विशेष
कांग्रेस बैकफुट पर, कैसे मांगेगी गठबंधन में ज्यादा सीटें
जमीन पर जो काम करेगा, वही जीतेगा
सोशल मीडिया नहीं सोशल होना पड़ेगा नेताओं को
मतदाता हैं तैयार, बना चुके हैं मन
आजाद सिपाही के झारखंड भ्रमण कार्यक्रम के दौरान मैसेज
भाजपा के लिए मैसेज: अभी भी वक्त है गांव घुसिए, इंतजार कर रहे हैं मतदाता
जेएमएम के लिए मैसेज: सीटों पर दिखानी होगी सक्रियता
कांग्रेस के लिए मैसेज: काम ज्यादा, उड़िये कम
आजसू के लिए मैसेज: बढ़ानी होगी सक्रियता
जयराम: लगे रहिये, अग्रेशन से बचिए

नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
हरियाणा में भाजपा की लगातार तीसरी जीत के बाद झारखंड भाजपा भी उत्साहित है। हरियाणा का चुनाव परिणाम महज एक राज्य के चुनावी परिणाम के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका मैसेज बहुत बड़ा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी आधी सीट लूज कर दी थी। इसका बहुत बड़ा कारण था कांग्रेस द्वारा यह प्रचार कि भाजपा अगर फिर से सत्ता में आयी तो संविधान बदल देगी, आरक्षण कम कर देगी। राहुल गांधी पूरे देश में लाल रंग की संविधान की किताब लेकर घूमते थे और मंच पर दिखाते फिरते थे। देश का एक बड़ा तबका उनके झांसे में आ गया। वहीं इस साल लोकसभा चुनाव से पहले धन की कमी का रोना रो रही कांग्रेस ने चुनाव आयोग को बताया है कि इस बार के लोकसभा चुनाव और चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसने चुनाव प्रचार पर करीब 585 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। और तो और, पार्टी ने अपने स्टार प्रचारकों की हवाई यात्राओं पर 105 करोड़ रुपये खर्च किये। इसमें हरियाणा अभी शामिल नहीं है। लेकिन आम जनता में क्या मैसेज परोसा गया कि भाजपा पूंजीपतियों की पार्टी है, और इंडी तो गरीबों की ध्वजारोहक है। 99 सीटें लाकर भी कोई पार्टी 240 वालों से अपनी तुलना करने लगे तो उनकी समझ कितनी है, समझा जा सकता है। इनको समझना होगा कि 543 में 99 रैंक नहीं आया है, मार्क्स आया है। यह 240 से कम होता है। यानी फेल। लेकिन कांग्रेस इसे मानना नहीं चाह रही थी, तो हरियाणा वालों से अच्छे से समझा दिया। हरियाणा में भाजपा की बेहतरीन जीत का असर अब झारखंड जैसे राज्य में भी देखने को मिल सकता है, जहां साल के अंत में चुनाव होना है। यहां भी कई दल सोशल मीडिया पर समा बांधे हुए हैं। सोशल मीडिया पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। यहां इस साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा 11 से 8 पर आ गयी। लेकिन फिर भी भाजपा ने हौसला नहीं खोया। आलाकमान ने प्रदेश नेतृत्व पर भरोसा कायम रखा, क्योंकि आलाकमान को पता है कि झारखंड की कमान मंजे हुए हाथों में है। और भाजपा का ऐसा हाल देश के कई राज्यों में हुआ है। वजह सबको पता था कि भाजपा कांग्रेस या इंडी गठबंधन द्वारा दुष्प्रचार के जाल को सही तरीके से भेदने में कामयाब नहीं हो पायी। नतीजा यह हुआ कि भाजपा अकेले दम पर बहुमत के आंकड़े को नहीं छू सकी। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद जनता को यह एहसास हो गया कि उससे गलती हो गयी। खैर झारखंड में अब कांग्रेस की स्थिति इंडी गठबंधन में कमजोर होनेवाली है। जिस हिसाब से कांग्रेस हेमंत सोरेन के सामने तन कर खड़ी थी और पिछली बार से ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी पेश कर रही थी, हरियाणा चुनाव परिणाम के बाद अब वह जमीन पर आयेगी। अब कोई भी कांग्रेसी ढाई-ढाई साल सरकार चलाने की बात नहीं करेगा। अब तो हेमंत सोरेन से बोलेगा हुजूर जो देना है दे दो। झारखंड में हरियाणा चुनाव परिणाम का कांग्रेस कतना पड़ेगा असर और फिलहाल झारखंड के मतदाता क्या सोच रहे हैं बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

झारखंड देश के सभी राज्यों से भिन्न है। यहां के मतदाता कन्फ्यूजन में नहीं रहते हैं। वे स्पष्टवादी हैं। भले आपके सामने वे मुखर नहीं हों, लेकिन अपने समाज में वे स्पष्ट मैसेज दे देते हैं। झारखंड भ्रमण के दौरान मैंने झारखंड का मिजाज तो पढ़ लिया है और यह भी ज्ञात हो गया कि किस दल की कितनी पैठ जनता के बीच है। फिलहाल चुनाव पूर्व कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो न कही जायें तो बेहतर। हां इतना जरूर है कि मतदाता दलों को लेकर क्या सोचते हैं यह लिखा ही जा सकता है। भ्रमण के दौरान दो बातें जो साफ तौर पर नजर आयी वो ये कि इंडी गठबंधन के मतदाता कांग्रेस से ज्यादा जेएमएम की ओर शिफ्ट हो रहे हंै। उन्हें जेएमएम पर ज्यादा भरोसा है। यहां तक की मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से ज्यादा जेएमएम को तब्बजो दे रहे हैं। वहीं भाजपा के लिए अच्छी खबर यह है कि उसके मतदाता भारी संख्या में हैं। लेकिन उसकी रीच उन तक नहीं होने से वे वोटर्स शिफ्ट होते रहते हैं। मतदाता भी चाहता है कि जिस दल का वह सपोर्ट कर रहा है उसके नुमाइंदे वहां तक पहुंचें। मैं इंटीरियर्स की बात कर रहा हूं। भाजपा के मतदाताओं की संख्या देख मैं भी चौंक गया था। सोचने पर मजबूर भी हुआ कि इतनी भारी मात्रा में समर्थकों के बावजूद भाजपा को आखिर आयातित नेताओं की जरूरत क्यों पड़ती है। लेकिन इसका जवाब जनता ने खुद ही बता दिया। भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं को बूस्टअप करने की जरूरत है। कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे एक्टिव हो सकें, उस पर फोकस करने की जरूरत है। वोटर्स तो भरे पड़े हैं। बस उसे कन्वर्ट करने की जरूरत है।

हरियाणा चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा खेमा उत्साहित नजर आ रहा है। बाबूलाल मरांडी भी मांदर बजाते नजर आये और संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह उनके मुंह में लड्डू खिलाते नजर आये। वैसे बाबूलाल मरांडी विधानसभा चुनाव को लेकर एड़ी चोटी का जोर लगाये हुए हैं। वह खुद गोगो-दीदी योजना का फॉर्म भरवाने निकल चुके हैं। उनका मानना है कि भाजपा की सरकार आते ही इस योजना का लाभ झारखंड की माताओं और बहनों को ज्यादा से ज्यादा मिले। भाजपा के केंद्र नेताओं से लेकर राज्यस्तरीय नेता फुल एक्टिव मोड में हैं। लेकिन उनकी एक्टिविटी अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखनी चाहिए। गुटबाजी पर किसी भी कीमत पर लगाम लगाने की जरूरत है। इस पर केंद्र और प्रदेश नेतृत्व को स्ट्रिक्ट रहने की जरूरत है। जो संगठन का काम है, उसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप घातक होगा। उसे जमीन पर काम करने की पूरी छूट होनी चाहिए। ज्यादातर मतदाताओं का यह भी कहना था कि उन्होंने राहुल गांधी के प्रचार से प्रभावित होकर लोकसभा में मतदान कर दिया था, लेकिन इस बार अपनी सूझ-बूझ का परिचय देंगे। वैसे भाजपा के पंचप्रण से मतदाता काफी उत्साहित हैं। इसका मैसेज बहुत पॉजिटिव गया है। भाजपा ने यह बढ़िया दांव चला है। आने वाली अन्य घोषणाओं को लेकर झारखंड की जनता उत्साहित है। भ्रमण के दौरान यह भी साफ हुआ कि आयातित नेताओं से भाजपा को बहुत फायदा होता नहीं दिख रहा। लेकिन कुछ सीटें ऐसी हैं, जहां जिन आयातित नेताओं की चर्चा है, वे लाभकारी होंगे।

वहीं जहां तक जेएमएम की बात है, तो उसके मतदाताओं में रोष नहीं है। लेकिन रोजगार और पेपर लीक के मुद्दे पर हेमंत सरकार सवालिया निशाने पर है, जिसका नुकसान होता दिख रहा है। मतदाताओं का यह भी कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिना पैसे लिये अधिकारी काम नहीं करते। ऊपर से नीचे तक सभी भ्रष्ट हैं, जिसके पास पैसा है उसका ही काम हो रहा है। मंईयां सम्मान योजना को लेकर झारखंड के मतदाता उत्साहित हैं, लेकिन गोगो दीदी योजना से भी उन्हें परहेज नहीं है। भ्रमण के दौरान यह भी पाया कि जेएमएम को कांग्रेस का अतिरिक्त भार उठाना पड़ रहा है। लोगों का मानना है कि कई सीटों पर कांग्रेस के बजाय जेएमएम को खुद लड़ना चाहिए। इसमें पूर्व के कांग्रेस मतदाता भी भारी मात्रा में शामिल हैं। वैसे हरियाणा चुनाव परिणाम को जेएमएम हलके में नहीं लेगा तो उसके लिए बेहतर रहेगा। अति उत्साह भी घातक होता है। सोशल मीडिया ट्रेंड और ग्राउंड रियलिटी दो अलग-अलग चीजें हैं। उसे कांग्रेस के बारे में गहन मंथन करना ही पड़ेगा कि चुनाव के दौरान उसकी भूमिका और हैसियत क्या है। जो पार्टी 543 में 99 को जीत का पैमाना मानती है, तो वह झारखंड में सीटों को लेकर तो मुंह फाड़ ही देगी। वैसे कांग्रेस प्रभारी ने तो अपनी मंशा भी स्पष्ट कर ही दी थी। इस चुनाव में शिल्पी नेहा तिर्की के एक बयान, जिसमें उन्होंने बिहारियों की तुलना घुसपैठियों से की थी, ने सत्ता पक्ष को डैमेज पहुंचाया है, जिसका असर चुनाव में दिखेगा।

हरियाणा में भाजपा की क्या रही रणनीति
हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भाजपा को चुनाव जीतने की मशीन ऐसे ही नहीं कहा जाता। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हरियाणा में पांच सीटें जीती थीं, जबकि 2019 में बीजेपी ने सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसके बाद से ही माहौल बनने लगा कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में माहौल है। भाजपा भी यह मान बैठी थी कि हरियाणा तो गयो। लेकिन भाजपा ने इस पूरी बाजी को ही पलट दिया। सिर्फ जीत ही दर्ज नहीं की बल्कि 2014 और 2019 विधानसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा बड़ी जीत हासिल की है। भाजपा ने माना कि लोकसभा चुनाव के दौरान कई गलतियां हुई थीं और उन्हें दूर भी किया। कई इंटरव्यू में बीजेपी नेताओं ने खुल कर कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान सांगठनिक स्तर पर कुछ गलतियां हुईं थीं, जिन्हें अब दूर किया जा रहा है। बीजेपी ने यह भी माना कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद कार्यकर्ताओं में निराशा थी। बीजेपी ने इसे युद्ध स्तर पर अड्रेस किया। बीजेपी के सीनियर नेता अलग अलग ग्रुप में कार्यकर्ताओं से मिले और निराशा को दूर कर उन्हें यकीन दिलाया कि पार्टी ये चुनाव जीत सकती है।

हरियाणा ऐसा राज्य है, जहां से बड़ी संख्या में युवा सेना में जाते हैं। यहां अग्निवीर एक मुद्दा रहा। कांग्रेस ने इस मुद्दे को लगातार उठाया भी। बीजेपी ने इस मुद्दे की गंभीरता को समझा और अपने घोषणापत्र में वादा किया कि हर अग्निवीर को सरकारी नौकरी दी जायेगी। बीजेपी के सीनियर नेताओं ने हर रैली में इसे दोहराया कि हर अग्निवीर को पेंशनवाली जॉब दी जायेगी। अग्निवीर को लेकर बीजेपी के खिलाफ बन रहे माहौल को बीजेपी काउंटर करने में सफल रही। हरियाणा में 36 बिरादरी को सबसे अहम फैक्टर माना जाता है। जहां कांग्रेस इस पर उलझी रही कि जाट बनाम नॉन जाट मुद्दा होगा, वहीं बीजेपी ने बिरादरी के हिसाब से अपने समीकरणों को फिट किया। जाटलैंड में भी बीजेपी जीती, जबकि पूरे चुनाव भर ये कहा जाता रहा कि जाट बीजेपी से बहुत नाराज हैं। बीजेपी ने ओबीसी को अपने पक्ष में करने के लिए कई मोहल्ला मीटिंग की। हरियाणा में ओबीसी 35 फीसदी हैं। दलित वोट को भी साथ लाने के लिए बीजेपी ने कई रणनीति पर काम किया। चुनाव से ठीक पहले राम रहीम जेल से पैरोल पर बाहर आये और बीजेपी को वोट देने की अपील की। हरियाणा में उनके अनुयायी बड़ी संख्या में है, जो ज्यादातर दलित समाज से आते हैं। बीजेपी लगातार कहती रही कि पिछले 10 सालों में बीजेपी ने खर्ची पर्ची का सिस्टम खत्म किया है। यानी बिना सिफारिश और बिना रिश्वत के लोगों को सरकारी नौकरी दी है। यह राज्य में चर्चा का विषय भी रहा। राज्य में 18 से 39 साल के 94 लाख से ज्यादा वोटर हैं और उसका असर दिखा। एंटी एनकंबेंसी से निपटने के लिए बीजेपी ने लोकसभा चुनाव से पहले ही सीएम बदला और फिर अपने खिलाफ जा रहे वोटों के बंटवारे की भी रणनीति बनायी। सबसे ज्यादा निर्दलीय उम्मीदवार इस बार मैदान में थे। ज्यादा उम्मीदवारों ने एंटी बीजेपी वोटों का बंटवारा किया और बीजेपी की जीत में योगदान दिया। साथ ही कांग्रेस नेताओं की आपसी लड़ाई ने भी बीजेपी की जीत की राह खोली।

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