से उन्होंने अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा।

विपक्ष के नारे को कुंद किया
सबसे पहले तो उन्होंने झाविमो और कांग्रेस के उस नारे की धार कुंद कर दी, जो जल, जंगल और जमीन के नाम पर बरसों से भुनाया जाता रहा था। सबसे बड़ा जो काम रघुवर ने किया, वह यह था कि उन्होंने कभी केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा खुद से टूटने नहीं दिया। केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें जो भी टास्क दिया उसे रघुवर दास ने बढ़-चढ़कर पूरा किया और पार्टी विधायकों के बीच भी अपना इकबाल ऐसा साबित किया कि फिर उनकी नेतृत्व क्षमता पर उंगली उठानेवाला कोई बाकी ही नहीं रह गया। गाहे-बगाहे उनके निर्णयों को मंत्री सरयू राय ने चुनौती दी और असहमति का स्वर बुलंद करना चाहा पर जैसे रघुवर तो ऐसी बातों पर कान देना ही छोड़ चुके हैं। सरयू राय खुद पार्टी में कमोबेश हाशिये पर चले गये और रघुवर दास अपनी रीति और नीति पर बढ़ते चले जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री बनकर रचा इतिहास
28 दिसंबर 2014 को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखंड के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में नेतृत्व की कमान संभाली और इसके बाद अपने निर्णयों से झारखंड की राजनीति की दशा और दिशा बदल दी। उनके सत्ता संभालने के समय झारखंड में दो प्रमुख समस्याएं थीं। उनमें एक नक्सलवाद और दूसरा स्थानीय नीति की घोषणा न होना था। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बोल्ड डिसीजन लेते हुए पहले तो स्थानीय नीति घोषित कर विपक्ष को जोर का झटका धीरे से दिया और बाद में पुलिसिंग को बेहतर करते हुए केंद्र से मिले अर्द्धसैनिकों बलों के जरिये झारखंड में नक्सलवाद की कमर तोड़कर रख दी। उन्हीं के नेतृत्व में झारखंड में पहली बार एक स्थायी सरकार बनी जिसने निर्विघ्न अपना कार्यकाल पूरा किया। यह राजनीतिक अस्थिरता से राजनीतिक स्थिरता की ओर झारखंड के बढ़ने के दिन थे और यह कारनामा मुख्यमंत्री रघुवर दास ने ही अंजाम दिया।

कई मिथकों को तोड़ा
रघुवर झारखंड में कई अर्थों में नये माइलस्टोन स्थापित करनेवाले मुख्यमंत्री साबित हुए। उन्होंने झारखंड में आदिवासी मुख्यमंत्री के मिथक को तोड़ा और यह साबित कर दिया कि मुख्यमंत्री आदिवासी हो या गैर आदिवासी इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि जो मुख्यमंत्री बनता है, उसमें लीडरशिप क्वालिटी है कि नहीं।

बोल्ड फैसलों से बदली तस्वीर
इस बात से शायद ही किसी को इंकार हो कि मुख्यमंत्री रघुवर दास में लीडरशिप क्वालिटी कूट-कूट कर भरी हुई है। अपने भाषणोें में रघुवर अक्सर कहते हैं कि सरकार नारे से नहीं नीतियों से चलती है और यह रघुवर सरकार की नीतियों का ही कमाल था कि इज आॅफ डूइंग बिजनेस में झारखंड 33 वें स्थान से लंबी छलांग लगाकर चौथे स्थान पर पहुंच गया। उन्होंने ही राज्य में कृषि के लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया। ज्यूडिशियल एकेडमी में आयोजित झारखंड बीपीओ समिट में रघुवर दास ने कहा कि वर्ष 2014 से पहले झारखंड में केवल एक पॉलिसी थी। हमारी सरकार ने 18 नीतियां बनायी और आज हर सेक्टर के लिए नीति है। बीते चौदह सालों में झारखंड की छवि स्कैम्ड झारखंड की थी हमने इसे सुधार कर स्किल्ड झारखंड बनाया। हमने वैश्विक समिट किया और उससे राज्य में विकास का माहौल बना। बीते साढ़े चार वर्षों में झारखंड में 67,000 करोड़ का निवेश हुआ है। रघुवर दास करिश्माई नेतृत्व क्षमता के मालिक बन पाये तो इसके पीछे उनकी वर्षों की तपस्या है। दरअसल, संघर्षों ने रघुवर दास को इतना मांज डाला है कि उनका व्यक्तित्व किसी हीरे सा चमकने लगा है और इस चमक के आगे सबकी चमक फीकी पड़ रही है।

चुनौतियों को अवसर में बदलना जानते हैं

रघुवर दास की बड़ी खासियत यह है कि वे चुनौतियों को अवसर में बदलना बखूबी जानते हैं। जब वह जमशेदपुर पूर्वी से पहली बार विधायक बने तो उसके बाद उन्होंने क्षेत्र की जनता के लिए ऐसे कार्य किये कि जनता का उनसे फिर कभी मोह भंग नहीं हो सका। उन्हें परेशान करने के लिए विपक्ष ने उनपर बाहरी मुख्यमंत्री होने का आरोप लगाया पर रघुवर इसे नजरअंदाज कर अपने काम में अडिग रहे। उनपर गुस्सैल मुख्यमंत्री होने का भी आरोप लगता था पर उन्होंने इस धारणा को न सिर्फ बदला बल्कि अपने चेहरे पर वह मुस्कान ले आये जिससे वह सबका दिल जीत सकते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जनसंवाद कार्यक्रम से जनता और शासन के बीच की दूरी को न सिर्फ पाटा बल्कि इसकी समीक्षा कर शासन की पहुंच से छूटे लोगों को उनका हक भी दिलाया।

साहित्य में दिनकर को आदर्श मानते हैं
साहित्य में रामधारी सिंह दिनकर को अपना आदर्श मानने वाले रघुवर राजनीति में जय प्रकाश नारायण को अपना आदर्श मानते हैं। इमरजेंसी के दौरान वे जेल भी जा चुके हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन का जमशेदपुर में रघुवर दास ने नेतृत्व किया था। इस दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करके गया जेल भेजा जहां कई वरीय नेताओं से उनकी मुलाकात हुई। रघुवर दास ने 1977 में जनता पार्टी ज्वाइन की और 1980 में भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक बने। इसी साल मुंबई में आयोजित भाजपा की वन नेशन कमिटी की बैठक में भी उन्होंने हिस्सा लिया। इसके बाद वह सीतारामडेरा के मंडल प्रमुख बने। राजनीति में अपनी मेहनत से उन्होंने धीरे-धीरे पर स्थायी तरक्की की और पहले जमशेदपुर भाजपा के सचिव और बाद में उपाध्यक्ष बन गये। इसके बाद विधायक, नगर विकास मंत्री और उपमुख्यमंत्री के बाद झारखंड का मुख्यमंत्री बनने का सफर तय किया।

केएन गोविंदाचार्य ने परखी थी प्रतिभा
हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई नक्षत्र पुरुष आता है और वह उसके जीवन की दिशा और दशा बदलकर रख देता है। यदि कालजयी कवि डॉ हरिवंश राय बच्चन के जीवन में वह नक्षत्र पुरुष डॉ अमरनाथ झा थे तो रघुवर दास के जीवन में वह भाजपा के थिंक टैंक कहे जानेवाले केएन गोविंदाचार्य। उन्होंने पहली नजर में ही रघुवर की नेतृत्व क्षमता को परख लिया था। इसके बाद उन्होंने जमशेदपुर पूर्वी के सीटिंग विधायक दीनानाथ पांडेय का टिकट काटकर रघुवर को दिया और रघुवर ने अपने कार्यों से फिर यह साबित कर दिया कि केएन गोविंदाचार्य का निर्णय गलत नहीं था। वर्ष 1995 में पहली बार जमशेदपुर पूर्वी सीट से रघुवर विधायक बने और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद लगातार पांच बार वे इस क्षेत्र से जीते और विधायक बने। अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार में वह नगर विकास मंत्री रहे। 30 दिसंबर 2009 से 29 मई 2010 तक शिबू सोरेन के नेतृत्व में चल रही सरकार में वह डिप्टी सीएम रहे। उनके राजनीतिक जीवन में उफान तब आया जब 28 दिसंबर 2014 को वह झारखंड के दसवें और गैर आदिवासी सीएम के रूप में पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद झारखंड में सबसे लंबी अवधि तक सबसे मजबूत सरकार चलाने का रिकार्ड भी उनके नेतृत्व में चल रही सरकार ने कायम किया। झारखंड में जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं उसमें 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद यदि भाजपा की सरकार बनती है तो निश्चित रुप से अगले मुख्यमंत्री रघुवर दास ही होंगे। इसकी संभावना इसलिए भी है क्योंकि अपने काम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह का जो भरोसा रघुवर दास ने जीता है उसका प्रतिफल उन्हें कुछ इसी रूप में मिलना है।

झारखंड को नया विधानसभा भवन दिया
यह मुख्यमंत्री रघुवर दास के करिश्माई नेतृत्व का ही कमाल था कि जो झारखंड बीते 18 सालों से नये विधानसभा भवन को तरस रहा था उसे कुटे में नया विधानसभा मिला। यही नहीं कुटे के विस्थापितों के विश्वास पर खरा उतरते हुए उन्हें आवास देने के वादे पर भी मुख्यमंत्री खरे उतरे।
झारखंड की जनता को सरकार की योजनाओं का लाभ मिले इसके लिए भी मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अथक प्रयास किये। उनके कार्यकाल में राज्य के 38 लाख घरों तक बिजली पहुंची। नये ग्रिड बने और बिजली वितरण का नेटवर्क सुदृढ हुआ। केंद्र की आयुष्मान भारत योजना का लाभ 57 लाख परिवारों को मिला और झारखंड में कृषि की जो ग्रोथ उनके शासन संभालने के पहले तक नेगेटिव थी वह बढ़कर 14 फीसदी हो गई। यह उनकी दूरदृष्टि का ही नतीजा था कि राज्य के किसानों को कृषि में नयी तकनीक के उपयोगों से परिचित कराने के लिए इजरायल भेजा गया। राज्य में नये मेडिकल कॉलेज खुले और गरीबों को आवास आसानी से मिलना सुलभ हुआ। भाजपा के सबका साथ सबका विकास के नारे को चरितार्थ करते हुए रघुवर दास के नेतृत्व में ही झारखंड के मुसलमानों को कडरु में हज हाऊस की शानदार बिल्डिंग का तोहफा मिला। उन्होंने ऐसी फिल्म नीति बनायी कि चाहे वह अनुपम खेर जैसे अभिनेता हो या कोई और कलाकारों और डायरेक्टरों की भीड़ झारखंड की ओर खींचकर चली आनी शुरु हो गयी।

जनता हो या कार्यकर्ता सबको रीड करते हैं
मुख्यमंत्री रघुवर दास की नेतृत्व क्षमता का सबसे विलक्षण पक्ष यह है कि वे जनता हो या पार्टी कार्यकर्ता सबके मूड को रीड कर लेते हैं और त्वरित निर्णय लेते हैं। अपनी रीड करने की खूबी को कई बार वह अपने भाषणों में उद्घाटित भी करते हैं। रघुवर दास के मुख्यमंत्री बनने के बाद झारखंड की राजनीति का एजेंडा या तो झामुमो या फिर कांग्रेस तय करता था। जल, जंगल और जमीन के नारे के साथ यह एजेंडा सेट होता था। पर रघुवर दास ने विपक्ष से उसकी राजनीति की यह जागीर छीन ली और इस नारे को प्रभावहीन कर दिया। रघुवर ने विकास का नारा दिया और इस नारे को प्रभावी बनाकर दिखा दिया। झामुमो के जल के नारे के जवाब मेें उन्होंने संथाल में लोगों को शुद्ध पानी दिया। जंगल के जवाब में उज्ज्वला योजना के तहत घर-घर गैस सिलिंडर और चूल्हा दिया। इसके बाद भी जिन्हें दूसरा सिलिंडर भरने में दिक्कत आयी तो उन्हें दूसरा सिलिंडर दिया। इसके बाद जमीन का नारा भी प्रभावहीन होता चला गया और भाजपा का सबका साथ सबका विकास का नारा रघुवर के नेतृत्व में झारखंड की जनता के सिर चढ़कर बोलने लगा। उन्हीं के कार्यकाल में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में महागठबंधन के बाद भी 14 में से बारह सीटें जीतीं और विपक्ष को पानी पिलाकर छोड़ा।

मोदी हों या शाह, सबकी कसौटी पर खरे उतरे
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने केंद्र की योजनाओं को झारखंड में इस खूबसूरती से संचालित किया कि 12 सितंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड को कई योजनाओं की सौगात देने रांची आये और प्रभात तारा मैदान में जनता को संबोधित किया तो उन्होंने खास तौर से यह कहा कि रघुवर दास मेरे प्रिय मित्र हैं। सवाल सिर्फ प्रधानमंत्री का दिल जीतने का ही नहीं था, अमित शाह ने भी रघुवर की तारीफ की और फिर चाहे वह जेपी नड्डा हों या सुधांशु त्रिवेदी केंद्र से जो भी झारखंड आता वह रघुवर दास की तारीफ करके ही जाता दिखता है। जाहिर है कि ये तारीफें यूं ही नहीं होतीं। इसके लिए मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अथक मेहनत की है और अब भी कर रहे हैं। चाहे संथाल और कोल्हान का दौरा हो या मुख्यमंत्री जनसंवाद में बैठकर जनता की समस्याएं सुनना रघुवर अपना हर काम खूबसूरती से अंजाम देते हैं और यह इंश्योर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि वह काम अपनी पूर्णाहूति तक पहुंच जाये।

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