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    Home»Breaking News»पीके के बोल, ममता का शोर, कांग्रेस का झोल
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    पीके के बोल, ममता का शोर, कांग्रेस का झोल

    azad sipahiBy azad sipahiOctober 30, 2021No Comments6 Mins Read
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    राजनीति : विपक्षी एकता के नये सूत्रधार बनने की कोशिश कर रहे हैं ममता के सलाहकार!

    पिछले करीब एक दशक में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ‘राजनीतिक परामर्श’ और ‘चुनावी रणनीतिकार’ जैसे पेशे को लोकप्रिय बनानेवाले पीके, यानी प्रशांत किशोर ने देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर बेबाक टिप्पणी कर नयी किस्म के विवाद को जन्म दे दिया है। भाजपा को दशकों तक मजबूत बने रहने और राहुल गांधी को भ्रम में नहीं रहने की बात कह कर उन्होंने इतना तो साफ कर दिया है कि भारत की राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में अकेले वही सटीक और बेबाक आकलन कर सकते हैं। लेकिन पीके के इस बयान से यह संकेत भी मिलता है कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं दिन प्रतिदिन परवान चढ़ रही हैं और 2024 के चुनाव को लेकर वह अपनी रणनीति बनाने में जुट हुए हैं। भाजपा और कांग्रेस के बाद जदयू और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करनेवाले पीके ने हालांकि बंगाल चुनाव के बाद यह पेशा छोड़ने का एलान किया था, लेकिन हाल के दिनों में उनकी राजनीतिक मुलाकातों ने उनकी महत्वाकांक्षा को स्पष्ट किया है। पीके का ताजा बयान स्वाभाविक रूप से भाजपा के लिए आत्मविश्वास बढ़ानेवाला है, तो कांग्रेस और उसे विपक्षी एकता की धुरी माननेवाली पार्टियों ने इससे असहमति जतायी है। लेकिन पिछला अनुभव बताता है कि पीके बिना किसी निहितार्थ के कोई टिप्पणी नहीं करते और उनका राजनीतिक आकलन न केवल यथार्थ के करीब होता है, बल्कि कई बार तो अक्षरश: सत्य भी हो जाता है। पीके की ताजा टिप्पणी के राजनीतिक मतलब और उसके असर का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।

    चुनावी रणनीतिकार और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आइपैक) के प्रमुख प्रशांत किशोर एक बार फिर चर्चा में आ गये हैं। पिछले करीब एक दशक से भारतीय राजनीति के इस चर्चित रणनीतिकार ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी आनेवाले दशकों तक राजनीति में मजबूत ताकत बनी रहेगी। जिस तरह से करीब छह दशकों तक कांग्रेस सत्ता का केंद्र रही, उसी तरह भाजपा भी सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी, चाहे चुनाव हारे या जीते। पीके का मानना है कि भाजपा से कई दशकों तक कांग्रेस और अन्य दलों को लड़ना होगा। उनका मानना है कि एक बार जब कोई राष्ट्रीय स्तर पर 30 फीसदी वोट हासिल कर लेता है, तो इतनी जल्दी राजनीतिक तस्वीर से नहीं हटता। पीके ने राहुल गांधी को इस भ्रम में नहीं रहने की सलाह भी दी है कि भाजपा कमजोर हो रही है। उन्होंने कहा है कि राहुल जैसा समझते हैं, वैसा होने वाला नहीं है। शायद उन्हें लगता है कि बस कुछ समय में लोग नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटा देंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। किशोर ने कहा कि जब तक आप मोदी की ताकत का अंदाजा नहीं लगा लेते, आप उन्हें हराने के लिए कभी भी काउंटर नहीं कर पायेंगे। ज्यादातर लोग उनकी ताकत को समझने में समय नहीं लगा रहे हैं। जब तक आप यह ना समझ जायें कि ऐसी कौन सी चीज है, जो उन्हें लोकप्रिय बना रही है, तब तक आप उनको काउंटर नहीं कर पायेंगे।

    पीके का यह बयान ऐसे समय आया है, जब वह 2024 के चुनाव को भाजपा बनाम विपक्ष बनाने में जुटे हुए हैं। इस साल मई में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का परिणाम घोषित होने के बाद पीके ने चुनावी रणनीति के अपने धंधे से संन्यास का एलान किया था, लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद वह पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, राकांपा नेता शरद पवार और राहुल-प्रियंका से मुलाकातों के जरिये फिर चर्चा के केंद्र में आ गये। अब उनका ताजा बयान राहुल गांधी के बारे में उनके इस आकलन को पुष्ट करता है कि कांग्रेस के युवराज का कद अभी मोदी के मुकाबले बहुत छोटा है। पीके के बयान का राजनीतिक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि वह खुद इस रोल में फिट होने की कोशिश कर रहे हैं।

    अपने युवराज के बारे में पीके की टिप्पणी का कांग्रेस ने स्वाभाविक रूप से विरोध किया है। पार्टी ने कहा है कि पीके कांग्रेस में पद पाने की गुहार लगा रहे थे और जब नहीं मिला, तो फिर भाजपा की तारीफ शुरू कर दी। एक और भक्त का मुखौटा उतर गया है। कांग्रेस ने आश्चर्य जताया कि क्या ये टिप्पणियां चुनाव रणनीतिकार, टीएमसी और भाजपा के बीच पर्दे के पीछे की समझ की ओर इशारा करती हैं। दूसरी तरफ टीएमसी ने कहा है कि पीके पार्टी के सदस्य नहीं हैं और बयान उनके निजी हैं। इधर भाजपा ने कहा कि पूरा देश प्रशांत किशोर के बयान से सहमति रखता है, क्योंकि राजनीतिक गलियारों में वह मशहूर हैं।

    प्रशांत किशोर ने इस वर्ष पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के लिए जीत की रणनीति तैयार की थी और दोनों ही दलों ने अपने-अपने राज्यों में जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2014 के आम चुनाव में भाजपा को और फिर 2015 में बिहार में नीतीश कुमार को सत्ता तक पहुंचाने में प्रशांत किशोर ने अहम भूमिका निभायी थी। बिहार चुनाव में जदयू की सफलता ने पीके की प्रसिद्धि को बहुत ऊंचाई पर पहुंचा दिया था, हालांकि उसके बाद नीतीश के साथ उनकी दूरी बढ़ती गयी।

    इस तरह प्रशांत किशोर एक बार फिर चर्चा में हैं। बेशक वह बेहद प्रतिभाशाली हैं, तकनीकी रूप से रणनीति बनाने में माहिर हैं, लेकिन राजनीति में केवल यही दो चीज मुख्य नहीं हैं। भारतीय राजनीति की समझ रखनेवाले लोग कह रहे हैं कि पीके खुद को राजनीतिक दलों और यहां तक कि भारतीय राजनीति से खुद को ऊपर समझने की भूल कर रहे हैं। खुदमुख्तारी का उनका प्रयास उनकी दुकानदारी को बंद कर सकता है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि शुद्ध रूप से अपनी दुकान चमकाने के लिए भारत आये प्रशांत किशोर को इतनी अहमियत क्यों मिल रही है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्रशांत किशोर एक व्यवसायी हैं और राजनीति उनके लिए अपनी दुकान का साइन बोर्ड मात्र है। इस साइन बोर्ड पर वह मौका देख कर कमल का फूल लगाते हैं, तो कभी पंजा और कभी तीर। अभी उनके साइन बोर्ड पर तृणमूल कांग्रेस का प्रतीक चिह्न अंकित हो गया है। तो फिर उनके खिलाफ कोई भी राजनीतिक दल क्यों स्टैंड नहीं लेता। पीके का उदय भारतीय राजनीति के उस युग के अंत का प्रतीक है, जिसके केंद्र में आदर्श, विचारधारा, कार्यकर्ता और जनता नाम की चीज हुआ करती थी। अब, जबकि पीके की हिंदी पट्टी की राजनीति से विदाई हो चुकी है, यह उम्मीद तो बंध ही गयी है कि राजनीति पुरानी लीक पर लौट आयेगी। उस पुरानी लीक पर, जिसमें कार्यकर्ता होते हैं, जनता होती है और नीतियों-आदर्शों और विचारधारा की बात होती है।

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