झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार युद्ध थम गया है। पक्ष-विपक्ष दोनों ने प्रचार में पूरी ऊर्जा झोंकी। क्षेत्रीय दलों के प्रचार की कमान क्षत्रपों ने संभाली, पर दो प्रमुख राष्टÑीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस की बात करें तो इन दोनों दलों का प्रचार राष्टÑीय स्तर के चेहरों के भरोसे रहा। इन दोनों पार्टियों में स्टार प्रचारकों की डिमांड ऐसी रही कि स्थानीय और प्रदेश स्तरीय नेता हाशिये पर रह गये। हां भाजपा में सीएम रघुवर दास इसके अपवाद थे। इन दोनों दलों में सिर्फ और सिर्फ दिल्ली के बड़े नेताओं की ही डिमांड थी। आलाकमान ने भी इसे समझा। यही कारण था कि कांग्रेस की सबसे बड़ी सेलिब्रिटी चेहरा मानी जानेवाली प्रियंका गांधी तक को आना पड़ा। यह उनका पहला झारखंड दौरा रहा, जिसे लेकर पक्ष और विपक्ष सभी में उत्सुकता दिखी। शायद झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 के प्रचार का इससे बेहतर समापन नहीं हो सकता था। देखा जाये, तो इस बार के चुनाव प्रचार में भाजपा और कांग्रेस के सबसे बड़े स्टार प्रचारकों के कई फेरे लगे। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और उत्तरप्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की आधा दर्जन से ज्यादा चुनावी सभाएं हुईं। वहीं, कांग्रेस की ओर से उनके स्टार प्रचारक राहुल गांधी की भी चार चुनावी सभाएं हुईं। इनके अलावा भाजपा की ओर से राजनाथ सिंह, स्मृति ईरानी, सन्नी देओल आदि की भी डिमांड रही। जबकि कांग्रेस से राज बब्बर, शत्रुघ्न और भाग्यश्री जैसे सितारों ने चुनाव को ग्लैमराइज्ड किया। हर दल के प्रत्याशी की यही इच्छा रही कि कोई सितारा ही उनके लिए चुनाव प्रचार करे। प्रदेश स्तरीय नेता मंच पर दिखे तो जरूर, पर कुछ खास नहीं रहा। प्रचार युद्ध पर नजर दौड़ाती दीपेश कुमार की रिपोर्ट।

झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 का प्रचार अभियान बुधवार को समाप्त हो गया। अंतिम चरण का चुनाव शुक्रवार 20 दिसंबर को होगा। 15 नवंबर के बाद से ही लगभग एक माह से ज्यादा समय तक पूरे राज्य में धुआंधार प्रचार अभियान चला।
पांच चरणों के इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ सबसे ज्यादा लगभग आधा दर्जन से ज्यादा बार चुनावी सभाएं करने झारखंड आये। लगभग हर चरण के चुनाव में उनके एक से दो दौरे हुए। वहीं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की भी चार सभाएं हुईं। इन सबके बीच स्थानीय नेताओं की पूछ तो आखिर कम होनी ही थी। यहां सबसे बड़ा विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर यह नौबत क्यों आयी? सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह है कि क्या पार्टियों को अपने प्रदेश स्तरीय नेताओं पर भरोसा नहीं था या प्रत्याशियों को उन पर यकीन करने में परेशानी हो रही थी। ऐसा लगता है कि इन दोनों दलों के नेताओं को अपने परफॉरमेंस पर विश्वास ही नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय दल हैं, पर इन दोनों दलों के प्रदेश स्तरीय नेताओं के पास वह आभामंडल नहीं है, जिसके भरोसे चुनाव में जनता का विश्वास जीता जा सके। भाजपा तो पूरे प्रचार के दौरान शुरू से अंत तक अपने ब्रहास्त्र पीएम मोदी और अमित शाह का उपयोग करती दिखी। हां इसमें मुख्यमंत्री रघुवर दास अपवाद रहे, जिन्होंने अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी सभाएं कीं। राष्टÑीय नेताओं पर निर्भरता में कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। राहुल गांधी के साथ उसने प्रियंका को भी प्रचार के मैदान में उतार दिया।
पिछले पांच साल में इन दोनों दलों की प्रदेश इकाइयों और उनकी अगुवाई करनेवाले नेताओं की गतिविधियां इतनी व्यापक कभी नहीं रहीं कि पूरे प्रदेश में उनकी सर्वस्वीकार्यता हो सके। पहले हम बात करें भाजपा की। इस पार्टी का रवैया पिछले पांच साल में कुछ वैसा ही रहा, जो आम तौर पर सत्ताधारी दलों का होता है। सरकार अपना काम करती रही और उसके मुखिया यानी मुख्यमंत्री सरकार के साथ-साथ पार्टी कार्यक्रमों में सक्रिय दिखे। पर, प्रदेश अध्यक्ष से लेकर अन्य नेता या तो अपने क्षेत्र में व्यस्त रहे या फिर पार्टी कार्यालय में समय काटते रहे। यानी एक तरीके से पार्टी से बेहतर प्रदर्शन सरकार का रहा। संगठन के स्तर पर जनता से जुड़ने के कार्यक्रम प्रभावी तरीके से नहीं चल पाये। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गयी कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर अन्य पदाधिकारी तक कमरे में सिमटते चले गये। जनता के मुद्दे तक सिर्फ सरकार के होकर रह गये। यही कारण है कि इस चुनाव प्रचार में भाजपा की ओर से प्रदेश के नेताओं में सिर्फ मुख्यमंत्री रघुवर दास प्रचार के दौरान सक्रिय भूमिका में नजर आये। पार्टी के वरिष्ठ नेता अर्जुन मुंडा ने भी कुछ हद तक प्रचार की कमान संभाली, पर वह ज्यादातर केंद्रीय नेताओं के साथ ही मंच पर दिखे। पार्टी के अन्य स्थानीय नेता हाशिये पर ही दिखे। प्रदेश अध्यक्ष तो सिर्फ और सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र तक सक्रिय दिखे।
वहीं, हम कांग्रेस की बात करें, तो यहां पदाधिकारियों की कोई कमी नहीं है। राष्ट्रीय दल है, इसलिए दिल्ली से इसके नेता भी आते-जाते रहते हैं। इस चुनाव में कांग्रेस का प्रचार अभियान भी राष्ट्रीय नेताओं के इर्द गिर्द ही सिमटा रहा। राहुल और प्रियंका गांधी के अलावा सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राज बब्बर और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नामचीन नेता प्रचार करते दिखे। पर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, जिनकी पूरे राज्य में पहचान है, प्रचार से कटे-कटे दिखे। हालांकि गाहे-बगाहे प्रेस बयानों के माध्यम से वह भाजपा को कोसते जरूर नजर आये। राहुल की सभा में भी वह मौजूद रहे। पर उनकी अपनी कोई चुनावी सभा नहीं हुई, जो हैरानी की बात है। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव और अन्य चार कार्यकारी अध्यक्ष भी चुनाव प्रचार से दूर ही रहे। प्रदेश अध्यक्ष तो प्रथम चरण में अपने चुनाव में ही व्यस्त रहे। वहीं, एक कार्यकारी अध्यक्ष इरफान अंसारी भी अपने ही चुनाव में व्यस्त रहे। एक कार्यकारी अध्यक्ष मानस सिन्हा तो बीच में बगावत कर चुनाव मैदान में उतर गये थे। हां, राजेश ठाकुर जरूर सक्रिय नजर आये और प्रचार का बीड़ा उठाया। अगर देखा जाये, तो पिछले पांच साल में प्रदेश कांग्रेस ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे पार्टी की छवि जनता के दिल में बसती या कोई प्रदेश का नेता उभर कर सामने आता। महज बयानबाजी और प्रेस रिलीज जारी कर खानापूर्ति की राजनीति होती रही। पार्टी की ओर से कोई ऐसा जनांदोलन नहीं हुआ, जिसे याद रखा जा सके। पूरे समय पार्टी के नेता अंदरूनी मसलों में ही उलझे रहे। आपस में लड़ते रहे और एक-दूसरे की बखिया उधेड़ते रहे। देखा जाये, तो कांग्रेस राज्य में ऐसी पार्टी बनकर रह गयी है, जिसमें हमेशा पार्टी के वरिष्ठ नेता अंदरूनी मामलों में उलझे रहते हैं। इससे भी पार्टी की नकारात्मक छवि बनती चली गयी। इधर, क्षेत्रीय दलों की स्थिति ठीक इससे उलट है। चाहे झारखंड मुक्ति मोर्चा हो, झारखंड विकास मोर्चा हो या आजसू पार्टी, सभी अपने बलबूते चुनाव मैदान में हैं और मजबूती से टिके हैं। इन्हें किसी स्टार प्रचारक की न तो परवाह है और न ही जरूरत। इनके अपने नेता ही स्टार हैं। आजसू में सुदेश कुमार महतो, तो झामुमो में हेमंत सोरेन और झाविमो में बाबूलाल मरांडी ही चुनाव प्रचार की कमान थामे हुए हैं।
सबसे बड़ी बात है कि इनकी सभाओं में किसी स्टार प्रचारक से कम भीड़ नहीं जुट रही, बल्कि कई सभाओं में भीड़ देखकर तो ऐसा लगता है कि इन्हें किसी स्टार प्रचारक की जरूरत ही नहीं है। इन्होंने अपने प्रदर्शन से साबित किया है कि ये जननेता हैं। जनता के बीच इनकी डिमांड है। जनता इन्हें सुनने और देखने आती है।
इन्होेंने ये साबित किया है कि जनता के बीच रहकर काम किया जाये, तो मामूली आदमी भी स्टार बन सकता है। साथ ही, अब समय आ गया है कि बड़े और राष्ट्रीय दलों को विचार करना होगा कि आखिर क्या कमी उनके नेताओं में थी, जिससे जनता के बीच उनकी लोकप्रियता नहीं है। एक-एक सीट के लिए स्टार प्रचारक की डिमांड रही है। यह आत्ममंथन का विषय है कि आखिर क्यों इन दलों के प्रदेशस्तरीय नेता जनता से व्यापक तौर पर नहीं जुड़ पा रहे हैं।

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