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    Home»विशेष»संपादकीयः राजनीति की भाषा
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    संपादकीयः राजनीति की भाषा

    आजाद सिपाहीBy आजाद सिपाहीDecember 9, 2017No Comments4 Mins Read
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    प्रधानमंत्री के बारे में मणिशंकर अय्यर की घोर आपत्तिजनक टिप्पणी पर कांग्रेस ने उचित ही कड़ी कार्रवाई की। पार्टी के निर्देश पर अय्यर को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। यही नहीं, पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए उन्हें प्राथमिक सदस्यता से निलंबित भी कर दिया। यह पहला मौका नहीं है जब मोदी के बारे में अय्यर की टिप्पणी को लेकर विवाद उठा हो और कांग्रेस की फजीहत हुई हो। लोकसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने मोदी के बारे में अपनी एक टिप्पणी से अपनी पार्टी की किरकिरी कराई थी। कार्रवाई से अय्यर कोई सबक लें या नहीं, कांग्रेस ने विरोधी नेताओं के प्रति भी सम्मान के तकाजे पर जोर देकर सही रुख अपनाया है। पार्टी को यह डर भी रहा होगा कि कहीं गुजरात चुनावों में मोदी इसे भुनाने की कोशिश न करें। और कांग्रेस को जैसा अंदेशा था वैसा ही हुआ। मोदी ने अय्यर की टिप्पणी को लपकने और चुनावी मुद््दा बनाने का प्रयास करने में देर नहीं की। इसे उन्होंने अपने ढंग से कुछ विशेष रंग भी दे दिया। इसमें कोई हैरत की बात नहीं है। कांग्रेस जहां गुजरात में भाजपा सरकार के बाईस साल के कामकाज को मुद्दा बनाए हुए है, वहीं मोदी इससे बचने की कोशिश करते हुए खुद को ही मुद््दा बनाने में लगे रहे हैं। इस तरह अय्यर की टिप्पणी प्रकारांतर से मोदी का ही खेल साधने वाली साबित हुई।बहरहाल, अय्यर अपवाद नहीं है और न राजनीति में भाषा की मर्यादा लांघने की यह पहली घटना है। अनेक पार्टियों के अनेक राजनीतिकों के बिगड़ैल बयान गिनाए जा सकते हैं। चुनाव के दौरान या चुनाव नजदीक हों, तो विरोधियों को घेरने और उन पर तंज कसने के सिलसिले में बहुत सारे राजनीतिक लोग वाणी का संयम भूल जाते हैं और ऐसी भाषा बोलते हैं जो किसी को भी शोभा नहीं देती। खुद भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी गांधी-परिवार के बारे में जब-तब कुछ भी बोलते रहे हैं। हाल में भाजपा के एक सांसद ने मोदी पर अंगुली उठाने वालों की अंगुली तोड़ देने की धमकी दी थी। उनके सार्वजनिक रूप से खेद जताने के बाद मामले को खत्म मान लिया गया था। फिर, अय्यर के माफी मांगने के बाद भी मामले को क्यों तूल दिया जा रहा है? अपने राजनीतिक विरोधी को पाकिस्तान चले जाने को कहना और देशद्रोही करार देना भी शिष्टता नहीं माना जा सकता। पिछले दिनों लालू प्रसाद के बेटे ने प्रधानमंत्री और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी की बाबत जो कुछ कहा वह तो राजनीति की भाषा का रसातल है। ‘पद्मावती’ फिल्म के कुछ विरोधियों ने नाक काटने और दौड़ा-दौड़ा कर मारने जैसे धमकी भरे बयान दिए। उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? अलबत्ता, मीडिया के हिस्से ने ऐसे बयानों को सुर्खियां बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई बार संसद में किसी की किसी पर अशालीन टिप्पणी के कारण कामकाज घंटों बाधित रहता है और सदन का बेशकीमती वक्त जाया होता है।यह कोई चटखारे लेने का विषय नहीं है। राजनीति में शालीनता का सवाल एक बड़ा सवाल है और इस पर व्यापक परिप्रेक्ष्य में बहस होनी चाहिए, न कि तेरे-मेरे के अंदाज में। एक समय था जब देश की राजनीति में विरोधियों का जिक्र करते समय भी मान-मर्यादा का खयाल रखा जाता था। कह सकते हैं कि तब राजनीति में दूसरी तरह के लोग थे। बात सही है, पर पूरी नहीं है। आज राजनीति में विरोधियों या प्रतिद्वंद्वियों के प्रति अशालीनता के वाकये काफी हो रहे हैं तो इसका बड़ा कारण यह है कि आज की राजनीति में मुद््दों और जन सरोकारों का महत्त्व कम और घृणा का तत्त्व प्रबल होता जा रहा है। नफरत शख्सियतों के प्रति भी बढ़ी है और अन्य जातियों तथा अन्य समुदायों के प्रति भी। विचारहीनता के दौर में नफरत ही अपने समर्थकों को जोड़े रखने का आधार बनती जा रही है। अगर राजनीति में मर्यादा की पुन: प्राण प्रतिष्ठा करनी है तो घृणा-प्रचार को छोड़, मुद््दों और जन सरोकारों को राजनीति के केंद्र में लाना होगा।

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