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    Home»स्पेशल रिपोर्ट»अब भी समस्याओं का बोझ ढो रहा है सिंहभूम संसदीय क्षेत्र
    स्पेशल रिपोर्ट

    अब भी समस्याओं का बोझ ढो रहा है सिंहभूम संसदीय क्षेत्र

    adminBy adminFebruary 21, 2024No Comments8 Mins Read
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    विशेष
    -पलायन से प्रदूषण और गरीबी से नक्सल तक का दर्द झेल रहा है चाइबासा
    -आज भी कोड़ा दंपति यहां की राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करता है

    सारंडा जंगलों की धरती और कोल्हान की हृदयस्थली है चाइबासा, यानी सिंहभूम संसदीय क्षेत्र। यह झारखंड का महत्वपूर्ण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र है। यह संसदीय क्षेत्र पश्चिम सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिलों के कुछ हिस्सों को मिला कर गठित किया गया है। 1952 में देश के लिए हुए पहले लोकसभा चुनावों में इस सीट का गठन नहीं हुआ था। 1957 में दूसरे लोकसभा निर्वाचन के दौरान यह संसदीय क्षेत्र अस्तित्व में आया। इस क्षेत्र में चाइबासा, सरायकेला, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर, मझगांव और चक्रधरपुर विधानसभा क्षेत्रों को समाहित किया गया है। सिंहभूम कोल्हान का ऐतिहासिक नाम है और पहले यह प्रमंडलीय मुख्यालय था। लेकिन जमशेदपुर को अलग जिला बनाने के समय सिंहभूम को दो हिस्सों में, पश्चिमी सिंहभूम और पूर्वी सिंहभूम में विभाजित किया गया। पश्चिमी सिंहभूम का जिला मुख्यालय चाइबासा है और कोल्हान का प्रमंडलीय मुख्यालय भी। जहां तक सियासी परिदृश्य का सवाल है, तो यहां कभी कांग्रेस के बागुन सुंब्रुइ का प्रभाव था, लेकिन कालक्रम में वह नेपथ्य में चले गये और अब यहां कांग्रेस के साथ भाजपा और झामुमो का भी प्रभाव देखा जाता है। फिलहाल सिंहभूम की राजनीति के केंद्र में कोड़ा दंपति है, यानी पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और उनकी पत्नी सह वर्तमान सांसद गीता कोड़ा। कहते हैं कि कोड़ा दंपति के चाहे बिना यहां राजनीति का पत्ता भी नहीं हिलता है। 2019 में गीता कोड़ा ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ को हराया था। कोल्हान का यह इलाका कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें पलायन से प्रदूषण तक और गरीबी से लेकर नक्सली समस्या तक शामिल हैं। इसलिए सिंहभूम सीट का चुनावी परिदृश्य बेहद अनिश्चित होता है। क्या है सिंहभूम संसदीय सीट का चुनावी परिदृश्य, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    झारखंड के कोल्हान प्रमंडल का मुख्यालय और पश्चिमी सिंहभूम जिले का मुख्यालय है चाइबासा, जिसे सिंहभूम संसदीय क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। पश्चिम सिंहभूम झारखंड का सबसे पुराना जिला है। 1837 में कोल्हान पर ब्रिटिश विजय के बाद एक नये जिले का गठन किया गया, जिसे सिंहभूम के रूप में जाना जाने लगा और इसका मुख्यालय चाइबासा था। बाद में सिंहभूम को पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां तीन जिलों में विभाजित किया गया। झारखंड के दक्षिणी भाग में पश्चिमी सिंहभूम जिला स्थित है और राज्य का सबसे बड़ा जिला है। यह समुद्र तल से 244 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसका क्षेत्रफल 5290.89 वर्ग किलोमीटर है। जिले के उत्तर में खूंटी, पूर्व में सरायकेला-खरसावां, दक्षिण में ओड़िशा का क्योंझर, मयूरभंज और सुंदरगढ़ और पश्चिम में झारखंड का सिमडेगा और ओड़िशा का सुंदरगढ़ सीमाबद्ध है। यह जिला पहाड़ी ढलानों पर घाटियों, खड़ी पहाड़ियों और घने जंगलों से भरा पड़ा है। पश्चिमी सिंहभूम जिले की आबादी का अधिकांश हिस्सा जनजातीय आबादी का है।

    सिंहभूम का सियासी परिदृश्य
    सिंहभूम लोकसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है। यह सीट सरायकेला- खरसावां और पश्चिमी सिंहभूम जिले में फैली हुई है। यह इलाका रेड कॉरिडोर का हिस्सा है। इस सीट पर अनुसूचित जनजाति का दबदबा है। उरांव, संताल समुदाय, महतो (कुरमी), प्रधान, गोप, गौड़ समेत कई अनुसूचित जनजातियां, इसाई और मुस्लिम मतदाता यहां निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2014 के चुनाव में बीजेपी को अनुसूचित जनजातियों की गोलबंदी के कारण जीत मिली थी।

    सिंहभूम का चुनावी इतिहास
    सिंहभूम का चुनावी इतिहास बेहद दिलचस्प है। 1957 से लेकर 1977 तक इस सीट पर झारखंड पार्टी का दबदबा रहा। 1957 में शंभू चरण, 1962 में हरी चरण सोय, 1967 में कोलाइ बिरुआ, 1971 में मोरन सिंह पूर्ति और 1977 में बागुन सुंब्रुई जीते। 1980 में बागुन सुंब्रुई ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया और चुनाव जीत कर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद वह 1984 और 1989 का चुनाव भी जीते। यानी बागुन सुंब्रुई इस सीट से लगातार चार बार सांसद बने। 1991 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के कृष्णा मार्डी जीते। 1996 में पहली बार इस सीट पर भाजपा का खाता खुला। भाजपा के टिकट पर चित्रसेन सिंकू जीते। 1998 में कांग्रेस ने वापसी की और विजय सिंह सोय जीते। 1999 में भाजपा के टिकट पर लक्ष्मण गिलुवा जीतने में कामयाब हुए। 2004 में एक बार फिर इस सीट से बागुन सुंब्रुई कांग्रेस के टिकट पर पांचवीं बार संसद पहुंचे। 2009 में इस सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मधु कोड़ा जीते। 2014 के चुनाव में भाजपा के लक्ष्मण गिलुवा जीते। 2019 में कांग्रेस ने फिर बाजी पलट दी और उसकी प्रत्याशी गीता कोड़ा ने लक्ष्मण गिलुवा को हरा दिया।

    सीट से जुड़े हैं कई दिलचस्प मिथक
    सिंहभूम लोकसभा सीट से कई दिलचस्प मिथक जुड़े हुए हैं। हालांकि 2019 के चुनाव में गीता कोड़ा ने इनमें से कई मिथकों को तोड़ा। पहला मिथक तो यही था कि आज तक यहां से केवल ‘हो जाति’ के ही उम्मीदवार जीतते रहे हैं। दूसरा मिथक यह था कि यहां की जनता ने कभी किसी महिला प्रत्याशी को नहीं जिताया। एक अन्य मिथक यह है कि पूर्व सांसद बागुन सुंबु्रई के अलावा यहां पर किसी को लगातार जीत नहीं मिली है। लक्ष्मण गिलुवा दो बार 1999 और 2014 में यहां पर जीत हासिल की, लेकिन वह भी लगातार नहीं जीत पाये। पहला मिथक तो अब भी बरकरार है, लेकिन दूसरा मिथक गीता कोड़ा ने 2019 में तोड़ा, जबकि इस बार यह देखना दिलचस्प होगा कि तीसरा मिथक वह तोड़ पाती हैं या नहीं।

    क्या है इस बार का सियासी परिदृश्य
    2024 के लोकसभा चुनाव में कोल्हान की धरती पर राजनीति नये रास्ते पर चल सकती है। सिंहभूम लोकसभा सीट पर उलटफेर का प्लॉट तैयार हो रहा है। इस सीट से वर्तमान कांग्रेस सांसद गीता कोड़ा के फैसले चुनावी राजनीति को नया रंग देंगे। चर्चा है कि गीता कोड़ा भाजपा में जा सकती हैं। ऐसा हुआ, तो फिर चुनाव का मिजाज बदलेगा। समीकरण बदलेंगे। हालांकि सांसद गीता कोड़ा ने अब तक इस पर चुप्पी साध रखी है। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष गीता कोड़ा लगातार पार्टी के कार्यक्रम में भी सक्रिय हैं। उनके पति और कभी निर्दलीय मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा भी कांग्रेस की डोर पकड़ कर आगे बढ़ रहे हैं। कोड़ा दंपति की इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ है। दोनों ‘हो जनजाति’ के मजबूत नेता माने जाते हैं। खुद पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा इस सीट पर निर्दलीय चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की भी नजर गीता कोड़ा पर है। भाजपा ने यदि गीता कोड़ा को अपने पाले में कर लिया, तो चुनावी जंग साध सकती है।

    अर्जुन मुंडा के चुनाव लड़ने की भी चर्चा
    भाजपा के अंदरखाने में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के चुनाव लड़ने की भी चर्चा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि अर्जुन मुंडा नयी जमीन तलाश सकते हैं। केंद्रीय मंत्री इन अटकलों पर सटीक जवाब देते हैं कि पार्टी को निर्णय लेना है। जो उचित समझेगी करेगी, किसने सोचा था कि हम खूंटी से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन पार्टी ने निर्णय लिया, तो चुनाव लड़े। इस सीट से भाजपा तीन बार चुनाव जीत चुकी है। 1996 के लोकसभा चुनाव में चित्रसेन सिंकू ने पहली बार भाजपा को जीत दिलायी थी। झारखंड पार्टी, कांग्रेस और झामुमो के दबदबा वाले क्षेत्र में भाजपा की पहली सेंधमारी थी। इसके बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे लक्ष्मण गिलुवा दो बार सांसद रहे। इस सीट पर पूर्व आइएएस जेबी तुबिद भी अपनी दावेदारी करते हैं, वहीं बड़कुंवर गगरई उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल हैं, लेकिन सिंहभूम सीट पर सारे समीकरण गीता कोड़ा के आसपास हैं। वह भाजपा में गयीं, तो मामला कुछ और होगा।

    झामुमो कर रहा है दावेदारी
    इधर विपक्षी गठबंधन में इस बार झामुमो की दावेदारी फलक पर आयी है। कोल्हान में झामुमो की मजबूत पकड़ है। सिंहभूम लोकसभा सीट में पड़ने वाले छह विधानसभा क्षेत्रों में पांच झामुमो के पास हैं। गीता कोड़ा ने कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लिया, तो झामुमो का ही रास्ता साफ होगा, क्योंकि कांग्रेस के पास फिर उम्मीदवार का टोटा होगा। वहीं झामुमो अपने को एनडीए के खिलाफ लड़ाई में आगे कर लेगा। झामुमो के पास उम्मीदवार की लंबी फेहरिस्त है। झामुमो नेता और चक्रधरपुर से विधायक सुखराम उरांव इस सीट से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। वहीं दीपक बिरुआ जैसे तेज-तर्रार और आंदोलनकारी पृष्ठभूमि वाले नेता झामुमो के पास हैं। ऐसे हालात में सिंहभूम सीट पर झामुमो की दावेदारी कांग्रेस पर भारी पड़ेगी।

    सिंहभूम के चुनावी मुद्दे
    इस बार के संसदीय चुनाव में सिंहभूम के मतदाता प्रत्याशियों को मुद्दों पर तौलेंगे। इस क्षेत्र में वैसे तो कई मुद्दे हैं, लेकिन पलायन, प्रदूषण और गरीबी के साथ नक्सली समस्या सबसे प्रमुख है। इसके अलावा अंधवश्विास, डायन हत्या, मानव तस्करी जैसी समस्याओं से यह संसदीय क्षेत्र दो-चार हो रहा है। आजादी के बाद भी इस क्षेत्र में विकास नहीं हुआ। उच्च और तकनीकी शिक्षा में यह इलाका पिछड़ा है। सिंचाई के मौलिक संसाधनों से लोग अभी भी जूझ रहे हैं। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में ये मुद्दे सत्ता का रास्ता तय करने वाले कारक हैं। सिंहभूम संसदीय क्षेत्र के विकास को समझने के लिए यहां उद्योग, रोजगार, कृषि और शिक्षा के संसाधनों का सच जानना जरूरी है। अगर इन सभी बातों पर विचार करें, तो यहां न तो औद्योगिक विकास हुआ और न ही शिक्षा के नये संस्थान बने। अगर बने भी तो, संसाधनविहीन। विशेषकर मानव संसाधन की कमी इस क्षेत्र में दिखती है।

    2019 का चुनाव परिणाम
    नाम पार्टी प्राप्त मत
    गीता कोड़ा कांग्रेस 431815
    लक्ष्मण गिलुवा भाजपा 359660
    हार का अंतर 72155

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