नाला से झामुमो विधायक के रूप में चुनाव जीतनेवाले रवींद्रनाथ महतो को सर्वसम्मति से सात जनवरी को झारखंड विधानसभाध्यक्ष चुने जाने के साथ ही नियति ने उनके भाग्य में वह पटकथा लिख दी, जिसमें उनके जिम्मे झाविमो के अध्यक्ष रहे बाबूलाल मरांडी, पार्टी के विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और बंधु तिर्की के बतौर विधायक भाग्य का फैसला करना लिखा है। इनमें से एक बाबूलाल मरांडी को भाजपा नेता प्रतिपक्ष चुने जाने की मांग को लेकर बजट सत्र में हंगामा कर रही है। हालांकि प्रदीप और बंधु तिर्की का मामला उतना गर्म नहीं है और इस ओर लगभग खामोशी की स्थिति है। पूर्व विधानसभाध्यक्ष और संसदीय मामलों के गहन जानकार इंदर सिंह नामधारी का कहना है कि यदि झाविमो के तीनों विधायकों के मामले में दसवीं अनुसूची का अनुपालन किया गया, तो तीनों की सदस्यता रद्द होने से कोई बचा नहीं सकता। श्री महतो के पूर्व विधानसभाध्यक्ष डॉ दिनेश उरांव की अदालत में ने झाविमो के छह विधायकों के दल-बदल के मामले को साढ़े चार साल तक लटकाये रखा था। इस मामले में उन्हें आलोचना का भी शिकार होना पड़ा था। ऐसा नहीं है कि दल बदल की समस्या से रूबरू होनेवाले मौजूदा विधानसभाध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो अकेले स्पीकर हैं। ऐसी स्थिति से दो-चार होनेवाले दिनेश उरांव भी थे और इंदर सिंह नामधारी भी। इंदर सिंह नामधारी के समक्ष जब यह स्थिति आयी थी, तो उन्होंने विधिसम्मत काम किया था और राज्य की अर्जुन मुंडा सरकार गिर गयी थी। अब पंच परमेश्वर की भूमिका में रवींद्रनाथ महतो हैं और इस नाते न्याय उन्हें सुनिश्चित करना है। पूर्व विधानसभाध्यक्ष इंदरसिंह नामधारी की मानें, तो झारखंड विधानसभा में झाविमो के तीन विधायकों की सदस्यता रद्द होना विधिसम्मत होगा।
अगर ऐसा होता है, तो राज्य की राजनीति में उसका क्या असर होगा। इस उथल-पुथल को रेखांकित करती दयानंद राय की रिपोर्ट।
अंग्रेजी में एक कहावत है जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड। अर्थात न्याय में देरी न्याय से वंचित करना है। झारखंड विधानसभा में बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने को लेकर 28 फरवरी से शुरू हुए बजट सत्र का पहला दिन हंगामे की भेंट चढ़ गया। भाजपा जहां उन्हें जल्द से जल्द नेता प्रतिपक्ष घोषित किये जाने की मांग को लेकर हंगामा कर रही है, वहीं विधानसभाध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो इस मामले में सभी कानूनी पहलुओं का अध्ययन करके फैसला देने की बात कह रहे हैं। ऐसे में जनता के सामने उत्सुकता इस बात को लेकर है कि आखिर इस मामले में स्पीकर क्या फैसला लेते हैं। वह त्वरित न्याय करते हैं या फिर न्याय में देरी। इस मसले पर विधासनभाध्यक्ष की स्थिति की निरपेक्ष व्याख्या निर्दलीय विधायक सरयू राय का ट्वीट करता है। अपने ट्वीट में सरयू राय ने कहा है कि झारखंड विधानसभा में दल बदल अथवा दल विलय का वर्तमान संकट नैतिक राजनीति बनाम राजनैतिक रणनीति के द्वंद्व की उपज है। मैं जहां सच वहां की सोच इसे गंभीर से गंभीर मोड़ पर ले जा रही है। विधानसभाध्यक्ष के लिए घोर असमंजस की स्थिति है।
दसवीं अनुसूची का पालन हुआ, तो बाबूलाल, प्रदीप और बंधु की जायेगी सदस्यता!
दरअसल झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के पहले झारखंड में समय का पहिया कुछ इस तरह से घूमा कि 24 सितंबर 2006 में अस्तित्व में आयी पार्टी झाविमो इतिहास बन गयी और उसके मुखिया बाबूलाल मरांडी धुर्वा के प्रभात तारा मैदान में भाजपा के मिलन समारोह में अमित शाह की उपस्थिति में 17 फरवरी को भाजपा में शामिल हो गये। उनके पार्टी में शामिल होने के बाद भाजपा ने उन्हें आनन-फानन में पार्टी के विधायक दल का नेता बना डाला। पर उनकी जगह विधानसभाध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो ने पार्टी के वरिष्ठ विधायक सीपी सिंह को विधायक दल के नेताओं की बैठक में शामिल होने का न्योता भेज दिया। सीपी सिंह ने इस न्योते को अस्वीकार करते हुए तर्क दिया कि जब पार्टी ने बाबूलाल मरांडी को विधायक दल का नेता चुन लिया है, तो वे कैसे सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेने जा सकते हैं। इसके बाद बजट सत्र के पहले दिन भाजपा विधायकों ने बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने की मांग को लेकर हंगामा किया। अब विधानसभाध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो के समक्ष दो स्थितियां बनती हैं।
या तो वह इस मामले में विधिसम्मत राय लेने की बात कहते हुए इसे लंबा खींचें, जैसा कि इसके पहले के विधानसभाध्यक्ष दिनेश उरांव ने किया था, या फिर पंच परमेश्वर होने के अपने दायित्व का फैसला करते हुए त्वरित न्याय दें। पूर्व विधानसभाध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी का कहना है कि यदि इस मामले में दसवीं अनुसूची के प्रावधानों का पालन किया गया, तो बाबूलाल मरांडी, प्रदीप यादव और बंधु तिर्की तीनों की सदस्यता रद्द हो जायेगी। उनका कहना है कि दसवीं अनुसूची कहती है कि किसी पार्टी या फिर पार्टी के विधायकों का विलय तभी मान्य है, जब विधायकों के साथ पार्टी के दो-तिहाई पदाधिकारियों का भी विलय हो। बाबूलाल मरांडी ने जब भाजपा में झाविमो का विलय किया, तो उनके साथ पार्टी और पार्टी के पदाधिकारी तो थे, पर दो तिहाई विधायक नहीं थे। वहीं बंधु और प्रदीप के कांग्रेस में शामिल होने के मामले में दो तिहाई विधायक तो थे, पर पार्टी नहीं थी, क्योंकि दोनों को झाविमो से बाबूलाल मरांडी निष्कासित कर चुके थे।
सत्ता पक्ष नकारात्मक राजनीति कर रहा है
इससे पहले भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश अपने एक बयान में कह चुके हैं कि सत्ता पक्ष नकारात्मक राजनीति कर रहा है। उन्होंने विधानसभा को पवित्र जगह बताते हुए वहां ईमानदारी और निष्पक्षता से काम करने की सलाह दी। भाजपा की ओर से सरकार की नीयत पर सवाल उठाये गये, तो झामुमो कोटे से मंत्री मिथिलेश ठाकुर हरकत में आये और उन्होंने कहा कि विधानसभाध्यक्ष निष्पक्ष भूमिका ही निभा रहे हैं। भाजपा का जो चरित्र है, उसमें इस तरह का कन्फ्यूजन होना निश्चित है। यह तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की बात हुई। विधानसभाध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो की बात करें तो वे बार-बार यह साफ करते रहे हैं कि नेता प्रतिपक्ष के मामले और विधायकों के दल-बदल के मामले में वे विधिसम्मत काम करेंगे और कानून जो कहेगा, वही करेंगे। यदि झाविमो विधायकों के दल-बदल के मामले में कानून ने अपना काम किया, तो झाविमो के तीनों विधायकों की सदस्यता जानी लगभग तय है। पंच का फैसला सर्वमान्य होता है और रवींद्रनाथ महतो तो झारखंड विधानसभा के सरपंच हैं। उन्हें दलीय राजनीति से ऊपर उठकर पक्ष और विपक्ष दोनों को समान महत्व देते हुए अपनी भूमिका का निर्वाह करना है। उन्हें झारखंड विधानसभा के सरपंच की भूमिका झारखंड के विधायकों ने सर्वसम्मति से सौंपी है और ईश्वर ने उन्हें चिंतनशील और समालोचक सा व्यक्तित्व दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वे दल-बदल के मामले में क्या और कब फैसला सुनाते हैं और उसका झारखंड की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।