वाराणसी। सिंधु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया के बीच संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं थे, बल्कि दोनों क्षेत्रों की प्राचीन आबादियों के बीच आनुवंशिक संबंध भी रहे होंगे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के जीन विज्ञानी प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने प्राचीन DNA पर व्याख्यान के दौरान यह जानकारी साझा की।
राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (NFSU) के वाराणसी परिसर में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. चौबे ने बताया कि पुरातात्विक साक्ष्यों के बाद अब प्राचीन DNA शोध भी पश्चिमी एशिया और दक्षिण एशिया के बीच प्राचीन मानव संपर्क की ओर संकेत करता है।
प्राचीन व्यापार से आगे बढ़कर सामने आया मानव संपर्क
प्रो. चौबे ने बताया कि पुरातत्वविद लंबे समय से सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया के बीच संपर्क के प्रमाण जुटाते रहे हैं। मेसोपोटामिया के प्राचीन ग्रंथों में मेलुह्हा का उल्लेख, वहां मिली सिंधु सभ्यता की मुहरें और मनके दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापारिक संबंधों की ओर संकेत करते हैं।
अब प्राचीन DNA के अध्ययन से यह संभावना सामने आई है कि इन व्यापारिक मार्गों के जरिए सिर्फ वस्तुएं ही नहीं, बल्कि लोग भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचे होंगे।
सीरिया से मिले प्राचीन अवशेषों का DNA विश्लेषण
प्रो. चौबे के अनुसार, पोलैंड के वैज्ञानिकों के साथ किए गए शोध में सीरिया की मध्य यूफ्रेटिस घाटी स्थित टेल अशारा (प्राचीन तेरका) और टेल मसाइख से मिले चार व्यक्तियों के दांतों का DNA विश्लेषण किया गया।
इन मानव अवशेषों का काल लगभग 2650 ईसा पूर्व से 700 ईस्वी के बीच का बताया गया। अध्ययन में दक्षिण एशियाई मूल से जुड़े कुछ माइटोकॉन्ड्रियल हैपलोग्रुप मिले, जिनमें M4b1, M49 और M61 शामिल हैं।
प्रो. चौबे के मुताबिक, ये वंश भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन समय से मौजूद रहे हैं और वर्तमान सीरिया में बेहद कम पाए जाते हैं, जबकि भारत, पाकिस्तान और हिमालयी क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है।
व्यापारी परिवार या प्राचीन प्रवास की संभावना
प्रो. चौबे ने संभावना जताई कि सीरिया में मिले इन आनुवंशिक संकेतों से जुड़े लोग व्यापारिक मार्गों से पश्चिम एशिया पहुंचे व्यापारी परिवारों के सदस्य हो सकते हैं। हालांकि, यह भी संभव है कि यह संपर्क इससे भी पुराने मानव प्रवास का परिणाम रहा हो।
उन्होंने बताया कि बाद के राखीगढ़ी प्राचीन जीनोम और इंडस-पेरिफेरी से जुड़े आनुवंशिक अध्ययनों ने भी दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच प्राचीन आनुवंशिक संपर्क की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं।
‘DNA इतिहास की वह किताब है जिसे मिटाया नहीं जा सकता’
व्याख्यान के दौरान प्रो. चौबे ने प्राचीन DNA के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि पुरातत्व ने जहां दोनों सभ्यताओं के बीच व्यापारिक संपर्क को प्रमाणित किया है, वहीं DNA अध्ययन मानव आबादी के बीच संभावित संपर्क की एक अलग तस्वीर पेश करता है।
उन्होंने कहा कि यह संबंध केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं था, बल्कि संभवतः लोगों और उनके वंशों के बीच भी संपर्क रहा।
फॉरेंसिक विज्ञान में भी प्राचीन DNA की अहम भूमिका
कार्यक्रम में छात्रों और शिक्षकों ने प्राचीन DNA तकनीक और फॉरेंसिक विज्ञान में उसके इस्तेमाल को लेकर सवाल पूछे। प्रो. चौबे ने कहा कि फॉरेंसिक विज्ञान अब केवल अपराध जांच तक सीमित नहीं है। आधुनिक DNA तकनीक की मदद से मानव पहचान के साथ-साथ प्राचीन आबादी, प्रवास और सभ्यताओं के बीच संबंधों का भी अध्ययन किया जा रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता NFSU वाराणसी परिसर के प्रभारी निदेशक प्रोफेसर सतीश कुमार ने की। उन्होंने कहा कि इस तरह के व्याख्यान विद्यार्थियों को प्रयोगशाला आधारित अध्ययन से आगे व्यापक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर देते हैं।
NFSU वाराणसी परिसर में विश्वस्तरीय सुविधाओं पर जोर
प्रोफेसर सतीश कुमार ने बताया कि NFSU वाराणसी परिसर विद्यार्थियों को आधुनिक प्रयोगशालाओं, शोध और वैश्विक स्तर की शिक्षा से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
NFSU का वाराणसी परिसर फिलहाल जाल्हूपुर में संचालित है, जबकि इसका स्थायी परिसर राजातालाब क्षेत्र के शहंशाहपुर में प्रस्तावित है।

