आजसू ने ही शुरू की थी मांग, करती रही आंदोलन
झारखंड में आजसू ने ओबीसी अरक्षण के मुद्दे और इस बड़ी आबादी के दर्द को काफी पहले ही समझ लिया था। आजसू प्रमुख सुदेश महतो भी इसी वर्ग से आते हैं, शायद इसीलिए उन्होंने समाज की पीड़ा को समझा और इसके लिए आवाज उठानी शुरू कर दी। राज्य गठन के बाद से ही पार्टी ओबीसी, एससी-एसटी आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग करती रही। पार्टी ने 2015 में रघुवर सरकार के गठन के बाद इस मुद्दे को लेकर अपना आंदोलन तेज किया। तब से लेकर आज तक लगातार आजसू इसे अपना मुख्य मुद्दा बनाती रही है। आजसू ने सरकार में रहते हुए भी ओबीसी आरक्षण बढ़ा कर 27 फीसदी करने और कुल आरक्षण सीमा बढ़ा कर 70 फीसदी करने की मांग उठायी। उनकी मांगों में एसटी, एससी और ओबीसी तीनों का आरक्षण बढ़ाने की बात थी। सबसे पहले आजसू ने फरवरी 2015 में पिछड़ा वर्ग आरक्षण को लेकर मोरहाबादी मैदान में महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष अनशन किया।
अनशन के समापन के अवसर पर विशाल सभा का आयोजन हुआ था, जिसमें सुदेश महतो, राज्य सरकार के तत्कालीन मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी, विधायक रामचंद्र सहिस और तमाम बड़े नेताओं ने इसके लिए हुंकार भरी थी। इसके बाद भी समय-समय पर पार्टी की ओर से इसे लेकर आवाज उठायी जाती रही।
इसके बाद 17 फरवरी 2018 को अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग महासभा की ओर विशाल राज्यस्तरीय सम्मेलन का आयोजन विधानसभा मैदान में किया गया। इसमें आजसू आयोजक बनी। इसमें कई राष्टÑीय नेताओं ने शिरकत की।
आजसू नेताओं ने इसके जरिये एक बार फिर ओबीसी आरक्षण की मांग को बुलंद किया। फिर अभी इसी साल फरवरी माह में सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू होने के बाद आजसू नेताओं ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को ज्ञापन सौंप कर एक बार फिर ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की मांग की।
उन्होंने हवाला दिया कि अब आरक्षण का दायरा बढ़ा कर 70 फीसदी किया जा सकता है। एक बार फिर उनकी बात नहीं सुनी गयी। तब आजसू ने इसे इस विधानसभा चुनाव में प्रमुखता से उठाया और चुनावी मुद्दा भी बनाया। ओबीसी आबादी और इस मुद्दे का महत्व देखते हुए अन्य दलों ने इसे समझा और आज इस चुनाव में यह मुद्दा हॉट केक बन गया।

1.32 करोड़, यानी 40 फीसदी है पिछड़ों की आबादी
बताते चलें कि राज्य में नये सिरे से पिछड़े वर्ग की गणना की कवायद की जा रही है। इससे इतर 2011 की सामाजिक, आर्थिक जातीय जनगणना के आधार पर तैयार की गयी रिपोर्ट में इनकी आबादी लगभग 1.32 करोड़ बतायी गयी है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 40 फीसदी है। ये आंकड़े पंचायत एवं निकाय चुनाव को केंद्र में रखकर आरक्षण की प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की पहल पर तैयार किये गये थे। ऐसे पिछड़ों की वास्तविक आबादी का खुलासा नये सिरे से गणना के बाद ही संभव है। रिपोर्ट के मुताबिक गिरिडीह, देवघर, पलामू, सरायकेला, चतरा, धनबाद, रांची, खूंटी आदि क्षेत्रों में इसकी बहुलता है।

अभी क्या है प्रावधान
झारखंड में फिलवक्त अनुसूचित जनजातियों के लिए 26, अनुसूचित जातियों के लिए 10, जबकि पिछड़े वर्ग के लिए 14 फीसद आरक्षण का प्रावधान है। राज्य गठन के बाद यहां की सरकार ने एसटी के लिए 32, एससी के लिए 14 तथा पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसद आरक्षण की तैयारी कर कर रखी थी। इससे इतर आरक्षण की सीमा 50 फीसद से अधिक होने पर हाइकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इसके बाद भी यह मामला जीवित रहा। रघुवर दास की मौजूदा भाजपा नीत सरकार में शामिल आजसू इसकी बड़ी पक्षधर रही है।

आरक्षण क्यों बना मुद्दा
झारखंड का राजनीतिक मिजाज अन्य हिंदी भाषी राज्यों से थोड़ा अलग रहा है। जाति एवं आरक्षण का मुद्दा कभी यहां चुनाव का प्रमुख मुद्दा नहीं बन पाया। हालांकि सत्ता में आने वाली पार्टियों ने पिछड़ी जातियों को साधने में कोई कमी नहीं की। राज्य की सबसे बड़ी ओबीसी आबादी (40 फीसदी से ज्यादा) का योगदान सरकार बनाने में सबसे अहम होता है। इसे समझने में सुदेश महतो ने जरा भी देर नहीं की। इसे समझते हुए ही वह सरकार में रहने के बावजूद इसके लिए अंदोलनरत रहे।
हालांकि आरक्षण के मर्म को समझने में हेमंत सोरेन को थोड़ा वक्त लगा। वहीं, झामुमो के पीछे-पीछे कांग्रेस भी झारखंड में अब इसे मुद्दा बना चुकी है। सुदेश, हेमंत और कांग्रेस का यह दावा कमलनाथ और भूपेश बघेल सरकार द्वारा लागू की गयी नयी आरक्षण नीति का ही अगला कदम है। जातिवार जनगणना की रिपोर्ट को जारी नहीं करना और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके को आरक्षण के दायरे में लाने के केंद्र सरकार के कदम ने बहस को गर्म तो कर ही दिया है। ऐसे में राज्य के प्रमुख ओबीसी नेता, आदिवासी बहुल राज्य के प्रमुख आदिवासी नेता और राष्टÑीय दलों के इस हस्तक्षेप ने झारखंड की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है।

सुदेश के बाद झामुमो और अन्य दलों ने समझी गंभीरता
26 अगस्त को नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा की बदलाव यात्रा का भोगनाडीह से शुभांरभ करते हुए ओबीसी आरक्षण के मुद्दे को उठाकर राजनीति गर्म कर दी। हेमंत सोरेन ने अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के आरक्षण में दो-दो फीसदी और ओबीसी के आरक्षण में 13 फीसदी की बढ़ोत्तरी का वादा किया। हेमंत सोरेन ने वादा किया कि उनकी सरकार बनी तो वह 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था करेंगे। उनके बयान से स्पष्ट हो गया कि झामुमो इस विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे को आगे करने जा रहा है। झारखंड की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी और नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन द्वारा आरक्षण की सीमा को बढ़ाने एवं उसमें ओबीसी आरक्षण को लगभग दोगुना करने के वादे ने हलचल पैदा कर दी। ऐसा पहली बार हुआ, जब आजसू के बाद राज्य की बड़ी पार्टी ने इतनी मजबूती से ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने की बात की।

अमित शाह को मंच से करनी पड़ी घोषणा
झारखंड में अमित शाह ने अपनी पहली रैली के जरिए चुनावी एजेंडा सेट किया। उन्होंने संकेत दिया कि बीजेपी विधानसभा चुनाव में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और ओबीसी मतों के सहारे वोटर्स को अपने पक्ष में लामबंद करेगी। राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह ने इस मुद्दे को भांपा और खुले मंच से घोषणा कर दी कि भाजपा ओबीसी आरक्षण का दायरा बढ़ाने पर विचार कर रही है। इसके लिए जल्द कमेटी बनाकर पहल की जायेगी। उन्होंने अपने इस दांव से ओबीसी वोटरों को साधने की कोशिश की। अमित शाह की घोषणा के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि आजसू द्वारा आरक्षण वृद्धि का उठाया गया मामला अब अपने मुकाम तक पहुंच चुका है। भाजपा अगर इसे बढ़ाने का प्रयास करती है, तो इसका पहला श्रेय आजसू को ही जायेगा।

देखते ही देखते बन गया चुनावी मुद्दा
सबसे पहले आजसू, उसके बाद झामुमो और फिर कांग्रेस की ओर से आरक्षण वृद्धि की पैरवी करना चुनावी मुद्दा बन गया। लगने लगा कि जिसने आरक्षण वृद्धि की बात नहीं की, वह कहीं पीछे छूट जायेगा और देखते ही देखते सबने इसे अपना लिया।

2014 के बाद प्रमुखता से उठा मुद्दा
ओबीसी आरक्षण झारखंड में बहस का मुद्दा बन गया है। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। सरकार में रहते हुए आजसू पार्टी ने झारखंड में ओबीसी आरक्षण बढ़ाकर 27 फीसदी करने की मांग सितंबर 2016 में की थी। आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो जो खुद भी पिछड़ी जाति के हैं, उन्होंने अखिल झारखंड पिछड़ी जाति महासम्मेलन के मंच से अपनी ही सरकार से यह मांग की थी।

सदन में भी उठा है मामला
जेवीएम के विधायक प्रदीप यादव ने यह मांग सदन में उठायी थी। उन्होंने राज्य में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से बढ़ा कर 73 फीसदी करने की मांग सदन के सामने रखी थी, जिसमें पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की मांग शामिल थी। पिछड़ी जाति से ही आने वाले मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 2001 में झारखंड हाइकोर्ट द्वारा लगाये गये स्थगन आदेश का हवाला देकर इस मांग पर विचार करने से मना कर दिया था।
उदासीन रहीं सरकारें
नवगठित झारखंड राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने राज्य की आरक्षण नीति में बदलाव करते हुए राज्य में एसटी को 32 फीसदी, एससी को 14 फीसदी और पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया था। यह नियम झारखंड में लागू नहीं हो पाया, क्योंकि झारखंड हाइकोर्ट ने 50 फीसदी से अधिक आरक्षण देने के प्रावधान को निरस्त कर दिया और तदर्थ यानी अस्थायी व्यवस्था करते हुए एसटी, एससी और पिछड़ों के लिए क्रमश: 26, 10, 14 फीसदी के आरक्षण की व्यवस्था को ही मंजूरी दी। बता दें कि यह एक अस्थायी व्यवस्था थी, पर उसके बाद सरकारें उदासीन हो गयीं और राजनीतिक पार्टियों ने भी लगभग चुप्पी साध ली। कभी-कभार पिछड़ों के सम्मेलनों से आवाज उठती, पर कार्यक्रम के समापन के साथ ही ओबीसी आरक्षण की मांग भी विसर्जित हो जाती।

क्या है दूसरे राज्यों में
छत्तीसगढ़ भी झारखंड के समान ही आदिवासी बहुल राज्य है। वहां भी पहले ओबीसी को 14 फीसदी आरक्षण प्राप्त था, जिसे वहां की भूपेश बघेल सरकार ने बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया है। मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार भी ऐसा फैसला कर चुकी है।
एक के बाद एक कांग्रेस की सरकारें ओबीसी आरक्षण में बढ़ोतरी कर रही हैं, जिससे ओबीसी आरक्षण एक बार फिर से देश भर में बहस का मुद्दा बन गया है। मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने से लेकर आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के लिए 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था आने के बाद फिर से इस मांग ने जोर पकड़ा है।

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