विशेष
यस वी कैन के भाव से लगना होगा प्रदेश के नेताओं को
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
हरियाणा में हुए विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने के बाद भाजपा में स्वाभाविक तौर पर एक उत्साह है। इस परिणाम के बाद दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व यह मान चुका है कि उसकी चुनाव मशीनरी और रणनीति लगभग अपराजेय है। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि यह अपराजेय मशीनरी और मजबूत व्यूह रचना झारखंड आकर कमजोर क्यों पड़ जाती है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अब भी उन कारणों की तलाश में जुटा है, जो 2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड में पार्टी की हार का कारण बने। केंद्रीय नेतृत्व के कहने पर भाजपा की प्रदेश इकाई भी अब मिशन मोड में आ गयी है। झारखंड फतह के लिए भाजपा ने अपने दो सबसे काबिल नेताओं, शिवराज सिंह चौहान और हिमंता बिस्वा सरमा को तैनात कर दिया है। ये दोनों पूरी मुस्तैदी से अपना काम भी कर रहे हैं। उन्होंने प्रदेश भाजपा में नयी जान भी फूंकी है। लेकिन झारखंड की एक रोचक कहानी है, जो बार-बार आंकड़ों के माध्यम से सामने आती रही है। यह कहानी यह है कि जब-जब प्रदेश भाजपा पूरी तरह केंद्रीय आलाकमान पर आश्रित हुई है, परिणाम आशाजनक नहीं आये हैं। झारखंड में अब तक हुए चार विधानसभा चुनावों में यह बात पूरी तरह साबित हुई है। न केवल विधानसभा चुनाव में, बल्कि लोकसभा चुनाव में भी यह कहानी चरितार्थ हुई है। जिन राज्यों में प्रदेश भाजपा ने अपनी ओर से एड़ी चोटी का जोर लगाया, वहां परिणाम आशानुरूप रहे, जहां की स्थानीय इकाई पूरी तरह आलाकमान पर डिपेंड हो गयी, वहां परिणाम आशानुरूप नहीं रहे। उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्यों के परिणामों को सामने रखा जा सकता है। झारखंड में अब तक हुए चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े भी यही कहते हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि झारखंड फतह के लिए भाजपा को ‘झारखंडी’ बनना होगा। अब तक के परिणामों के आधार पर क्या कुछ हासिल होता रहा है भाजपा को बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

भारतीय जनता पार्टी को भारतीय सियासत की ‘चुनावी मशीन’ कहा जाता है, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी हमेशा चुनावी मोड में रहती है और इसका चुनाव जीतने का ट्रैक रिकॉर्ड लगभग अपराजेय रहा है। ऐसे में जब 2024 के आम चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने के बाद और हाल ही में हरियाणा में भी इतिहास बनाते हुए लगातार तीसरी बार सत्ता पाने के बाद पार्टी के भीतर की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पार्टी अगले चुनाव, यानी झारखंड और महाराष्ट्र में तैयारियों में जुटी हुई है। उसे अब यह विश्वास हो गया है कि उसकी चुनाव मशीनरी और व्यूह रचना अपराजेय है। हालांकि यह बात भी सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को चुनाव में हार-जीत का खट्टा-मीठा अनुभव भी होता रहता है, लेकिन भाजपा के शब्दकोश में चुनावी हार लगभग अस्वीकार्य माना जाता है। इसलिए पार्टी झारखंड में आसन्न विधानसभा चुनाव को गंभीरता से ले रही है, क्योंकि 2019 में यहां हार का सामना करने के बाद से उसके रुख में एक बदलाव साफ दिखने लगा है। केंद्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर पर भी इस बदलाव को महसूस किया जा सकता है।

भाजपा के लिए झारखंड एक ऐसा प्रदेश है, जो उसका मजबूत गढ़ माना जाता था। एक समय यह कहावत प्रचलित थी कि नागपुर के बाद अब अगर भाजपा का कोई सबसे मजबूत गढ़ है, तो वह है छोटानागपुर। लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर होने के बाद यह गढ़ दरक गया। इसलिए इस बार पार्टी कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है। पार्टी ने 2024 के आम चुनावों के परिणाम के बाद ही झारखंड पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया और चुनाव की तैयारी में जुट गयी। पार्टी ने इस बार झारखंड की सत्ता दोबारा हासिल करने का संकल्प व्यक्त किया है और इसके लिए उसने बहुआयामी व्यूह रचना तैयार की है। लेकिन पार्टी ने झारखंड में अब तक हुए विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का सही ढंग से विश्लेषण करने में थोड़ी जल्दबाजी दिखायी है।

क्या कहते हैं झारखंड के चुनावी आंकड़े
झारखंड में अब तक चार बार विधानसभा के चुनाव हुए हैं। इनमें से दो बार यहां त्रिशंकु विधानसभा बनी, जबकि 2014 और 2019 में क्रमश: भाजपा-आजसू को और झामुमो-कांग्रेस-राजद को स्पष्ट बहुमत मिला। राज्य में पहली बार 2005 में विधानसभा का चुनाव हुआ था। उसमें भाजपा ने 63 सीटों पर चुनाव लड़ा और 23.57 प्रतिशत वोट पाकर 30 सीटें जीतने में कामयाब हुई। उस चुनाव में रणनीति से लेकर प्रत्याशी चयन तक की सारी जिम्मेदारी प्रदेश नेतृत्व को सौंपी गयी थी। इसके बाद 2009 में विधानसभा के दूसरे चुनाव में भाजपा ने 67 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और महज 20.18 प्रतिशत वोट हासिल कर 18 सीटें ही जीत सकी। उस चुनाव में तमाम व्यवस्थाएं आलाकमान ने अपने हाथ में ले ली थीं। पार्टी ने सरकार तो बनायी, लेकिन स्पष्ट बहुमत नहीं होने के कारण उसे फैसले लेने में कठिनाई हुई। फिर आया 2014, जब भाजपा के पास नरेंद्र मोदी नामक करिश्माई नेतृत्व आया। लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद उसका विजय रथ राज्यों में भी दौड़ने लगा। बदलाव के उस दौर में झारखंड में भाजपा को ऐतिहासिक जीत हासिल हुई। उसने 72 सीटों पर चुनाव लड़ा और 31.26 प्रतिशत मत हासिल कर 37 सीटें जीत लीं। उस चुनाव की खास बात यह थी कि उसमें नीतियां केंद्रीय नेतृत्व ने बनायीं और उसे लागू करने की जिम्मेदारी प्रदेश इकाई को दी गयी। इस रणनीति का अच्छा असर देखने को मिला। लेकिन 2019 आते-आते प्रदेश इकाई नाम की कोई बात नहीं रह गयी और सब कुछ वन टू वन हो गया। सारे फैसले मुख्यमंत्री के स्तर पर लिये जाने लगे। टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी चक्रव्यूह की रचना तक की पूरी जिम्मेदारी पार्टी की जगह सीएम के हाथों में चली गयी। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि आलाकमान ने पावर एक व्यक्ति के हाथ में पूरी तरह सौंप दिया। हालत यह हो गयी कि तत्काली प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा मात्र रबर स्टंप बन कर रह गये। चुनाव सिर पर होने के बावजूद वह सरकार के स्तर पर कोई फैसला नहीं करा सके। उनके पास न तो फैसला लेने की ताकत बची और न ही हौसला। इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी 79 सीटों पर चुनाव लड़ कर 33.37 प्रतिशत वोट तो ले आयी, लेकिन उसे केवल 25 सीटें मिलीं और वह सत्ता से बाहर हो गयी।

झारखंड भाजपा में यह है समस्या
सतही तौर पर भाजपा की चुनावी रणनीति तो बेहद ठोस दिखती है, लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और हो जाती है। झारखंड भाजपा मोदी-शाह के बाहरी आवरण में बंधे होने के कारण एक तो दिखाई देती है, लेकिन अंदर ही अंदर पार्टी कई खेमों में बंटी नजर आती रही है। अगर झारखंड में भाजपा की गाड़ी को फिर से पटरी पर लानी है, तो प्रदेश के नेताओं में नयी ऊर्जा का संचार करना होगा। उन्हें पहली कतार में लाकर जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने पूरी मेहनत से एक जमीन तैयार की है, लेकिन उस जमीन पर गाड़ी दौड़ाने की जिम्मेवारी सामूहिक रूप से सबको लेनी होगी। ऐसा नहीं है कि पार्टी राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय नहीं रही है। विधानसभा के भीतर पार्टी ने विपक्ष की भूमिका शानदार तरीके से निभायी है, लेकिन आसन्न चुनावों को देखते हुए पार्टी के भीतर ‘कुछ’ सुधारने की जरूरत विभिन्न स्तरों पर महसूस की जा रही है। जब तक हर चेहरा इस भाव से मैदान में नहीं उतरेगा कि यस वी कैन, तब तक चुनावी राह आसान नहीं होगी।

 

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