सुदेश। तीन अक्षरों का यह नाम न सिर्फ राजनीति की एक नयी परिभाषा गढ़ रहा है, बल्कि यह भी साबित किया है कि व्यक्तित्व में दम हो तो सफलता खुद-ब-खुद उसके पीछे चली आती है। झारखंड में रघुवर राज को छोड़ दें तो कोई भी सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी और खंडित जनादेश की स्थिति में सुदेश महतो की आजसू कई सरकारों के लिए अहम रही। यही वजह है कि झारखंड बनने के बाद से राज्य में बननेवाली अधिकांश सरकारों में सुदेश किंगमेकर की भूमिका में रहे। आजसू सुप्रीमो ने न सिर्फ खुद के दम पर राजनीति में अपनी पहचान बनायी है, बल्कि अपनी पार्टी को भी झारखंड की राजनीति में वह मुकाम दिया है कि उसके सहयोेग के बिना प्रदेश भाजपा खुद को अधूरा महसूस करती है। 2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा और आजसू के बीच गठबंधन टूटने का असर ये हुआ कि भाजपा को राज्य में सत्ता गंवानी पड़ी। इसके बाद दोनों के रिश्ते न सिर्फ बेहतर हुए हैं, बल्कि बंगाल चुनाव में भाजपा ने आजसू को एक सीट भी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करना हो या गृह मंत्री अमित शाह के साथ भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से सीधा संपर्क। एक साथ राज्य से लेकर केंद्र की राजनीति में सुदेश महतो की पैठ बढ़ती चली जा रही है। आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो के राजनीतिक सफर के साथ उनकी राजनीतिक शैली पर नजर डालती दयानंद राय की रिपोर्ट।
21 जून 1974 को सिल्ली में जन्मे सुदेश महतो की किस्मत कहें या मेहनत या फिर दोनों कि जब बिहार से अलग होकर झारखंड बना, तो उसी साल वर्ष 2000 में वे 25 वर्ष की उम्र में सिल्ली से विधायक चुने गये। जींस और टी-शर्ट पहन कर राजनीति करनेवाली इस शख्सियत को उनकी पहली ही जीत के बाद बिहार में उन्हें मंत्री पद का आॅफर मिला था, पर उन्होंने ठुकरा दिया। यह उनकी राजनीतिक कुशलता ही कही जायेगी कि पहली बार विधायक चुने जाने के केवल आठ साल बाद वर्ष 2009 में 29 दिसंबर को वे राज्य के डिप्टी सीएम बन गये। और अब 47 साल की उम्र में उनकी पार्टी के झारखंड में दो विधायक और एक सांसद हैं। वहीं भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से उनका सीधा संपर्क है।
लीक से हट कर राजनीति करते हैं सुदेश
सुदेश महतो की राजनीति की शुरुआत पृथक झारखंड आंदोलन से हुई। इस आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी के चलते स्थानीय लोगों के बीच उनकी पैठ गहरी होती गयी।
अपनी राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने इस भ्रम को तोड़ दिया कि केवल कुर्ता-पायजामा ही राजनेताओं का ड्रेस कोड हो सकता है। इसकी जगह उन्होंने जींस, टी-शर्ट और कैजुअल ड्रेस पहन राजनीति की और इस परंपरा को स्थापित भी किया। राजनीति में पार्टी कार्यालय की भूमिका और अहमियत पर भी सुदेश महतो ने खास ध्यान दिया और उन्होंने पार्टी का केंद्रीय कार्यालय ऐसा बनाया जो राष्टÑीय पार्टियों के कार्यालय पर भी भारी पड़ता है। यही नहीं, मुद्दों की उनकी समझ ने भी उनकी पार्टी के साथ उन्हें लोकप्रियता दिलायी। 2019 के विधानसभा चुनावों में अबकी बार गांव की सरकार और बंगाल चुनाव से पहले मानभूम जंगलमहल स्थानीय प्रशासन के गठन की मांग ने यह साबित किया है कि मुद्दों के चयन और लीड लेने में आजसू आगे रही है। यही नहीं, झारखंड की राजनीति में सुदेश संभवत: पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने व्यक्तिगत हमलों से बचने की राह चुनी। अपने मुद्दे उठाये और अपनी बात कही। झारखंड के नवनिर्माण का मुद्दा उठाया और जनता के सवालों पर राजनीति की।
भाजपा की दबाव की राजनीति विफल कर दी
वर्ष 2019 के विधानसभा चुनावों में जब भाजपा ने आजसू को 11 सीटें देकर गठबंधन बरकरार रखने का दबाव बनाया, तो आजसू ने सुदेश महतो के नेतृत्व में न सिर्फ इस दबाव को विफल कर दिया, बल्कि अकेले दम पर 53 सीटों पर चुनाव लड़ कर अपनी ताकत दिखायी। नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2014 से 2019 तक झारखंड में ताल ठोक कर शासन कर रही भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी। हालांकि आजसू को भी इस निर्णय से सियासी नुकसान हुआ, पर इसका सुखद पहलू ये रहा कि आजसू को न सिर्फ अपनी ताकत का असल अंदाजा हुआ, बल्कि भाजपा को भी यह महसूस हो गया कि आजसू से अलग होकर लड़ना उसके लिए किसी तरह से भी फायदेमंद नहीं है। इस चुनाव के बाद जब झारखंड में राज्यसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने आजसू के साथ फिर से हाथ मिलाया और दो उपचुनावों में भी ये दोनों साथ मिलकर लड़े।
चर्चा में रहा पीएम का सुदेश के साथ मंच साझा करना
बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान पुरूलिया में हुई रैली में सुदेश महतो का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करना चर्चा में रहा। इस रैली में प्रधानमंत्री ने सुदेश महतो का हाथ पकड कर उन्हें अपनी बगल की सीट पर बिठाया। वहीं, बंगाल में भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिए आजसू अध्यक्ष का हौसला भी बढ़ाया था। यही नहीं बीते दिनों जब नयी दिल्ली में सुदेश गृह मंत्री अमित शाह से मिले, इससे भी राजनीति के गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हुआ। इस मुलाकात के कई कयास लगाये जा रहे हैं। जाहिर है कि सुदेश महतो की राजनीति का फलक समय के साथ न सिर्फ और विस्तार लेता गया है, बल्कि इसने सियासत में अपनी अलग छाप छोड़ी है।
राजनीति के साथ फुटबॉल भी खूब खेलते हैं
सुदेश महतो राजनेता होने के साथ खिलाड़ी भी हैं। नियमित फुटबाल खेलना और खुद को फिट रखना उनकी खूबी है। इसके अलावा वह सिल्ली में बिरसा मुंडा आर्चरी अकादमी भी चलाते हैं। इस अकादमी को वर्ष 2016 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा इस अकादमी की खिलाड़ी मधुमिता कुमारी एशियाड ओलंपिक में भारत के लिए रजत पदक हासिल कर चुकी है।