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पार्टी विस्तार के लिए झामुमो ने असम को चुना, कांग्रेस की सांस फूली
रणनीति: असम के चाय बागान इलाकों में टी-ट्राइब और श्रमिक वर्ग को साधना
राज्य की करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर निर्णायक हैं, झारखंड कनेक्शन वाले लोग
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
असम में होनेवाले विधानसभा चुनाव की गहमा-गहमी का असर झारखंड तक पहुंच गया है। झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन के दो सबसे बड़े दल, झामुमो और कांग्रेस असम में अलग हो गये हैं। झामुमो ने राज्य की 21 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। झामुमो के इस एलान के बाद असम चुनाव रोमांचक दौर में पहुंच तो गया ही है, साथ ही इसका झारखंड और देशव्यापी असर भी पड़ने के कयास लगाये जा रहे हैं। असम में रहनेवाले आदिवासियों को ध्यान में रख कर झामुमो ने चुनाव मैदान में उतरने का जो साहसिक फैसला किया है, उसके पीछे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीति और उनका संकल्प है। जेएमएम ने असम की जिन 21 सीटों पर प्रत्याशी दिये हैं, उनमे से मात्र एक ही सीट एसटी के लिए आरक्षित है। इसके अलावा 13 सीटों पर झारखंड मूल के टी ट्राइब उम्मीदवारों को सामान्य सीटों पर टिकट दिया है। मालूम हो कि झारखंड से असम गये आदिवासियों को वहां अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, बल्कि उन्हें ओबीसी वर्ग में रखा गया है। इसलिए वे आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकते। इसके अलावा जेएमएम ने अल्पसंखयक समुदाय, स्थानीय और झारखंड मूल के सामान्य वर्ग के लोगों को भी टिकट दिया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने असम विधानसभा चुनाव के लिए 21 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर पूर्वोत्तर की राजनीति में अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज करा दी है। मुख्य रूप से झारखंड केंद्रित राजनीति करने वाली जेएमएम अब पार्टी विस्तार करना चाह रही है। मजबाट, बिस्वनाथ, खुमताई, चाबुआ और गोसाईंगांव जैसी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर झामुमो ने साफ संकेत दिया है कि वह केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि प्रभावी मुकाबले की तैयारी में है। उम्मीदवारों की सूची पर नजर डालें तो झामुमो ने आदिवासी और श्रमिक वर्ग पर विशेष फोकस किया है। पार्टी ने अधिकांश सीटों पर नए चेहरों को उतारकर स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि झामुमो जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, खासकर उन इलाकों में जहां आदिवासी आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है। झामुमो की विस्तार यात्रा की शुरूआत असम से ही करने के पीछे कई कारण हैं। असम में अकेले दम पर चुनाव लड़ने के झामुमो के फैसले की रणनीति और क्या हो सकता है इसका परिणाम, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा क्षेत्रीय पार्टी की अपनी छवि से बाहर निकलकर राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरने को उत्सुक है। झामुमो ने साफ कर दिया है कि वह असम में इस बार अकेले चुनाव मैदान में उतरेगा। कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोशिशें जरूर हुईं, लेकिन बात नहीं बन सकी। झामुमो के अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कांग्रेस के नेताओं से बातचीत की थी। दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे और रणनीति को लेकर कई दौर की चर्चा हुई, लेकिन सहमति नहीं बन पायी। जानकारी के अनुसार कांग्रेस ने जेएमएम को सात सीटें देने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन जेएमएम से बात नहीं बन पायी। जेएमएम अब अपने दम पर असम में चुनाव लड़ेगा। चुनाव से पहले झामुमो को एक बड़ी राहत मिली है। पार्टी को असम में भी उसका पारंपरिक तीर-धनुष चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया गया है। इसके लिए पार्टी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष आवेदन दिया था, जिसे मंजूरी मिल गयी। चुनाव चिह्न मिलने के बाद संगठन में उत्साह बढ़ा है। कार्यकर्ताओं ने इसे मनोबल बढ़ाने वाला कदम बताया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि एक पहचान के साथ चुनाव लड़ने से मतदाताओं के बीच पहुंच बनाना आसान होगा।
चाय बागान और औद्योगिक क्षेत्रों पर नजर
झामुमो की सूची में डिगबोई, दुलियाजन, मार्घेरिटा, मकुम और डूमडूमा जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जो चाय बागान और औद्योगिक गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। इन क्षेत्रों में श्रमिक और आदिवासी मतदाता बड़ी संख्या में हैं। पार्टी ने भारत नायक, जर्नल मिंज और मुना कर्माकर जैसे उम्मीदवारों को उतारकर इन वर्गों को साधने की कोशिश की है। यह रणनीति कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास भी मानी जा रही है। पार्टी का लक्ष्य असम के चाय बागानों में रहने वाले श्रमिक और आदिवासी आबादी को अपनी ओर आकृष्ट करना है। इन आदिवासियों में से कई लोगों के पूर्वज बहुत पहले झारखंड से पलायन करके वहां जा बसे थे। झामुमो की रणनीति असम के चाय बागान इलाकों और वहां रहने वाले टी-ट्राइब और आदिवासी वोट बैंक पर खास फोकस करने की है। राज्य की करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर इन मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। पिछले एक साल से पार्टी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। पार्टी को उम्मीद है कि इन क्षेत्रों में उसका प्रभाव चुनावी नतीजों में मदद करेगा। दिलचस्प बात यह है कि झारखंड में झामुमो और कांग्रेस मिलकर सरकार चला रहे हैं, लेकिन असम में दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। इससे साफ है कि राज्यों के हिसाब से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं।
झामुमो के विस्तार की रणनीति का हिस्सा
दरअसल झामुमो की असम में सक्रियता अचानक नहीं बढ़ी, बल्कि इसकी तैयारी पहले से चल रही थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंत्री चमरा लिंडा और सांसद विजय हांसदा के नेतृत्व में एक टीम को असम भेजा था, जिसने एक सप्ताह तक जमीनी हालात का अध्ययन किया। इसके बाद हेमंत सोरेन ने खुद असम का दौरा कर राजनीतिक माहौल का आकलन किया। उनकी सक्रियता से न सिर्फ भाजपा, बल्कि कांग्रेस की भी चिंता बढ़ी। अब पार्टी माइक्रो लेवल पर चुनाव की तैयारी में जुट गयी है। झामुमो नेता लगातार असम में कैंप कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर संगठन को सक्रिय किया जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी दो बार असम दौरा कर चुके हैं, जहां उन्होंने आदिवासी अस्मिता और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
विधानसभा में भी हेमंत ने दिया था संकेत
हाल ही में संपन्न झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के समापन दिवस पर हेमंत सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव में उतरने का संकेत दिया था। विधानसभा सत्र के बीच वह असम के दो दिवसीय दौरे पर गये थे और सत्र के अंतिम दिन उन्होंने दावा किया कि देशभर के वंचित समुदाय अपनी समस्याओं को उठाने के लिए झारखंड की ओर देख रहे हैं। उन्होंने कहा, हम निश्चित रूप से उन आदिवासियों की आवाज बनेंगे, जो अन्यत्र अत्याचारों का सामना कर रहे हैं, चाहे वह असम हो, मणिपुर हो या देश का कोई भी कोना। इससे पहले झारखंड सरकार ने नवंबर 2024 में असम के चाय बागानों में काम करने वाली वंचित जनजातियों की दुर्दशा का अध्ययन करने के लिए एक पैनल के गठन को मंजूरी दी थी।
फैसले का राजनीतिक असर
झामुमो का यह फैसला सिर्फ एक संगठनात्मक रणनीति नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक संकेत और प्रभाव हैं, जो राज्य और क्षेत्रीय राजनीति दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। असम में अकेले चुनाव लड़ने का उसका फैसला इस बात का संकेत है कि पार्टी अब अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहती है। यह रणनीति उन क्षेत्रीय दलों की प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो राष्ट्रीय दलों पर निर्भर रहने के बजाय खुद की स्वतंत्र पहचान बनाना चाहते हैं। असम में भी बड़ी संख्या में आदिवासी और चाय बागान श्रमिक समुदाय हैं। झामुमो इन्हीं वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। अगर पार्टी को यहां कुछ हद तक भी सफलता मिलती है, तो यह अन्य राज्यों में भी उसके विस्तार का रास्ता खोल सकती है।
झामुमो के सामने चुनौतियां भी हैं
हालांकि झामुमो का यह कदम साहसिक है, लेकिन इसके सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। असम में पार्टी का संगठनात्मक ढांचा अभी उतना मजबूत नहीं है। स्थानीय नेतृत्व की कमी, संसाधनों का अभाव और जमीनी नेटवर्क की कमजोरी उसके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है। राष्ट्रीय और राज्य स्तर के बड़े दलों के मुकाबले चुनाव लड़ना आसान नहीं होता। ऐसे में झामुमो को हर कदम पर सावधानी बरतनी होगी और स्थानीय मुद्दों को भी प्रभावी ढंग से उठाना होगा। हेमंत सोरेन ने असम को लेकर कमर कस ली है। सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री जल्द ही असम के लिये रवाना होंगे। वहां वह कई चुनावी सभायें, रोड शो और संगठनात्मक बैठक करेंगे और चुनावी माहौल को धार देंगे। स्टार प्रचारक भी तो वही होंगे।
राष्ट्रीय राजनीति में संदेश
झामुमो का यह फैसला केवल असम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संदेश राष्ट्रीय राजनीति तक जाता है। यह दिखाता है कि क्षेत्रीय दल अब अपनी स्वतंत्र भूमिका को लेकर अधिक आत्मविश्वास से भरे हैं। यह कदम विपक्षी गठबंधन की राजनीति के लिए भी एक संकेत है कि छोटे दल अपनी शर्तों पर राजनीति करना चाहते हैं। अगर यह प्रवृत्ति बढ़ती है, तो भविष्य में बड़े विपक्षी गठबंधनों को बनाये रखना और कठिन हो सकता है। यह भी सवाल उठता है कि क्या झामुमो का यह कदम केवल एक प्रयोग है या दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा। अगर पार्टी को थोड़ी भी सफलता मिलती है, तो वह पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी अपने विस्तार की कोशिश कर सकती है।
क्या हैं संभावनाएं
असम की बड़ी जनजातीय आबादी पार्टी के विस्तार के लिए अच्छा अवसर प्रदान करती है, क्योंकि इनमें चाय बागानों के कई ऐसे मजदूर शामिल हैं, जिनकी जड़ें झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र से जुड़ी हैं। झामुमो का मानना है कि इन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और वे मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व की तलाश में हैं। हेमंत सोरेन देशव्यापी आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में एक लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने पलायन के बाद असम जा बसे आदिवासी समुदाय का भरोसा जीता है और अब वह चाय बागानों में काम करने वाली जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। असम के स्थानीय आदिवासी भी उन्हें एक सशक्त व्यक्तित्व मानते हैं, जो उनके हितों की रक्षा कर अन्याय के खिलाफ लड़ सकते हैं।
इस तरह असम में झामुमो का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला एक साहसिक और जोखिम भरा कदम है। यह जहां एक ओर क्षेत्रीय दलों की बढ़ती महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर गठबंधन राजनीति की जटिलताओं को भी उजागर करता है। इसके साथ ही इस फैसले में हेमंत सोरेन की दृढ़ता और पार्टी को नयी ऊंचाइयां देने का उनका संकल्प भी दिखता है। इस फैसले का तत्काल प्रभाव भले ही सीमित दिखे, लेकिन दीर्घकाल में यह झारखंड की राजनीति में नये समीकरण बना सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कदम चुनावी परिदृश्य को और अधिक प्रतिस्पर्धी और बहुआयामी बना देगा।



