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    Home»विशेष»हेमंत अकेले नहीं बाबूलाल समेत विपक्ष में हैं कई नेता: आरपीएन सिंह
    विशेष

    हेमंत अकेले नहीं बाबूलाल समेत विपक्ष में हैं कई नेता: आरपीएन सिंह

    azad sipahiBy azad sipahiDecember 28, 2018Updated:December 28, 2018No Comments6 Mins Read
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    हेमंत अकेले नहीं बाबूलाल समेत विपक्ष में हैं कई नेता: आरपीएन सिंह

    आरपीएन सिंह के बयान ने चौंका दिया है नेताओं को

    मकर संक्रांति के बाद तय होगा महागठबंधन का खाका, सीटों के बंटवारे पर लगेगी मुहर

    महागठबंधन के नेता का एलान विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद होगा

    आजाद सिपाही खबर विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह। खबर विशेष में आज हम बात कर रहे हैं झारखंड में महागठबंधन के नेता को लेकर हो रही खिचखिच की। महागठबंधन बने इस पर तो सभी तैयार हैं, लेकिन कौन होगा महागठबंधन का नेता, यह तय नहीं है। राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने यह घोषणा की थी कि हेमंत सोरेन के नेतृत्व में विधानसभा का चुनाव लड़ा जायेगा। लेकिन महज सात महीने के भीतर ही कांग्रेस का सुर बदल गया है। अब कांग्रेस पार्टी का यह कहना है कि महागठबंधन में हेमंत सोरेन ही नहीं, बाबूलाल मरांडी भी नेता हैं। कांग्रेस में भी नेता की कमी नहीं है। नेता पर फैसला चुनाव के बाद होगा। जो बातें अभी तक छनकर आ रही हैं, उससे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि महागठबंधन में अभी भी बहुत पेंच है। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने यह भी कहा है कि मकर संक्रांति के बाद महागठबंधन में सीट बंटवारे पर मुहर लग जायेगी।

    प्रदेश कांग्रेस प्रभारी आरपीएन सिंह ने कहा है कि महागठबंधन का नेता कौन होगा, इसमें स्ट्रक्चर की कौन सी बात है। झामुमो में पूर्व सीएम हेमंत हैं और जेवीएम में पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी हैं।  हमारी पार्टी में भी सारे नेता बैठ कर ही सारा कुछ तय करेंगे। महागठबंधन को लेकर झारखंड की राजनीति में क्या चल रहा है, इसपर प्रकाश डाल रहे हैं हमारे राजनीतिक संपादक ज्ञान रंजन।

    तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद पूरे देश में कांग्रेस पार्टी एग्रेसिव हो गयी है। कांग्रेस नये तेवर में है, यह कहना गलत नहीं होगा। झारखंड में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। कोलेबिरा उपचुनाव में मिली जीत के बाद कांग्रेस पार्टी खासा उत्साह में है। उसे यह लगने लगा है कि झारखंड में भी वह कुछ नया कर सकती है और यही वजह है कि चुनाव परिणाम के बाद से ही कांग्रेस पार्टी नये जोश में है। लगातार कांग्रेस के नेताओं के द्वारा महागठबंधन को लेकर नये-नये बयान आ रहे हैं। चार दिन पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने कहा था कि महागठबंधन से पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय होगा और तब नेता को लेकर विचार होगा। गुरुवार को कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह ने यह कह कर कि महागठबंधन में नेताओं की कमी नहीं है, हेमंत भी नेता हैं, बाबूलाल मरांडी भी नेता हैं और कांग्रेस के पास भी नेताओं की कमी नहीं है, एक नयी चर्चा को जन्म दे दिया है। झाविमो पहले ही कह चुका है कि महागठबंधन में अभी नेता कौन होगा, इस पर बात नहीं हुई है। कौन होगा महागठबंधन का नेता यह तो अभी चर्चा में है, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि अभी भी नेता को लेकर महागठबंधन में काफी पेंच है। यूपीए के अंदर गठबंधन को लेकर सरगर्मी तेज है। यूपीए में नये समीकरण का प्लॉट तैयार हो रहा है।  झामुमो और झाविमो के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं। झाविमो की ओर से पहल की गयी है। झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और विधायक दल के नेता प्रदीप यादव झामुमो नेता हेमंत सोरेन के आवास पर गये और  दोनों ही दलों के नेताओं के बीच करीब दो घंटे तक बातचीत हुई। मिली सूचना के अनुसार दोनों ही दलों ने एक साथ लोकसभा एवं  विधानसभा चुनाव में उतरने की संभावनाओं पर चर्चा की।

    सूत्रों ने बताया कि बैठक में कहा गया कि वर्तमान राजनीतिक हालात में दोनों दल साथ आ जाते हैं, तो मजबूत विकल्प तैयार हो सकता है। नेताओं ने लोकसभा की एक-एक सीट की राजनीतिक परिस्थिति पर चर्चा की। झाविमो अध्यक्ष का कहना था कि यूपीए में जल्द से जल्द गठबंधन का खाका तैयार होना चाहिए। इसमें समान विचारधारा वाले ज्यादा से ज्यादा दलों को शामिल किया जाना चाहिए। हिस्सेदारी में व्यापक हित में समझौता भी किया जाना चाहिए। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कारगर और व्यावहारिक गठबंधन तैयार होना चाहिए।  मिली जानकारी के अनुसार झामुमो नेता श्री सोरेन भी इस पक्ष में थे कि छोटे-बड़े सभी दलों को साथ लेकर चला जाये।  इधर झाविमो और झामुमो के बीच की नजदीकियों के बाद कांग्रेस खेमा में भी दबाव बढ़ेगा।  हालांकि अब तक झाविमो और झामुमो के बीच गठबंधन का कोई स्वरूप तय नहीं हुआ है और इन दोनों दलों के लिए कांग्रेस से अलग हट कर राह पकड़ना आसान नहीं होगा। कांग्रेस पार्टी यह अच्छी तरह से जानती है कि उसके बिना झामुमो और झाविमो भाजपा से टक्कर लेने की स्थिति में नहीं है। यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी खुलकर बैटिंग कर रही है। कांग्रेस ने झामुमो के समर्थन के बिना कोलेबिरा फतह कर यह साबित कर दिया है कि उसका वजूद अभी भी झारखंड में कायम है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कई विधानसभा क्षेत्रों में झामुमो, झाविमो और राजद का व्यापक जनाधार है। इसी तरह कांग्रेस पार्टी के साथ यह प्लस पॉइंट है कि उसके पास झारखंड के सभी विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ता और समर्थक हैं। जबकि इससे इतर झामुमो, झाविमो और राजद का जनाधार कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। झामुमो जहां कोल्हान, संथाल और कोयलांचल में मजबूत है तो झाविमो भी इन्हीं क्षेत्रों में अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा ताकतवर है। राजद का जनाधार पलामू, कोडरमा और संथाल की दो-तीन विधानसभा सीटों में है। तीन-चार जगहों पर वाम दल अच्छी स्थिति में हैं । जबतक सभी एक साथ नहीं होंगे भाजपा को टक्कर देना मुश्किल है। भाजपा की बात करें तो वह झारखंड में सभी जगहों पर है और उसके जनाधार को कम नहीं आंका जा सकता है। इस बात से विपक्ष के सभी राजनीतिक दल वाकिफ हैं। लेकिन सत्ता की कुंजी अपने हाथों में हो, इसको लेकर विपक्षी दलों में रस्साकसी जारी है। मकर संक्रांति के बाद महागठबंधन को लेकर दिल्ली में बैठक होनेवाली है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हेमंत सोरेन, बाबूलाल मरांडी और अन्नपूर्णा देवी की बैठक होगी, जिसमें झारखंड में सीटों के बंटवारे पर चर्चा होनी है। इस बीच विपक्ष के सभी राजनीतिक दल अपने नफा नुकसान के हिसाब से गठबंधन के नेता को लेकर बात कर रहे हैं। राजद और वामदल हेमंत को नेता मानकर चल रहा है। प्रदेश राजद अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी का कहना है कि विपक्ष में झामुमो सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में झामुमो के नेता को ही महागठबंधन का नेता होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अभी कुछ भी तय नहीं हुआ  है। महागठबंधन का खाका क्या होगा, इस पर मुहर लगनी बाकी है। इतना तो तय है कि भाजपा के खिलाफ झारखंड में मजबूत महागठबंधन होगा। बहरहाल क्या होगा महागठबंधन का स्वरूप, कौन होगा महागठबंधन का नेता यह तो मकर संक्रांति के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अभी भी महागठबंधन में शतरंज का खेल चल रहा है। कौन होगा वजीर या फिर एक प्यादा वजीर पर भारी हो जायेगा, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।

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