विशेष
बागी उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से रोमांचक हो गया है मुकाबला
सभी पार्टियों में शुरू हो गयी है बागी उम्मीदवारों को मनाने की कोशिश
कैसे होगा डैमेज कंट्रोल मंथन का दौर लगातार चल रहा

झारखंड में 48 नगर निकायों के चुनाव में नामांकन दाखिल करने का काम खत्म हो गया है। अब नामांकन पत्रों की जांच, नाम वापस लेने की प्रक्रिया और फिर चुनाव चिन्ह आवंटन के बाद मतदान की प्रक्रिया संपन्न होगी। निकाय चुनाव वैसे तो गैर-दलीय आधार पर (बिना पार्टी सिंबल के) हो रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ह्यपार्टी समर्थितह्ण उम्मीदवारों को लेकर जोरदार जोर-आजमाइश शुरू हो गयी है। राज्य में हो रहे शहरी निकाय चुनाव में कुल नौ नगर निगमों के चुनाव भी हो रहे हैं, जहां मेयर या महापौर का प्रत्यक्ष चुनाव होगा। इनके अलावा 20 नगर परिषदों और 19 नगर पंचायतों में अध्यक्ष का भी प्रत्यक्ष चुनाव होगा। इन 39 पदों पर जितने उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है, उससे राजनीतिक दलों के भीतर बेचैनी बढ़ गयी है। यदि केवल महापौर पद की बात की जाये, तो कई ऐसे उम्मीदवार मैदान में उतर गये हैं, जो किसी न किसी दल में सक्रिय हैं। धनबाद में तो भाजपा के एक कद्दावर नेता ने पार्टी का समर्थन नहीं मिलने के कारण पार्टी ही छोड़ दी है और झामुमो में शामिल हो गये हैं। एक ही पद के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवारों के मैदान में उतरने के कारण राजनीतिक दलों के भीतर बेचैनी पैदा हो गयी है और अब बागियों को मनाने की कोशिश भी शुरू हो गयी है। चाहे भाजपा हो या झामुमो या फिर कांग्रेस, कोई भी दल बागियों से अछूता नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में बागियों की मौजूदगी के कारण लंबे समय के बाद बैलेट पेपर से होने वाला झारखंड का शहरी निकाय चुनाव बेहद रोमांचक हो गया है। जाहिर है कि इसके परिणाम राज्य की राजनीति की दिशा भी तय करेंगे। क्या है इस गैर-दलीय चुनाव में दलों का दलदल, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

झारखंड में होने वाले नगर निकाय चुनाव में नामांकन दाखिल करने का काम पूरा हो गया है। इसके साथ ही एक बात साफ हो गयी है कि यह चुनावी मुकाबला बेहद रोमांचक होनेवाला है, क्योंकि इसमें हर मुकाबले में, चाहे मेयर का हो या नगर परिषद/ नगर पंचायत अध्यक्ष का या फिर वार्ड पार्षद का, बागी उम्मीदवारों द्वारा बड़ा खेल किये जाने की जमीन तैयार हो गयी है। राज्य में हो रहे नगर निकाय चुनाव में कुल नौ मेयर, 39 नगर परिषद/ नगर पंचायत अध्यक्ष और 1087 वार्ड पार्षद चुने जानेवाले हैं। इनके लिए 23 फरवरी को बैलेट पेपर से मतदान होगा और 27 फरवरी को परिणाम घोषित किये जायेंगे।

नामांकन दाखिल करनेवालों की संख्या
48 नगर निकायों में अंतिम दिन कुल 2588 प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल किया। इनमें 275 प्रत्याशी मेयर और अध्यक्ष पद के हैं। वहीं नामांकन के अंतिम दिन तक कुल 6979 प्रत्याशियों ने पर्चे भरे हैं। इनमें 3462 महिलाएं हैं। इनमें से कई ऐसे प्रत्याशी हैं, जो पार्टी लाइन से हटकर अपनी ही पार्टी के समर्थित प्रत्याशियों के खिलाफ मैदान में हैं। इस चुनाव में 674 प्रत्याशियों ने मेयर और अध्यक्ष पद के लिए नामांकन किया है। वहीं 6305 ने वार्ड पार्षद के लिए। इस तरह मेयर और अध्यक्ष पद के लिए नामांकन करने वालों में 41.98 प्रतिशत, तो वार्ड पार्षदों के लिए 50.42 प्रतिशत महिलाएं हैं।

राजनीतिक दलों की ह्यसमर्थनह्ण की रणनीति
ये चुनाव भले ही औपचारिक रूप से दलीय आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन राजनीति का असर इन चुनावों में साफ नजर आ रहा है। चुनाव चिन्ह भले ही पार्टियां नहीं दे रही हैं, पर प्रत्याशियों को समर्थन देकर वे अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। इसी वजह से इस बार नगर निकाय चुनाव भी दलबदल और पार्टियों के भीतर बगावत से अछूता नहीं रहा है। अलग-अलग राजनीतिक दलों ने नगर निगमों में महापौर और नगर परिषद और नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद को लेकर खास रणनीति बनायी है। इसे ह्यसमर्थनह्ण की रणनीति का नाम दिया गया है। इसके तहत दलों ने जिलाध्यक्षों से संभावित उम्मीदवारों के नाम मंगवाये और आपसी मंथन के बाद समर्थन देने का फैसला किया। समर्थन पाने की होड़ में कई नेताओं ने पार्टी बदलने से भी परहेज नहीं किया।

समर्थन की घोषणा के बाद बगावत
यदि केवल नौ महापौर पद की बात की जाये, तो इतने पदों के लिए राजनीतिक दलों ने अलग-अलग प्रत्याशियों को समर्थन देने की घोषणा की है। समर्थन की घोषणा किये जाने के बाद बगावत का सिलसिला शुरू हो गया। धनबाद में तो भाजपा ने जैसे ही संजीव अग्रवाल को समर्थन देने की घोषणा की, उसके कद्दावर नेता और पूर्व महापौर चंद्रशेखर अग्रवाल ने पार्टी छोड़ दी और झामुमो में शामिल हो गये। अब झामुमो ने उन्हें समर्थन देने की घोषणा कर दी है। इसके अलावा लगभग सभी नगर निगमों में वैसे उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल कर दिया है, जो किसी न किसी पार्टी से संबंधित हैं, जबकि उनकी पार्टियों ने किसी दूसरे को समर्थन देने की घोषणा की है।

कहां से कितने बागी उम्मीदवार
शुरूआत रांची से करते हैं। यहां महापौर पद के लिए भाजपा ने रोशनी खलखो को, तो कांग्रेस ने रमा खलखो को समर्थन देने का एलान किया है। रोशनी खलखो के अलावा अन्य भाजपा नेताओं, संजय कुमार टोप्पो, सुजाता कच्छप, राजेंद्र मुंडा और सुनील फकीरा ने नामांकन दाखिल किया है। झामुमो ने रांची में किसी को समर्थन नहीं दिया है, लेकिन उसके नेताओं ने नामांकन दाखिल किया है। इनमें कथरीना उर्फ रीना तिर्की, सुजीत कुमार कुजूर, सुजीत विजय आंनद कुजूर, रामशरण तिर्की, वीरू तिर्की और अजीत लकड़ा शामिल हैं।
मेदिनीनगर नगर निगम में भाजपा ने अरुणा शंकर को समर्थन दिया है, लेकिन जानकी ओझा, रिंकी सिंह और मीना गुप्ता भी मैदान में हैं। उधर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी की पुत्री नम्रता त्रिपाठी को समर्थन दिया है, तो झामुमो ने पूनम सिंह को समर्थन देने की घोषणा की है।
हजारीबाग नगर निगम में भाजपा ने सुदेश चंद्रवंशी को समर्थन देने की घोषणा की है, लेकिन वहां से मनोज गोप उर्फ टुन्नू गोप भी मैदान में उतर गये हैं। कांग्रेस ने मो तस्लीम अंसारी को समर्थन दिया है, तो झामुमो के विकास राणा और मो सरफराज भी नामांकन दाखिल कर चुके हैं।
गिरिडीह में भाजपा ने डॉ शैलेंद्र चौधरी को समर्थन देने की घोषणा की है, लेकिन वहां कामेश्वर पासवान और नागेश्वर दास भी मैदान में उतर गये हैं। इसी तरह कांग्रेस ने डॉ समीर राय चौधरी को समर्थन दिया है, तो झामुमो ने प्रमिला मेहरा को समर्थन देने की घोषणा कर दी है।
मानगो मेयर के लिए भाजपा ने संध्या सिंह को समर्थन दिया है, लेकिन पार्टी की नेता कुमकुम श्रीवास्तव भी मैदान में उतर गयी हैं। उधर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता को समर्थन दिया है, तो जेबा खान और पार्वती देवी ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए नामांकन दाखिल किया है।
आदित्यपुर नगर निगम में भाजपा ने प्रभाषिणी को समर्थन दिया, तो संजय सरदार, सुनिता लियांगी, बास्को बेसरा और बिनोती हांसदा बागी बन कर मैदान में उतर गये हैं। झामुमो ने यहां से डब्बा सोरेन को समर्थन दिया है, तो कांग्रेस ने विक्रम किस्कू को समर्थन देने की घोषणा की है। यहां से कांग्रेस के नेता रमेश बलमुचू बागी बन कर मैदान में उतर गये हैं।
धनबाद में भाजपा ने संजीव अग्रवाल को समर्थन दिया है, जबकि झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह, मुकेश पांडेय, रघुनाथ भगत और शांतनु चंद्रा भी नामांकन दाखिल कर चुके हैं। भाजपा के कद्दावर नेता रहे चंद्रशेखर अग्रवाल ने तो पार्टी ही छोड़ दी और झामुमो में शामिल हो गये। उन्हें झामुमो ने मेयर पद के लिए समर्थन दिया है, जबकि कांग्रेस ने शमशेर आलम को समर्थन दिया है, लेकिन उसके नेता रवि चौधरी भी मैदान में हैं। झामुमो से नीलम मिश्रा ने भी नामांकन दाखिल किया है।
चास नगर निगम में भाजपा ने अविनाश कुमार को समर्थन दिया है, जबकि पार्टी की अन्य नेता परिंदा सिंह (पूर्व विधायक समरेश सिंह की बहू) भी मैदान में हैं। उधर झामुमो ने उमेश ठाकुर को समर्थन दिया है, लेकिन पार्टी के संजय झा, डॉ गौरव सिंह और रवि केसरी ने भी नामांकन भरा है। यहां से कांग्रेस के उमेश गुप्ता और जुबिल अहमद भी ताल ठोक रहे हैं।
देवघर नगर निगम में भी उलटफेर देखने को मिला है। भाजपा ने महापौर पद के लिए रीता चौरसिया को समर्थन देने का फैसला किया है, जबकि पार्टी के ही नेता बाबा बलियासे ने भी नामांकन भर दिया है। पहले चर्चा थी कि पार्टी बाबा बलियासे को समर्थन दे सकती है।

डैमेज कंट्रोल की कोशिश
नामांकन दाखिल करने के बाद अब पार्टियों के भीतर डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू हो गयी है। सभी राजनीतिक दलों ने बागियों को मनाने के लिए अलग-अलग तरीका अपनाया है। नाम वापसी की अंतिम तारीख छह फरवरी है। पार्टी नेताओं ने बागियों को नाम वापस लेने के लिए मनाने के क्रम में दूसरा पद देने और अन्य तरह का खेल शुरू किया है। पार्टी समर्थित कई प्रत्याशियों को तो अपनी ओर से भी कोशिश करने के लिए कहा गया है।
इन सभी घटनाओं से साफ है कि दलीय चुनाव न होने के बावजूद नगर निकाय चुनाव पूरी तरह राजनीति से जुड़े हुए हैं। समर्थन, रणनीति और दलबदल ने इन चुनावों को रोचक बना दिया है।

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