रोग से दूर रहने की जरूरत, रोगी से नहीं
वैश्विक महामारी कोरोना ने सामाजिक असर दिखाना शुरू कर दिया है। इस बीमारी ने आम लोगों में इतनी दहशत फैला दी है कि अब परिवार और समाज का बिखरना शुरू हो गया है। बाहर से आनेवाले लोगों को उनके परिवार के लोग भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं। आलम यह है कि लोग कोरोना बीमारी से कम, बीमार से अधिक दूरी बनाने लगे हैं। यहां तक कि मुहल्लों में बाहरी लोगों का प्रवेश बंद कर दिया गया है, कॉलोनियों के गेट की बैरिकेडिंग कर दी गयी है। यदि किसी परिवार का कोई सदस्य बाहर से घर लौटता है, तो उसके लिए दरवाजा खोलने से भी परहेज किया जाने लगा है। सामाजिक नजरिये से यह बेहद खतरनाक स्थिति है। कोरोना का वायरस समाज की नींव को खोखला करने लगा है। अब समय आ गया है, जब सामाजिक ताने-बाने को बचाने के लिए बुद्धिजीवियों को और आम लोगों को आगे आना होगा। यदि अभी ऐसा नहीं किया गया, तो भारत की सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो जायेगी और शहरों में कोरोना संक्रमितों की अलग बस्तियां देखने को मिल सकती हैं, ठीक वैसे ही, जैसे कुष्ठ रोगियों के लिए बस्तियां हैं। लोगों को समझना होगा कि कोरोना का मतलब मौत नहीं है और न कोई मरीज जीवन भर इससे संक्रमित रहता है। कोरोना के प्रति जागरूकता और सतर्कता जरूरी है, लेकिन संदिग्धों-संक्रमितों की उपेक्षा से समस्या का हल नहीं निकल सकता। यह हमारे परिवार को और समाज को तोड़ कर रख देगा। कोरोना संकट के इस सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण करती आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।
कोरोना का प्रकोप रोकने के लिए 25 मार्च को पूरे देश में किये गये लॉकडाउन के तीसरे दौर के अंतिम 24 घंटे में हम प्रवेश कर चुके हैं। 55 दिनों से जारी इस लॉकडाउन के दौरान कई तरह की घटनाएं हुईं, तरह-तरह की खबरें आयीं और संक्रमितों की संख्या के साथ-साथ स्वस्थ होनेवालों की संख्या भी बढ़ी। देश कोरोना संकट की मार झेल रहा है, इसमें कहीं किसी को संदेह नहीं है। लेकिन कोरोना के खिलाफ इस जंग में हमने क्या खोया है और भविष्य में हम क्या खोनेवाले हैं, इस बारे में कहीं कोई बात नहीं हो रही है।
कोरोना महामारी ने खास कर भारत में कहीं गहरे तक असर दिखाया है। इस बीमारी ने भारत के पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। हालत यह हो गयी है कि बाहर से लौटनेवाले बेटे के लिए भी घर का दरवाजा नहीं खोला जा रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग ने सोशल डिवाइड की स्थिति पैदा कर दी है। कई मुहल्लों और कॉलोनियों में बाहरी लोगों का प्रवेश पूरी तरह बंद कर दिया गया है। कुछ दिन पहले कई ऐसी तस्वीरें सामने आयी थीं, जिनमें मां-बाप को उनके बच्चों से दूरी बना कर खाना खाते या घर के बाहर से ही बातचीत करते हुए दिखाया गया था। ये तस्वीरें मानवीय संवेदनाओं को तो झकझोरती हैं, लेकिन इनका संदेश बहुत विपरीत गया। अब लोग बाहर से आनेवाले अपने परिजनों के लिए भी दरवाजा खोलना नहीं चाहते।
संक्रमितों की तो छोड़ दीजिये, संदिग्धों के साथ भी अछूत जैसा व्यवहार किया जा रहा है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा कभी टीबी के मरीजों या कुष्ठ रोगियों के साथ किया जाता था। हमारे बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने जमाने में यदि घर के किसी सदस्य को टीबी होती थी, तो उसे परिवार से अलग कर दिया जाता था। कोई उसके करीब नहीं जाता था। इस उपेक्षा ने कई टीबी मरीजों को असमय ही मौत के मुंह में धकेल दिया। कमोबेश यही हालत कोरोना की भी है।
पिछले 45 दिन में केवल झारखंड में ही 14 लोगों ने कोरोना की दहशत से आत्महत्या कर ली है। यानी झारखंड में जितने लोग कोरोना से मरे हैं, उससे चार गुना अधिक लोगों की जान दहशत के कारण गयी है। यह गंभीर स्थिति है। इसका साफ संकेत यह है कि कोरोना अब केवल शारीरिक संक्रमण नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारे सामाजिक जीवन को भी बुरी तरह प्रभावित करने लगा है। घरों और परिवारों के बीच की दूरी को मोबाइल और इंटरनेट ने तो पहले ही काफी बढ़ा दिया था, कोरोना ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है।
कोरोना ने सामाजिक-धार्मिक आयोजनों पर तो ब्रेक लगायी ही है, अब पारिवारिक दूरी भी बढ़ने लगी है।
इसका निदान क्या है, यह एक बड़ा सवाल है। कोरोना का संकट तो समय के साथ कम होता जायेगा, लेकिन परिवार और समाज को इस बीमारी ने जो घाव दिया है, वह शायद ही कभी भर पाये। इसलिए इस घाव का उपचार अभी से ही जरूरी है, ताकि यह भीतर तक न फैले। इसके लिए समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों को बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। उन्हें आगे आकर लोगों को समझाना होगा कि कोरोना का मतलब मौत नहीं है। खास कर झारखंड में तो यह बिलकुल नहीं है। कोरोना सामान्य फ्लू का नया वर्जन है, जिसके साथ हमें जीना सीखना है। यह ठीक वैसी ही बीमारी है, जैसे सामान्य जुकाम और वायरल बुखार होता है, जो आपसी संपर्क से फैलता है और तीन से चार दिन में ठीक हो जाता है। अंतर केवल इतना है कि कोरोना का संक्रमण अधिक तेजी से फैलता है और अब तक इसका इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है।
सरकार और प्रशासन को भी लोगों को जागरूक बनाने के लिए एक अभियान शुरू करना होगा, वरना लोग कोरोना से लड़ने की बजाय कोरोना संक्रमित से लड़ने लगेंगे, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण दो दिन पहले रांची के रातू में मिल चुका है, जब घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों के साथ स्थानीय लोगों ने मार-पीट की, क्योंकि उन्हें संदेह था कि ये प्रवासी मजदूर कोरोना फैला सकते हैं।
गढ़वा में तो घर लौटे दर्जन भर से अधिक मजदूरों को गांव के बाहर पेड़ के नीचे दिन बिताना पड़ रहा है, क्योंकि उनके गांव वालों ने ही उन्हें गांव में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कोरोना से बचाव के लिए जिस सोशल डिस्टेंसिंग का पालन जरूरी है, वह सोशल डिवाइड बनता जा रहा है। यह भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है।